Sunday, February 27, 2011

मुक्ति का परिचय

 
लौट कर
अब शायद
नहीं पहुंचा जा सकता उस गाँव तक
 
वैसे वहां अब एक 'बड़ी' सड़क है
चुप्प से खेतों के बीच
अचानक बज उठता है
किसी का 'मोबाइल'

बच्चे सड़क पर कम
कंप्यूटर पर अधिक खेलने लगे हैं
 
वो सब तकनीकी रंग
जिन्हें हमने जरूरी माना था
संसार से जुड़ने के लिए 
 
इस सबके आ जाने के बाद
ना जाने क्यूं
जरूरी ना रहा 
गाँव की आत्मा से जुड़ना
 
हो गया है 
कुछ ऐसा
की अब किसी को
आस्मां की तरफ देखने की
फुरसत भी नहीं है
 
सुविधाओं के साथ
मुक्ति की सीढियां चढ़ने की आशा रखने वाले
हम
मुक्ति का परिचय भी भूलने लगे हैं
 
लौट कर
ढूंढना चाहता हूँ
अपने गाँव में
मंदिर के अहाते में
वो जगह
जहाँ हम बच्चे 'सूखे पत्ते और फूल छुपा कर रखते थे
शायद किसी दिन
'गाँव की आत्मा के स्पंदन' भी
रख दिए होंगे
वहीँ-कहीं
अनजाने में
जिनसे
मिल जायेंगे
उस गाँव के बीज
फिर से जिसका हिस्सा बन पाने की चाह
सारे जीवन की उपलब्धियों से
अधिक मूल्यवान लग रही है
इस क्षण
 
अशोक व्यास
अमेरिका
रविवार, २७ फरवरी 2011  
     
       

 
         

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

सुविधाओं की जकड़न में आत्मा।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...