Tuesday, March 5, 2013

अव्यस्थित होने की शिकायत

व्यवस्थित होने के प्रयास में 
वह 
लिखता रहा है 
कविता और 
किसी सूक्ष्म, पावन, उदार, 
अपार समन्वित भाव में 
भीग कर 
भूलता रहा है 
अव्यस्थित होने की शिकायत 

२ 

विस्मित सौंदर्य छलकाते 
ऐसे ही 
किसी अनाम, कोमल क्षण में 
लगा है उसे
"जीवन कविता ही तो है 
और 
व्यवस्था जीवन की 
होती है उजागर
कविता से ही "
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका ५ मार्च २० १ ३ 

2 comments:

Anupama Tripathi said...

srijansheelata ka vismaykari sukh ...
sahaj sundar satya .

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रवाह ही कविता का पर्याय है।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...