Sunday, February 13, 2011

संकोच करती हैं सीमायें

मैं अब 
छोड़ चुका हूँ किनारा
खोल कर लंगर
गति पकड़ने लगी है नाव
थपेड़े लहरों के
बतियाने लगे हैं मुझसे
हवा के नृत्य से
जुड़ गयी है मेरी दिशा
और 
गंतव्य का गहरा बोध
भर रहा है
एक अनूठा उत्साह मेरी शिराओं में

नदी के बीच
बासी पराठा मुक्ति का
नहीं देता है तृप्ति

अब
इस क्षण
किरणों से, लहरों से, गति से
किनारे की स्मृति से
और पतवार की मधुर लय को
अपनी धडकनों में सजा कर

कर रहा 
उस विस्मय का आव्हान
अंतस में
जो रच कर 
शाश्वत के पदचिन्ह
मिटा कर अधीरता
दे सकता है मुझे
सम्पूर्णता का स्वाद तत्काल

मुक्ति का अदृश्य पराठा
सूंघ कर 
निश्छलता से
लो मैंने देख लिया 
अपने आपको
नदी, किनारे, गति से परे
वहां तक
जहा पहुँचने में
संकोच करती हैं सीमायें

अशोक व्यास
रविवार, १३ फरवरी 2011


3 comments:

Kailash Sharma said...

गहन चिंतन से परिपूर्ण बहुत सुन्दर रचना..

Ashok Vyas said...

dhanyawaad Kailashji

प्रवीण पाण्डेय said...

जब जूझ रहे तो जूझें बस।

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