Thursday, November 27, 2014

नहीं हूँ मैं नश्वर



ठहर कर देखता हूँ 

कभी अब 
 वो रास्ता 
जहाँ पर चल कर आया 
काल की पगडंडी पर 
सुनती है 
अपनी चीख-पुकार 

दीखते हैं कुछ ऐसे क्षण 
जिनमें था हाहाकार 

अनमने मन के चित्र 
वो छटपटाहट का श्रृंगार 

ठहर कर देखता हूँ 
उसकी करूणा 
कैसे मेरे 
मूढ़ता के खेल से 
लेकर आई मुझे इस पार 

२ 

ठहर कर देखता हूँ 

ठीक से देखता 
तो तब भी 
शायद देख पाता 
फूलों की पगडंडी 
संतोष का सार 

अनंत की आराधना 
 से आलोकित 
हर दिशा से व्यवहार 

३ 

ठहर कर 
अब 
चलता हूँ 
ऐसे 
जैसे 
परम तृप्ति का आल्हाद 
नित्य है मेरे साथ 
यह कैसी है बात 
जिसको छूकर सुन्दर हो जाती हर बात 

यह 
कैसे आंनद का ज्वार 
जिससे छलछलता  प्यार 

मुझे बंदी नहीं बनाती नासमझी की दीवार 
अब दिखाई दे जाता सब कुछ आर -पार 

४ 

अब 
यह जो है 
जिससे है 
जिसके लिए है 
स्मरण उससे अपने का सम्बन्ध का 
बना देता है 
उत्सवमय हर क्षण को 

निर्विकार, निर्भय
चिर रसमय 
मैं 
न वह 
जो था तब 
न यह 
जो दिख रहा अभी 
मैं 
वह 
जो भोगते हुए सब कुछ 
नित्यमुक्त 
परे हर अनुभव के 
रचता अनुभव 
भांति भांति के 

मैं रचना उसकी 
रचयिता है जो 
रचाव के पथ पर 
फैलता उसके साथ 
उसके लिए 
और 
सिमटते हुए 
उसके अंक में 
तृप्त निरंतर 
हर स्वर में मेरा स्वर 
नष्ट होता दिखूं भले 
नहीं हूँ मैं नश्वर 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२७ नवम्बर २०१४ 


Sunday, November 9, 2014

विस्मित करता क्षण

कविता मेरी 
अब निकल कर मेरे आँगन से 
जा पहुँची है मैदान में 

और मैं 
इसके विस्तार से अनभिज्ञ 
इस अब भी 
सहेज कर सुला देना चाहता हूँ 
ठण्ड से बचाने 
सुरक्षित लिहाफ में 

२ 

कविता मेरी 
आतुर है 
मुझे  सम्बन्ध के नए समीकरण का 
रूप दिखाने 
नहीं रुकती 
अब वो मेरे पास 
यूँ ही बतियाने, मुस्कुराने, खिलखिलाने 

कविता मेरी 
अब छोड़ रही है 
पुरानी ज़मीन 
भरते हुए नई उड़ान 
इस तरह दे रही है 
मेरी और ध्यान 

जैसे दे रही हो 
 की पहचान 

३ 

मेरी ही हो न तुम 
मेरी ही रहोगी न तुम 
मैं अब भी 
आश्वस्ति 
आश्वासन 
भरोसे की नई मुहर मांग रहा हूँ 
कविता से 

और सहसा 

पुष्प कालातीत वृक्ष के 
मेरी चेतना पर 
उतर आये न जाने कहाँ से 

४ 

कविता 
छोड़ रही है 
सन्दर्भों का घेरा 
पूरी तरह मुक्त 
सर्व व्यापी कविता 
मेरी कैसे हो सकती है 

यदि मैं हूँ 
यह सीमित 
आकार 
हाड-मांस का 

५ 

कविता 
न मेरी 
न तुम्हारी 

हमारे होने की कालबद्ध रेखाओं से परे 
एक आधार 
कविता मेरी 

छूट कर मुझसे 
मुक्त होते होते 
दिखला रही है 
मुक्त स्वरुप मेरा 

६ 


 कविता अब 
आवश्यकता नहीं 
आनंद है 
उत्सव है 
गीत मेरे होने का 
 कोई सुने ना सुने 
कविता 
 मेरे होने की 
अनवरत गूँज का 
एक अंश 
जिसमें झिलमिलाती है 
पूर्णता मेरी 


इस झिलमिलाहट को 
नहीं बाँध सकता मैं 
न ही बंधना है 
इसकी दीप्त आभा में 

कविता 
नदी के सागर मिलन का 
विस्मित करता क्षण 
रसमय करता जीवन 
इस मिलन उत्सव में 
सम्मिलित होने का 
निमंत्रण 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क 
८ नवम्बर २०१४ 


