Wednesday, May 4, 2011

मझधार की स्मृति



अच्छा हुआ
आई बरखा
धुले हुए पत्तों के साथ
स्वच्छ हो गयी
कामना

पलट कर 
देखते हुए
कितने समीप आ जाते हैं
बरसों पहले बीते क्षण
किसी चुनौतीपूर्ण अनुभव का स्वाद लेते हुए
फिर से
सहेज कर 
स्वयं को
तुम्हारे चरणों में 
अर्पित करने की ठान कर
मुक्त हो लेते
चिंताजनक अहंकार से


इस पार आकर भी
मझधार की  स्मृति
सहसा धकेल सकती है
भय, व्यग्रता, अनिश्चय और संशय की वर्तुल गति में
इस पार आकर भी
जेब में धरा 
किसी प्राचीन युग का सिक्का
ले जा सकता है
किसी दूसरे लोक में

यात्रा के लिए
टिकिट से अधिक महत्वपूर्ण है
मन की तैय्यारी
और इस तैय्यारी के लिए
कुछ नया करना होता है
हर बार
क्योंकि मन
नित्य नूतन का चिर सखा है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ मई २०११    
 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

काश यह वर्षा होती रहे।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...