Thursday, December 29, 2016
Friday, November 4, 2016
अपने सपनो का सामान
अपने से बतियाना
कविता के साथ बैठ
यादों को सुलगाना
कभी बचपन में उतर जाना
कभी जवानी में ठहर जाना
उम्र के इस मोड़ पर जब
समीप होने लगे ढलान
इंसान टटोलता है
अपने सपनो का सामान
सीढियो पर रुक हुआ गान
बोझ सा शिकायती सामान
२
आखिर सब कुछ है अपने आप पर
अपने आरम्भ के आलाप पर
विस्तार का नहीं कोई छोर
अपने को बांधे अपनी ही डोर
जीवन बीतते बीतते
कुछ नया रचने, कुछ नया गढ़ने
कुछ नया लिखने, कुछ नया पढ़ने
कोई भीतर बार बार कसमसाता है
नूतन निर्माण के लिए उकसाता है
एक ढर्रे में चलते जाना नहीं सुहाता है
बार बार यह प्रश्न उभार आता है
अपने समय को बनाता हूँ मैं
या समय ही मुझ बनाता है ?
अशोक व्यास
न्यूयार्क, शनिवार, नवम्बर ५ २०१६
Tuesday, October 25, 2016
पर दादी हम राक्षस तो नहीं हुए न ?
लौट सकता हूँ अपने आप में
कभी भी
यह मान कर
उम्र भर
बाहर ही बाहर
घूमता रहा हूँ
आखिर
थक हार कर
विश्राम करने
घर लौटने की तड़प लिए
ढूंढने निकला जब
रास्ता भीतर का
कितना कुछ बदल गया है
झूठ मूठ के रास्ते
इतने सारे बना दिए
इतने बरसों में
की सचमुच अपने भीतर लौट पाने की
सामर्थ्य
खो गयी लगे है
और अब
संसार के मेले में
जब लगता है एकाकी
पाने और खोने के खेल से परे
अपनी पूर्णता की आश्वस्ति भी
सरक गयी है कहीं
लो
इस सब दार्शनिकता के धरातल से
अलग नहीं हो तुम भी
साथी हो मेरे
मानोगे
अगर बताऊँ
पास वर्ड मेरे फ़ोन और कंप्यूटर के
काम नहीं कर रहे
इसी की बैचेनी है
किसी के नंबर भी तो याद नहीं
दादी की कहानियों में
तोते में जैसे
किसी राक्षस की जान जुडी होती थी
डिजिटल तोतों में
छुपा ली है हमने अपनी अपनी जानें
पर दादी हम राक्षस तो नहीं हुए न ?
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ अक्टूबर २०१६
Wednesday, October 19, 2016
दीप पर्व उजियारे की पुकार है
दीप पर्व उजियारे की पुकार है
अँधेरा छोड़ कर ही विस्तार है
ज्ञान में ही जीने का सार है
दीपावली पावन मंगल श्रृंगार है
इस बार
दीपोत्सव कुछ ऐसे मनाएं
राम का नाम ले
संकोच के घेरे से बाहर आएं
अपनी प्रचुर संभावनाएं
नूतन दृष्टि से अपनाएँ
विकास की ओर
ठोस समर्पित कदम बढाएँ
दीपावली
न मेरी न तुम्हारी
ये आलोकित सौगात
है हमारी
अपनेपन का ओजस्वी नाम है दीपावली
मानवता का राजमार्ग, ये नहीं क्षुद्र गली
दीपोत्सव सकारात्मक चिंतन का
स्वच्छ सुदर्शन आँगन
मधुर पकवान, नए परिधान
दीप पर्व पर आपका अभिनन्दन
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ अक्टूबर २०१६
Sunday, October 9, 2016
दुलार रही जगदम्बा
१
टप टप
बूँद बूँद
आशीष
भोर फटने से पहले ,
लगा अपनी छाती से
दुलार रही जगदम्बा
२
मुस्कान माँ की
हर लेती आशंका
बिसरती अपेक्षा आकार की
हाथ थाम मेरा
खेल खेल में
भागती साथ मेरे
फिर रुक कर
खिलखिलाती है
हंस हंस बताती है
माँ पर सब छोड़ कर देखो,
मैय्या तुम्हें कहाँ से कहाँ पहुंचाती है
३
सब 'माँ' पर छोड़ा
तो मेरा क्या?
मायूसी से पूछा जब
मूक नैनों ने
बोल पडी माँ
अपने नैनों से
'तुम्हारा?"...
"तुम्हारी माँ है ना!"
