Saturday, June 8, 2013

शुद्ध प्रेम की किरने


गुफा में जाना 
जाकर देर तक बैठना 
अँधेरे में 
अपने आप 
आलोक संचरण का अनुभव 

और 

फिर 
मौन में उभर आता 
सबसे मधुर संगीत 
समन्वित धडकनों के साथ 

असीम स्पर्श से झरती 
मुस्कराहट लिए 

जब 
वह 
उठता 
गुफा से बाहर आने 
कई बार 
यूं हुआ 
की मिट गया गुफा और बाहरी जगत के बीच का भेद 

चलना उड़ने जैसा 
और 
उसे केंद्र बना कर 
वह जो 
बिखरती थीं 
शुद्ध प्रेम की किरने चहुओर 
कौन बनाता और फैलाता था 

वह अद्वितीय आनंद 

मनन करते करते 
सहज ही 
लगता उसे 
जैसे 
वह फिर से 
जा बैठा है 
गुफा में 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २ ० १ ३

2 comments:

Prem Mohan said...

अनुभव है हर दिन की नव ऊष्मा का, नवालोक का जो कविता लाती है।

प्रवीण पाण्डेय said...

अन्दर से, गहरे से आती एक ध्वनि, व्यक्त और गहन।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...