Friday, May 13, 2011

खो गए जो शब्द


खो गए जो शब्द
घुल कर हवा में 
स्पर्श की परिधि से परे
दृष्टि की सीमा लांघ कर
एक अज्ञात स्थल पर
उतार कर
अर्थ के वस्त्र
आलोकित शून्य में विलीन
उन शब्दों के उद्गम से
मेरा जो सम्बन्ध रहा
उस सेतु पर
अब भी
अंतिम पुष्प नहीं चढ़ाये हैं
एक लकीर आस की
नहीं करने देती विदा
तुम्हें
ओ अदृश्य स्थल के निवासी
ह्रदय में 
तुम्हारी जगमगाहट बनी हुई है 
अनवरत 

अशोक व्यास
१३ मई 2011        

2 comments:

Rakesh Kumar said...

ओ अदृश्य स्थल के निवासी ह्रदय में तुम्हारी जगमगाहट बनी हुई है अनवरत

सुन्दर दार्शनिकता का सुखद अनुभव हुआ.
अशोक जी अंत:करण में बहुत गहन विचरण करते हैं आप.आभार.

प्रवीण पाण्डेय said...

वह जगमहाट जिसमें सब दिखता है।

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