Saturday, December 6, 2014

अनंत का नम स्पर्श


रुकता नहीं 
रुक रुक कर भी 
चलता जाता है 
एक कुछ 
भीतर मेरे 
जिसके संकेत पर 
देख देख कर उसको 
सुन्दर हो जाता है 
हर संघर्ष 

हर पीड़ा के पार 
पहुँच कर 
लगता है 
हो गयी अनावृत 
उसकी स्वर्णिम आभा 
कुछ और अधिक 
पहले से 

आश्वस्त आधार पर भी 
ना जाने कैसे 
रच देता वह 
कुछ ऐसे कम्पन्न 
की मिल जाता मजा 
लड़खड़ा कर सँभलने का,

विराट की 
विनोदप्रियता पहचान कर 
कभी कभी 
अनंत का नम स्पर्श 
झलका है 
मेरी मुस्कान में भी 
और तब तब 
कृतकृत्य हुआ हूँ 
पहले से कुछ ओर अधिक 

इस धन्यता पर 
सवाल उठाते सन्दर्भ 
छीन लेना चाहते 
मुझसे 
परिपूर्णता का बोध 
और मैं 
द्रौपदी के चीर सी 
अनवरत श्रद्धा से 
उसकी मर्यादा बचाना चाहता 
अपने भीतर 
जिसका नाम शाश्वत सत्य है 
जुलाई १३ २०१४ 

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