Thursday, July 7, 2011

अपनी कृतज्ञता


 
तब 
मिलने लगते हैं सिरे,
बैठ जाता है 
तारतम्य 
एक घटना का 
दूसरी घटना से 
प्रकट होती है
क्रमबद्धता 
एक अद्रश्य सूत्र पर सजी हुई,
 
संतोष सा 
उमड़ आता है
हर क्षण से
और
कृत कृत्यता का भाव लिए 
ढूंढता हूँ मैं उसे 
जिसके प्रति 
अर्पित करून 
अपनी कृतज्ञता 
और बस 
पसर जाता है
धरती के इस छोर से उस छोर तक 
एक मधुर मौन 

अशोक व्यास 
६ जुलाई २०११ की कविता
७ जुलाई २०११ को सस्नेह प्रस्तुत 

(हर दिन कविता का यह kram
भारत यात्रा के दौरान लगभग एक महीने 
अद्रश्य रूप में जारी रहने की सम्भावना hai

आप सबको नमन और उसी कृतज्ञता का अंश 
जिसका संकेत इस कविता में hai
जय हो)
 


 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

हमें तो सारी घटनायें जुड़ी हुयी सी लगती हैं।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...