Saturday, November 8, 2014

मूँद कर आँखे

वो फिर खेल रहा था खेल 
आँख बंद करके चलने का 
कुछ कदम चलता 
आँख खोलता 
दृष्टि से दूरी टटोलता 
और फिर 
बढ़ जाता 

कुछ कदम मूँद कर आँखे 

खेल 
यह 
आँखे मूंदने और खोलने का 
आखिर तब 

हो चला खतरनाक 
जब 

आँखों ने बंद होने के बाद 

ठीक समय पर खुलने से इंकार कर दिया 

पर उस क्षण 
न जाने कैसे 
पर हो चला था वह 
खतरे की समझ से भी

एक अव्यक्त आश्वस्ति 
बिछा गया था कोई 
भीतर उसके 
ऐसे 
की 
आँख मूंदते हुए भी 
जाग्रत रह गया  था वह 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
८ नवम्बर २०१४ 

Wednesday, October 22, 2014

अब भी होता है ऐसा


(स्थान- बीकानेर हाउस, आबू पर्वत) चित्र - अशोक व्यास 

१ 
अब भी होता है ऐसा 
दिन ऐसे 
जैसे नया 
नया यानि की 
सोचना होता है 
हूँ कहाँ 
जाना कहाँ है 
क्यों जाना है 
किसलिए जाना है 
सोचना होता है 
इस दिन का 
क्या बनाना है 
इसके उपलब्ध होने का मूल्य 
कैसे चुकाना है 

२ 

अब भी 
होता है ऐसा 
जाने हुए को फिर से जानने में 
एक नए आविष्कार का बोध होता है 
वो जो हमेशा साथ रहा है 
उसके पास होने का 
एक नया अहसास होता है 

मैं 
अपने घर से 
नवजात शिशु की तरह निकलता हूँ 
दिन ढलता जाता है 
पर मैं नहीं ढल पाता हूँ 
मुझमें ये कैसा सूरज है 
जो कभी न अस्त होता है 

अब ये जो शब्दों के बीच में 
नए पुष्पों वाले पौधे 
जो भी बोता है 
जिसको देखे से 
अनवरत मुक्ति का 
परिचय होता है 
कैसे उसका नाम लूँ 
जिसके नाम से 
नाम और रूप का 
ये बंधन खोता है 

३ 

अब जब 
नूतनता की लय 
में 
मेरा नित्यनूतन रूप 
उजागर होता है,
न भय, न संशय 
उसकी अनुग्रह किरण में 
आश्वस्ति का सागर सा 
छुपा होता है 
अब न जाने क्यों 
अक्षय  आनंद के स्त्रोत सा लगता है 
यह एक वाक्य पुराना 
की 
जो होता है 
अच्छे के लिए होता है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२२ अक्टूबर २०१४ 




Thursday, October 16, 2014

शुरू हो चुका है नाटक


 खेलने एक नाटक 
धकेला तो गया है मंच पर 

पर बताया तो नहीं गया 
कब हटेगा पर्दा 
 कहाँ बैठे हैं दर्शक 
और 
यह भी तो नहीं पता 
कब मंच से उत्तर कर 
बैठ जाना है 
दर्शक दीर्घा में 
 
अवसर जो है उपलब्ध 
पहचान इसके महत्त्व की
आई नहीं साथ 
 
शुरू हो चुका है नाटक 
बीत रहा है समय 
 
लेखक - निर्देशक सब 
बैठ गए हैं छुप कर 
पात्रों के भीतर 
फिर भी 
अंतिम दृश्य तक 
पहुँचते पहुँचते 
अस्पष्टता 
अपनी भूमिका के प्रति 
बनी रह जाती 
ज्यों की त्यों 
ऐसा क्यों ?
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
अक्टूबर १६, २०१४

Wednesday, October 15, 2014

वह जो समर्पित है


समय है 
संयोग है
या  
समझ का सही उपयोग है 

सफलता का रहस्य ढूंढने वाला विश्लेषण 
कभी भी 
सर्वकालिक समाधान तक 
नहीं ले जा सकता 

हर बार 
एक नूतन किरण 
अनिश्चय की 
आ धमकती है 
सम्भावनाओ के आँगन में 
नए नए रंग खिलाती 
नए नए दृश्य दिखलाती 

विश्लेषण में 
जो कुछ मिलता है 
उसका जीवन अल्प है 
समर्पण में 
वह मिलता है 
जो निर्विकल्प है 

विश्लेषण करने वाला 
समर्पण करने से 
दूरी बनाये रखने को 
बाध्य है 
और 
वह जो समर्पित है 
परम आनंद में मगन है 
उसके लिए तो 
शुष्क विश्लेषण 
असाध्य है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१५ अक्टूबर २०१४ 


