Tuesday, November 17, 2009

आवश्यक और अनावश्यक क्या है





कितना कुछ अनावश्यक
कर
लिया है जमा
अपने आस-पास
सोच कर घबराने से पहले
इस आश्वस्ति से
हो गया प्रसन्न
कि सुबह
लेकर आती है
नयी दृष्टि का उपहार
चीर कर अनावश्यक
देख सकता हूँ आवश्यक की ओर
अब भी
और
प्रसन्न इस बात पर भी कि
देर से सही
हुई तो सही
आवश्यक कि पहचान मुझे

आवश्यक और अनावश्यक क्या है
इसको तय करने वाली
स्थूल वस्तुएं नहीं
उनके साथ हमारा सम्बन्ध होता है

जीवन सम्बंधित होने का नाम है
सम्बंधित हो पाना
एक उपहार है
एक वरदान है

आवश्यक ये है
कि हम इस उपहार का
उपयोग ऐसे करें
कि जीवन खो ना जाए

मानो या न मानो
सम्बन्ध तो सूक्ष्म ही है
जितना दिखता है
उससे कहीं अधिक होता है

होता है उनके लिए
जो इसे महसूस कर पायें

महसूस कर पाते हैं वे
जो आवश्यक पर दृष्टि बनाये रख पाते हैं

आवश्यक जीवन है

अपनी इच्छाओं का चश्मा लगा कर
या
इर्ष्या का लेप कर
अक्सर हम
किसी एक कामना के पूरा होने को
जीवन से बड़ा मान लेते हैं

अपनी सांसों में धरे
अनंत सौंदर्य को नकारते हैं

अपने भीतर उतरे
सीमारहित आनंद को अनदेखा कर

अटका देते हैं
अपने अस्तित्व का बोध
किसी एक चाहत के साथ

एक के बाद
दूसरी चाहत

दूसरी के बाद तीसरी

चाहतों की श्रंखला में उलझे
हम बार बार
स्वयं पर
बंदी होने का संस्कार पक्का करते जाते हैं

बस फिर यूँ होता है
रोते हैं
कसमसाते हैं
व्यथा उपजाते हैं

हर मौसम का बुलावा
अनसुना कर जाते हैं



ये मान कर जीते हैं
मुक्ति तो छल है

बंधन को सच्चा मान कर जीते हैं

बंधते जाने के नए नए तरीके बनाते हैं

कभी अहंकार को अपना सर्वस्व बना
कर बाँध जाते हैं

कभी सम्मान की प्यास में छटपटाते हैं

बार बार अपने को विवश करने वाली
परिस्थितियों में घिरा पाते हैं

क्यों ऐसा होता है
हम असीम आनंद को छोड़ कर
शोक में घिरे रहने को सहज पाते हैं

आज फिर एक बार
जब
टटोल कर देखने बैठा अपनी ज़मीन
मूल का स्पर्श करना
आसान नहीं रहा
ऐसा लगता है


अपने चिर मुक्त होने का बोध
स्मरण साथ रखते हुए
कर पाऊँ जगत व्यवहार
बात इतनी सी
याद रख पाने के लिए
पुकार रहा हूँ उसे
जो
परम आवश्यक है
हमेशा

अशोक व्यास
नवम्बर १७, ०९
न्यू योर्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ४० मिनट

बात इतनी si

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