Thursday, May 5, 2011

अब तो हम प्यार बढ़ाएँ



क्षमाशीलता का भाव
कहाँ तक जाए
कहाँ रुक जाए
इसकी पहचान
कौन करवाए

हमें आतंक का साया डराता है
कोइ मौत की बीन बजाता है
इंसानियत का पाठ 
उनके लिए व्यर्थ की गाथा है
मारने और मरने का खेल
उनको बहुत सुहाता है
हाँ, उनके पास समझ है, हथियार हैं
और सीमित धारा में बहता प्यार है
 पर मानवता के लिए, उनके पास
हिंसक श्रंखला का उपहार है

निर्माण की बजाय, नष्ट करना आसान है
अजीब बात है, मारा-मारी से हमारी पहचान है

हम उस युग में हैं, की अपने आँगन में भी
फूंक फूंक कर कदम रखना हमारी मजबूरी है
तरक्की हो गयी है सुरक्षित रहने के तरीकों की
पर प्यार और विश्वास के बिना ज़िंदगी अधूरी है

इस अधूरेपन के साथ जीते चले जाएँ
या प्रीत का कोइ ऐसा पाठ बनाएं
जिसे शांति और आनंद सहित
हम सब मिल कर दोहराएँ

सूरज से लेकर आश्वस्ति
आज हर दीवार गिराएं
जीवन के सार तक पहुँचने
अब तो हम प्यार बढ़ाएँ

दिख रहा है,  सबको नष्ट करने के लिए 
पहल करने वाले मिटने से नहीं घबराते
पर प्यार के लिए पहल करने से
हम क्यूं डर-डर कर बैठे ही रह जाते 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ मई २०११  
      

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

निश्चय ही प्यार बढ़ाने के लिये यह सब करना होगा।

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