४
"पर?",,
ठीक है
हंसी माँ
खिलखिलाई
अपने रूप रूप में समाई
पर जाते जाते ये बात बताई
"ठीक है." तुम 'पर' का खेल रचाओ
अपनी मैं की धुरी पर अनुभव सजाओ
बुला लेना मुझे
जब खेलते खेलते थक जाओ
दौड़ी आऊंगी मैं,
जब जब भी तुम बुलाओ
५
आज मैं ने माँ को बुलाया
अपने आंसूओं का समंदर दिखाया
अपने हार के चिन्हों को भी नहीं छुपाया
संशय के जंगलों की
कंटीली झाड़ियों का किस्सा सुनाया
मेरी हालात देख माँ का मन भर आया
थोड़ा संभला जब तो समझ ने सुझाया
शायद ऐसा इसलिए हुआ
क्योंकि मैं ने माँ को बिसराया
६
माँ हाथ पकड़ कर
मेरी कलम चलाओ
अपने महिमा
अपने शिशु से लिखवाओ
छुड़ा दो अब 'पर' मुझसे
मेरा ये 'मैं' का खेल हटाओ
क्षमा करो माँ , मूढ़ हूँ
अब मुझे छोड़ कर न जाओ
अशोक व्यास
रविवार, दुर्गाष्टमी
९ अक्टूबर २०१६
न्यूयार्क
Saturday, September 24, 2016
समय सीमा पार
लिखने वाले के
असंतोष और त्रुटि का
परिणाम
पृष्ठ को भुगतना होता
फट फट कर मिट जाने का
अंजाम
२
क्या इसी तरह जगत लिखने वाला
हमारी अपूर्णता पर कसमसाता
नए सिरे से
हमे न रच देने साँसों की श्रृंखला पर
विराम लगाता
३
शब्द अब
समय सापेक्ष
होकर भी
समय सीमा पार है
लिखना
अपने से
वहां जुड़ना है
जहां सीमातीत विस्तार है
अशोक व्यास
१५ सितंबर २०१६
न्यूयार्क,
विस्तार से आलिंगनबद्ध
१
यह एक
फ्रेम सा
बना कर
मुक्ति का
प्रसन्न होता
सज कर
शौ केस में वह
नहीं देखता
मूढ़ता अपनी
आड मालाओं की
ढक लेती है
क्षुद्रता
इस तरह
झूठ मूठ
विस्तार से आलिंगनबद्ध होने का संतोष
जो है उसके पास
वह भी छल ही हुआ न ?
२
टूटन
दरार
रिसता है जो
समय है
मैं हूँ
या कुछ और
जिससे अलग हुए बिना
खिल नहीं सकता
पूर्ण स्वरुप मेरा
३
आज फिर
उनकी आँखों से
शाश्वत धवल करूणामय
तरल सा
छल छला कर
मुझ तक आया
एक महीन मधुर क्षण में
मैं
सहज ही
कृपा लहर में नहाया
ये कुछ न होते हुए
सब कुछ होना
सुन्दर कैसे इतना
जैसे मैं ने
नव जीवन सा पाया
२२ अगस्त २०१६
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क
Friday, September 9, 2016
Wednesday, September 7, 2016
शब्द का मौन
अब भी
अदृश्य भूमि में
हर दिन
शब्द कुदाल से
खोदता हूँ
पसीने से लथ पथ
हांफता हांफता
एक वह हीरा पहचान का
जिसकी चमक से
थम जाए
मेरा मुरझाना
२
नूतन रश्मियों से आल्हादित
हर दिन
छोड़ देता
अपनी पहचान बीच राह में
बैठ जाता
सुस्ताने
और फिर
भूल ही जाता
अपनी खोज
३
एक नया दिन
एक नई खोज
नित्य नूतन शब्द
मुस्कुरा कर
बढ़ाते हैं हौसला
देते हैं दिलासा
होगा
हो जाएगा
मिलेगा
मिल जाएगा
करो प्रयत्न
और प्रयत्न
रुको मत
मत रुको
सीमित नहीं
यह अदृश्य भूमि
इसकी गहराई में
छुपे हैं
अगणित अक्षय चमक वाले हीरे -मोती
४
सहसा
रुक कर
सुस्ताता नहीं
पूरी तन्मयता से
सुनता हूँ
शब्द का मौन
सुन सुन
हो जाता तन्मय
सरक आता
होने और पाने की चाह से परे
हँसते हँसते
निशब्द बोलता हूँ
नीले आकाश से
अक्षय चमक वाला वो हीरा
जिसे ढूंढता रहा हूँ
कहीं
मैं ही तो नहीं ?
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ७ सितंबर २०१५
Tuesday, September 6, 2016
अब मेरा उद्धार
१
बंधन हैं या पर्दा पड़ा है आँखों पर
देख नहीं पाता दूर तक
अटका हूँ
इस घेरे में
तोड़ने इसे
कहाँ से लाऊँ
हथौड़ा, कुदाल
और
वह सशक्त इच्छा
जो हिलाये, डुलाये
चलाये
इन जड़ हुए हाथों में
नूतन नृत्य लय
मचल आये
२
मैं वहीं हूँ अब तक
था जहाँ
और रह गया वहीँ
जहां से
बढ़ती रही है
आगे और आगे
दुनियाँ
और अब
पिछड़ जाने की रुलाई भी
ठिठकी है, ठहरी है
भीतर ही
न पिघलता झरना
न उबलता लावा
३
जमे जमे
कैसे जानूं जीवन
कैसे जगाऊँ
कुछ उत्तेजना
कुछ गर्माहट
कुछ ललक
होने- करने - दिखाने की ,
सही -गलत
सफलता-असफलता के प्रश्न से परे
कैसे बढे कदम
अपने आप में
आत्मीयता से
अपनी पूर्णता में
४
लौटना नहीं संभव
बढ़ना आता नहीं
इस मध्य स्थल पर
त्रिशंकु सा अटका
मैं
कितनी सदियों से
पर आज फिर
हुई है हरारत
कांपते होंठों पर
उतरी है पुकार
करो न
अब मेरा उद्धार
- अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ सितंबर २०१६
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सुंदर मौन की गाथा
है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...
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एक मैं निश्चल मुझे अब भी तुम्हारी याद आये है मुसलसल नहीं सूखा मेरे दाता, मेरी आँखों का ये जल नहीं समझा जगत क...
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है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...









