Monday, November 2, 2009

हर क्षण हो त्यौहार





हर दिन नयी सलेट सा
मांगे कुछ उपहार
चलो बाँट दें साथ मिल
दूर दूर तक प्यार



सोये अपने साथ में
जागे अपने साथ
चल मन उसकी बात कर
जिससे है हर बात



धूप सखी आकाश की
फ़िर फ़िर नगर बाज़ार
देखे किस सौगात से
खुश हो मेरा यार


मन में जितनी लहर है
सब का एक ही धाम
सब में सागर की छवि
जब मन हो निष्काम



आनंद आनंद गाइए
कर कर जग के काम
उसका ध्यान लगाइए
जिससे नित आराम

6
मुझमें तुझमें रात दिन
है जिसका संगीत
उसकी लय सुन सहज ही
होवे जग से प्रीत

7
कब कैसे आई यहाँ
बूँद ओस की देख
इसके सुंदर सार से
मिटे रोष की रेख

8
अभी बरसता है अभी
वो आनंद अपार
जिसमें संग संग भीग कर
हर क्षण हो त्यौहार



विस्मित करती है मुझे
उसकी है एक बात
अपना रूप लिखा गया
थाम के मेरा हाथ

अशोक व्यास
न्यू यार्क में प्रातः ६ बज कर ५२ मिनट



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