Monday, May 16, 2016

लो जा रही है कविता







































लो
जा रही है कविता
उस गली में
रंग इतने सारे लगा कर
मुझसे आँख बचा कर
मेरी धड़कन की ध्वनि लिए
रच रही एक सन्नाटा

 २

लो
मेरी कविता
मंदिर के प्रसाद सी
अर्पित होकर विराट को
बाँट रही है
अच्युत की ठाटदार अनुभूति
पल दो पल में
राजा बना देगी आपको
बच कर रहना
यदि रंक रहना प्यारा है
मेरी कविता में समृद्धि की
अक्षय धारा है



लो
खिलखिला कर
अब एक अनाम क्षण का हाथ थामें
लुप्त होने को है
वह
सहसा छोड़ कर
शब्द परिधान
फिर भरने को है
सूक्ष्म उड़ान
कविता
आपकी हो जाने के लिए
यही प्रक्रिया अपनाती है
शब्दों में आती है
शब्दातीत हो जाती है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, १६ मई २०१६

Saturday, May 14, 2016

मजे में हूँ




१ 
धूप आई 
झकाझक 
सुन्दर हो गया 
सब कुछ 
उजाले ने गुदगुदा कर 
मुझसे छीन लिया 
गीत मेरी विवशता का 

२ 

आँख मूँद 
तैरते हुए 
शांत जल पर 
पीठ के बल 
मैं ने हंस कर कहा 
किरण से 'मजे में हूँ'


अशोक व्यास 


आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...