Wednesday, March 28, 2012

शाश्वत के आलिंगन में




और अब
इस विराम में
मधुर विश्रांति का यह
सहज विस्तार
धीरे धीरे
घुलता है
मुझ में
या शायद
घुल जाता हूँ मैं 
इस निशब्द स्थल की
समयातीत आभा में

मुक्त होना
जिस क्षण सजीव होता है
चित्र नहीं ले सकता कोई उस क्षण का
शायद इसलिए की
शाश्वत के आलिंगन में
जगमगाता वह क्षण
किसी सजगता के कैमरे के पीछे छुपी आँखों से
देखा ही नहीं जा सकता कभी

यहाँ होना
कहीं पहुंचना नहीं
परे होना है
यहाँ और वहां के भेद से
कुछ इस तरह 
की अपनी पहचान को लेकर
किसी तरह का भय शेष ही न रहे

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ मार्च २०१२ 

1 comment:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...