Tuesday, February 11, 2014

जिससे होता है सृजन



सृजन उसका है 
मेरे लिए तो लक्ष्य है बस दरसन 
दरसन उसका 
जिससे होता है सृजन 

२ 

निःशब्द, निस्पंद 
पुलकित एकांत 
उसकी मुस्कान से छलकी पूर्णता का भाव 
अब तक 
ज्यों का त्यों धरा है 
मेरे चारों और 

मेरे हिलने से 
छिन्न-भिन्न हो सकता है 
यह मौन का समन्वित राग 

तो क्या 
पूरी तरह निश्चल हो रहूँ 
यह ऐसी गति अपनाऊं 
कि 
गत्यात्मकता और स्थिरता से परे 
कालमुक्त प्रवाह में 
तन्मय हो 
जाऊं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
११ फरवरी २०१३ 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

काल में लय पा जाये जीवन..

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...