Saturday, December 17, 2011

पुनर्जन्म




एक दिन अचानक
सब कुछ नया नया सा
जैसे हर अक्षर का विन्यास 
पहली बार उभर रहा हो मानस में
जैसे सीखने के लिए
शेष है अनंत पथ
और
यह आस्था भी
सहचरी हो चले सहज ही
की सीखने वाला भी
रूप है अनंत का
 
यह
सीखने-सिखाने का
रसमय खेल
एक दिन अचानक
यूँ नया हो सकता है
पुरानी सोच के साथ
मेल नहीं खता यह अनुभव
 
क्या इसी को
पुनर्जन्म कहते हैं?
 
 
 
अशोक व्यास
न्यू योर्क, अमेरिका 
१७ दिसम्बर २०११            

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

पुरानी विकृतियों का त्याग ही पुनर्जन्म है।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...