Monday, April 16, 2012

तुतलाती बोली की निश्छलता

 
इस क्षण
नए सिरे से
पोंछ कर
चेतना से
तुम्हारे स्वरुप को धुंधला करते
सभी मैले चिन्ह
 
लो
नव शिशु सा
सरल, सहज प्रसन्नता के
मंगल माधुर्य में भीगा
 
अब तुम्हें
देख कर
मुस्कुराता
खिलखिलाता हूँ जब
 
लगता है
पा लिया है
परम प्रार्थना का
तुम भी
करने लगे हो
गान अपना
मेरे स्वर में
अपना स्वर मिला कर
जैसे
मेरी तुतलाती बोली की निश्छलता ने
छल लिया हो तुम्हें ही
ओ विराट !
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                       १६ अप्रैल २०१२                      

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

ईश्वर के निकट का अनुभव..

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...