Tuesday, March 22, 2016

अनंत का अभिनन्दन


1

Invoking that expression
जिससे व्यवस्थित हो जाए मन 
जाग्रत रहे सदा अपनापन 
होता रहे पग पग पर 
अनंत का अभिनन्दन 


२ 

And God said, let there be light
उन्हें दिखा आलोक, जिनका चिंतन था right
जिन्होंने सर्वत्र उसे देखा, उनके लिए कैसी fight
वरना तो daytime में भी, अज्ञान की night


3

लिख लिख कर मिटाया 
अपना ही एक साया 
फिर ढूंढता रहा यूं ही 
क्या खोया, क्या पाया 


४ 
एक एक शब्द में संसार समाया 
पर अच्छा है, दिख नहीं पाया
 वरना कैसे असर करती
ये भ्रम फैलाती माया 


अशोक व्यास 







Sunday, March 13, 2016

ये स्मृतियों की माया


आह 
ये कसक तुम्हारे न होने की 
कैसे किसी अनाम क्षण में 
सहसा उफनती है 
देखे - भोगे सत्य को भुला कर 
अब भी 
'काश' शब्द की चाबी से 
खोलता हूँ 
काल्पनिक जगत के द्वार 
और मान बैठता 
बैठे हो तुम सागर पार 

2

आह 
यह जो क्रंदन है 
यह जो एकाकीपन है 
इसमें भी तुम्हारी स्मृति का 
वसंत सघन है 
इसी से 
सहज प्रेम का प्रकटन है 
भीम चाचाजी आपकी 
अप्रतिम आत्मीयता को नमन है 

३ 
अहा 
इस संसार में सौंदर्य देखना दिखाना 
आपने जीकर जो सिखाया 
उसको लेकर मैं इस क्षण में 
पावन प्रेम को छू पाया 

मायाधिपति  का 
स्मरण संबंधों के साथ
मुझे जीना सिखाती है 
ये स्मृतियों की माया 


४ 
वाह 
जीवन मृत्यु, संयोग वियोग 
                                                                   कुछ समझ नहीं पाता हूँ
पर निश्छल करूणा के अनुभव 
छूकर खिल जाता हूँ
 फिर पोंछ कर अपने आंसू 
 यूं ही मुस्कुराता हूँ
                                                               जीवन मृत्यु, संयोग वियोग 
समझ नहीं पाता हूँ

क्या छुपा था भीम चाचाजी
की उनके स्मरण में 
शाश्वत की सुवास पाता हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१३ मार्च २०१६

 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...