Saturday, October 31, 2009

कौन किसे अपनाये


फिर एक बार लिख लिख कर
मिटाए शब्द
बात के बहाव में
मेरी जिद की परछाई थी

यह घमंड भी
की मैं कर सकता हूँ
मैं बना सकता हूँ

फिर जो भी हुआ
उसमें नदी थी, आसमान
ना ही सुनाई दी नूतनता की किलकारी

फूल ऐसे खिले की खिलते ही मुरझा गए
गति के पास जगह ही नहीं थी नृत्य करने के लिए


कभी कभी
मेरी क्षुद्रता के कारण सीमित हो रहता है
संसार मेरा
कभी इतना घुटन भरा कि
लगे छोड़ ही दूँ इसे


सोचता हूँ
उस क्षण
जब मैं पारदर्शी हो जाऊँगा
मुझमें से होकर निकल सकेगा उजाला
तब मैं उजाले को अपनाऊंगा या उजाला अपनायेगा मुझे

या शायद जब सब कुछ एक हो
तो अर्थहीन जो जाता है
यह प्रश्न की किसने किसको अपनाये

अशोक व्यास
अक्टूबर ३१, ०९
9:24am
न्यू यार्क

Friday, October 30, 2009

नए सिरे से- (दिवस - १)



बस अचानक
रेत में हाथ डाल कर
इस बार मैंने
कर ही ली प्रार्थना,
इस बार मैं
नहीं लाया हूँ बीजों का उपहार
दो तुम मुझे
सब कुछ देने वाली धरती
कुछ ऐसा
जो सदा रहे साथ
जिसे लेकर जहाँ जाऊं
तुम्हारे पुत्र के रूप में हो पहचान मेरी
और भी न जाने
क्या कुछ कहता रहा था
सींचते हुए अपने आंसूओं से धरती को

धीरे धीरे पिघल कर बह गया दर्द
न जाने कैसे मेरे भीतर
बहने लगी थी नदी उल्लास की

ना जाने कैसे
यूँ हुआ जैसे मेरा हाथ
पेड़ की जड़ की तरह
लेकर धरती से रहस्यमयी कुछ
भर रहा था मेरी सूक्ष्म चेतना मे

हाथ जब निकाल कर
रेत में से
देखा अपने ही हाथ को
तो बदली बदली लगीं
अपने ही हाथ की रेखाएं

इस बार मेरे हाथ के घेरे मे
सिर्फ़ मै ही नहीं था
मेरा पूरा परिवार था
मेरे मित्र थे
मेरे संगी-साथी
जाने-अनजाने लोग ही नहीं
आकाश भी था, हवा भी थी, आग, पानी, धरती
सब कुछ कैसे दिखाई देने लगे थे मेरे हाथ की रेखाओं मे

अचरज भरी बात थी
पर सहज लग रहा था सब कुछ

चलने पर यूँ लगा जैसे
मैं कभी टूटा ही नहीं था
जैसे कभी रहा ही नहीं मैं एकाकी
और
धमक रहा था मेरे रोम रोम मे
वह भाव जिसे शायद प्यार कहा जा सकता है
ऐसा प्यार जो सिर्फ़ देना जानता है

और नए सिरे से
प्रस्तुत हुआ मैं
अपने आप को संसार को सौप देने के लिए
इस आश्वस्ति के साथ
की मैं वह हूँ
जिसका कभी अंत नहीं होता

अशोक व्यास
अक्टूबर ३०, ०९

कविता

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