Tuesday, May 10, 2011

आत्म-मिलन का क्षण


शांत शांत शांत
मन हो रहो न शांत
अधीरता से 
खो जाता है कविता का प्रान्त

अभिव्यक्ति नहीं
अनुभूति है कविता

शब्द में नहीं
शब्द के पीछे 
वो जो एक
नदी सी बहती है
भाव की,

जिसमें  झिलमिलाता है
आत्म-मिलन का क्षण
उस नदी का स्पर्श कविता है

सुनो ना
जब तक नहीं होओगे शांत
छुपी ही रहेगी वह नदी
कविता दोहराना नहीं
नई तरह से अपने आपको पाना है

और स्वयं को पा लेने पर
एक मुस्कान सी जो फूटती है
सिर्फ आँखों से ही नहीं
रोम रोम से तुम्हारे
उस मुस्कान का आलोक कविता है

शांत शांत शांत !


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १० मई २०११   
      

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

शान्ति देती अभिव्यक्ति।

कुश्वंश said...

its nice to see your blog and creations,thanks for writing excellent poems in hindi,

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