Friday, August 19, 2011

खिलखिलाता उजियारे का टुकड़ा


कैसे शेष रह जाता है
खिलखिलाता उजियारे का टुकड़ा
उसके आस-पास
तब भी
जबकी
अँधेरे से घबरा कर
छोड़ चुके होते हैं लोग
अपनी बस्तियां

 बस जाते हैं    
जंगलों में जाकर
  शहर से डर कर    
जब सब लोग
 तब भी
 ना जाने कैसे
 बचा रहता है
  उसका साहस उसके पास
और उसे
 देख कर 
 बची रहती है
सभ्यता की आस

वो जो
 सबसे बड़ा खिलाडी है  
   ना जाने कैसे
  मैदान में होकर भी
बना रहता है
  मैदान से बाहर
 खेलते हुए भी 
  असम्प्रक्त हार और जीत से


और
   हारने की घबराहट से छूटने की
जरूरत के साथ
 जब-जब देखा है उसकी ओर
      खिलखिलाते उजियारे वाले
 शाश्वत सखा ने दे दिया है
उपहार
   नयी स्फूर्ति की जगमगाहट का



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ अगस्त २०११  

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर और प्रेरक पंक्तियाँ।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...