Saturday, February 2, 2013

सागर में खो जाना

कब तक बैठे बैठे 
देखना है 
लहरों का आना जाना
क्यूं नहीं जानता 
होता है कैसे  
  सागर में खो जाना 
 
2
 
सन्नाटा ऐसा 
सहम कर छुप गए 
सारे स्पंदन 
इस तरह 
अपना होकर भी 
अपना सा नहीं लगता मन 
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क,  अमेरिका 
2 फरवरी 2013
 
 

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जब आती लहरें जाती है,
कुछ सुप्त पार ले जाती है।

Anupama Tripathi said...

स्वयं मे स्वयं की खोज निरंतर ......
बहता रहता है फिर अंतर ...

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर
क्या कहने

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...