Saturday, November 8, 2014

मूँद कर आँखे

वो फिर खेल रहा था खेल 
आँख बंद करके चलने का 
कुछ कदम चलता 
आँख खोलता 
दृष्टि से दूरी टटोलता 
और फिर 
बढ़ जाता 

कुछ कदम मूँद कर आँखे 

खेल 
यह 
आँखे मूंदने और खोलने का 
आखिर तब 

हो चला खतरनाक 
जब 

आँखों ने बंद होने के बाद 

ठीक समय पर खुलने से इंकार कर दिया 

पर उस क्षण 
न जाने कैसे 
पर हो चला था वह 
खतरे की समझ से भी

एक अव्यक्त आश्वस्ति 
बिछा गया था कोई 
भीतर उसके 
ऐसे 
की 
आँख मूंदते हुए भी 
जाग्रत रह गया  था वह 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
८ नवम्बर २०१४ 

1 comment:

Rohitas ghorela said...

कोई सैंकड़ों को जगा जाये वो खुद कितने दिनों से सोया नही होगा ...

बेहतरीन कविता

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...