Friday, October 30, 2009

नए सिरे से- (दिवस - १)



बस अचानक
रेत में हाथ डाल कर
इस बार मैंने
कर ही ली प्रार्थना,
इस बार मैं
नहीं लाया हूँ बीजों का उपहार
दो तुम मुझे
सब कुछ देने वाली धरती
कुछ ऐसा
जो सदा रहे साथ
जिसे लेकर जहाँ जाऊं
तुम्हारे पुत्र के रूप में हो पहचान मेरी
और भी न जाने
क्या कुछ कहता रहा था
सींचते हुए अपने आंसूओं से धरती को

धीरे धीरे पिघल कर बह गया दर्द
न जाने कैसे मेरे भीतर
बहने लगी थी नदी उल्लास की

ना जाने कैसे
यूँ हुआ जैसे मेरा हाथ
पेड़ की जड़ की तरह
लेकर धरती से रहस्यमयी कुछ
भर रहा था मेरी सूक्ष्म चेतना मे

हाथ जब निकाल कर
रेत में से
देखा अपने ही हाथ को
तो बदली बदली लगीं
अपने ही हाथ की रेखाएं

इस बार मेरे हाथ के घेरे मे
सिर्फ़ मै ही नहीं था
मेरा पूरा परिवार था
मेरे मित्र थे
मेरे संगी-साथी
जाने-अनजाने लोग ही नहीं
आकाश भी था, हवा भी थी, आग, पानी, धरती
सब कुछ कैसे दिखाई देने लगे थे मेरे हाथ की रेखाओं मे

अचरज भरी बात थी
पर सहज लग रहा था सब कुछ

चलने पर यूँ लगा जैसे
मैं कभी टूटा ही नहीं था
जैसे कभी रहा ही नहीं मैं एकाकी
और
धमक रहा था मेरे रोम रोम मे
वह भाव जिसे शायद प्यार कहा जा सकता है
ऐसा प्यार जो सिर्फ़ देना जानता है

और नए सिरे से
प्रस्तुत हुआ मैं
अपने आप को संसार को सौप देने के लिए
इस आश्वस्ति के साथ
की मैं वह हूँ
जिसका कभी अंत नहीं होता

अशोक व्यास
अक्टूबर ३०, ०९

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...