Wednesday, July 30, 2014

एक जादुई पिटारा



वो फिर
उस पेड़ के नीचे
पहाड़ी की पीछे
लेट गया
अपनी आँखें मींचे

न धरती
न आकाश
कौन है वो
जिसकी है तलाश

वो फिर
धीमे धीमे
अपने अदृश्य नगर में
करते हुए सैर
बुलाता रहा उसे
जिससे माँगता रहा
अपनी खैर


तुम ओ अज्ञात
रहते हो साथ साथ
दिन और रात
पर क्यूँ नहीं दिखाते
मुझे अपनी औकात

कह दो
अगर मैं नहीं हूँ लायक
बता दो
मैं यदि नहीं हूँ नायक

लय के साथ
उसे हसीन लग रहा था अपना आक्रोश
न जाने कैसे
उसके सामने, रूमानी सा लग रहा था अपना जोश
उससे तार जुड़ते ही
ना जाने कैसे, काफूर हो चला असंतोष
उसे लगा, शेष जो हो सो हो
मिल गया है, सबसे कीमती, ये अपना होश

आँखें खोल कर देखा
चिड़िया चहचहाई
उसे अपने घर की
गरमागरम चाय याद आई

वह मुस्कुराया
उठा और घर की तरफ कदम बढ़ाया
इस तरह फिर एक बार पेड़ की छाया ने
एक भूत से
उसका पीछा छुड़ाया,
उसकी मुट्ठी में है भविष्य
उसकी साँसों में
 ये आश्वस्ति देता सन्देश पहुंचाया


लौटते हुए
शब्दों ने उसे हाथ पकड़ कर घर पहुंचाया
उसने अपने साये से
कविता का परिचय इस तरह करवाया
ये कविता नहीं
लड़खड़ाते आदमी का सहारा है
मेरे भीतर की टूट फूट को मिटाता
एक जादुई पिटारा है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० जुलाई २० १४ , बुधवार




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