Friday, July 1, 2011

धूप इस बार


धूप आकर
ठहर गयी है
ऐसे जैसे 
सुस्ताना चाहती हो
सुबह सुबह ही
थक गयी है
उजाले को हर दिन हारता देख कर
 धूप के साथ आकर, उजाला
दिखा भर देता है 
बदल नहीं पाता
उसे
जो गन्दला है


धूप इस बार
अज्ञात के आँगन से
नई सीख लेने
ठहर गयी है
दिन की यात्रा शुरू करने से पहले

पवन जानती है
उसकी सखी धूप 
अपनी भूमिका के बारे में
स्पष्ट होने के बाद
फिर से इठलायेगी
पूर्णता का परिचय लेकर
इस छोर से उस छोर तक जायेगी

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ जुलाई 2011  
          

8 comments:

रेखा said...

धूप के साथ आकर, उजाला
दिखा भर देता है
बदल नहीं पाता
उसे
जो गन्दला है

सुन्दर अभिव्यक्ति ..

प्रवीण पाण्डेय said...

सुबह का समय और धूप की अंगड़ाई।

रजनीश तिवारी said...

bahut hi achhe bimb prastut kiye hain aapne . dhanywaad...

Rakesh Kumar said...

आपकी इस रहस्यवादी प्रस्तुति के लिए हृदय से आभार.
उजाला आँखे खोलता है और दिखाता है
न केवल गन्दगी को वरन खूबसूरती को भी,जिसे देख कर गंदगी से मुहँ मोड़ने का दिल करता है और जिससे प्रयत्न भी हो सकता है गंदगी दूर करने का.

मेरे ब्लॉग पर आपने आकर मुझे कृतार्थ कर दिया अशोक भाई.

वन्दना said...

आपकी पोस्ट कल(3-7-11) यहाँ भी होगी
नयी-पुरानी हलचल

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुन्दर अभिव्यक्ति ..

mridula pradhan said...

फिर से इठलायेगी
पूर्णता का परिचय लेकर
इस छोर से उस छोर तक जायेगी
doop par itni achchi kavita padhkar bahut achcha laga.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

पवन जानती है
उसकी सखी धूप
अपनी भूमिका के बारे में
स्पष्ट होने के बाद
फिर से इठलायेगी
पूर्णता का परिचय लेकर
इस छोर से उस छोर तक जायेगी

बहुत खूब सर!

सादर

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...