Saturday, October 11, 2014

अमृत की बूंदों का स्वाद


प्रश्न ये सारे 

जीवन मृत्यु के 

अतीत से वर्तमान और भविष्य को जोड़ते सूत्र में 
अपने बारम्बार बदलते प्रतिबिम्ब देख कर उभरने वाले 

और 
यह प्रश्न 
जो प्रश्न उठाने के औचित्य पर भी 
प्रश्नवाचक चिन्ह लगाते हैं 

समझ में नहीं आता 
हम 
जिन जिन सतहों के बीच 
अपना स्थान बनाते हैं 
वहां वहां 
बंधे बंधे क्यूँ रह जाते हैं 


२ 

बात जब फिसलती है 
कृपा के आलोक में 

घर्षण रहित मन 
अपेक्षाओं के तराजू में 
तौलता है 
अमृत की बूंदों का स्वाद 

और 
 अनुग्रह बरखा में  
छूट जाता
 आशा - निराशा का खेल ,

मुक्त विस्तार में मगन
तन्मय मन 
सुनने सुनाने से परे
अनंत की महिमा
में रम जाता है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 


Tuesday, September 30, 2014

शब्द कहलाते हैं - मैं ही ज्ञाता हूँ

१ 
यह जो हो रहा है 
इस क्षण 
इन शब्दों का उगना 
मेरा नियंत्रण नहीं है इस पर 

मैं तो साक्षी भर हूँ 

कर रहा हूँ अगवानी 
नहीं कर सकता मनमानी 
पूरे आदर से 
देखता हूँ इन शब्दों में 
संभावित अनंत 

अपने हिस्से की परत 
मैं नहीं चुनता 
बस वह जो चुना गया है 
मेरे लिए 
कृतज्ञता से ओत-प्रोत 
श्रद्धा से प्रस्तुत हूँ 
उसे अपना लेने 

२ 

अपनी निर्माण प्रक्रिया में 
मैं इस तरह 
अज्ञात का हाथ बंटाता हूँ 
 तत्परता से 
शब्द संकेत पर चलता चला जाता हूँ 
अनादि काल से चल रहे 
शब्द सम्बन्ध को निभाता हूँ 

अपने उद्गम का पता लगाते लगाते 
किसी चुपचाप क्षण 
उस अनुभूति में उत्तर जाता हूँ 
अपना परम विस्तार देख पाता हूँ 
शब्द कहलाते हैं 
तो कह जाता हूँ 
मैं ही ज्ञेय हूँ 
मैं ही ज्ञाता हूँ 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३० सितम्बर २०१४ 

काल प्रवाह में ...



मैं अब जानने लगा हूँ 
तस्वीरें भी झूठ हो सकती हैं 
क्योंकि 
वह सब 
जो जिया, भोगा, पाया-खोया 
काल प्रवाह में 
किसी एक क्षण 
व्यर्थ सा लग सकता है 
और 
वह 
जिसे हम व्यर्थ मानते हैं 
जिसमें हमारा अर्थ नहीं है 
सत्य कैसे हो सकता है हमारा ?

तो फिर क्या है 
जो झूठी तस्वीरों से 
हमारी और झांकता है 

क्या  हम 
अपनी अंतर्दृष्टि से 
आज भी पहुंचा पाते हैं 
सत्य किरण का नूतन स्पर्श 
उन सब स्थलों तक 
जहां जहां 
हम हो आये हैं 

हममें ये कैसा हुनर है 
आज को छोड़े बिना हम 
अतीत तक जाते हैं 
और भविष्य की टोह भी ले आते हैं 
इस तरह 
कालातीत होने का स्वांग तो भरते हैं 
पर कालमुक्त नहीं हो पाते हैं 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क 
सितम्बर ३०, २०१४ 




Thursday, September 25, 2014

लिख लिख कर मिटाया



लिख लिख कर मिटाया 
भाव को बिसराया 
थपथपाया था जिसने 
वो हाथ न आया 


मैं इस तरह साँसों के संगीत से लुभाया जाता हूँ 
नए रास्तों के बुलावे  पर यूं ही  मुस्कुराता हूँ 
कभी ठहरे ठहरे ही पूरी यात्रा कर आता हूँ 
और कभी चलते चलते भी ठहरा रह जाता हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२५ सितम्बर २०१४ 

Saturday, September 20, 2014

अपने होने की परम्परा



परंपरा में 
एक गति है 
उत्साह है 
सम्बल है 
प्रेरणा है 
पुकार है 

देखते हुए 
अपने होने की परम्परा 
समय सापेक्ष सन्दर्भों से छूट 
होता हूँ अग्रसर 
अनंत की ओर 
सहज ही 

क्रीड़ा सी हो जाती 
सारी चुनौतियाँ 
एक शंख बजता है 
एक पवित्र एकांत सा 
सुलभ हो जाता भीतर 

अपने अटूट स्वरुप में 
अनछुई सी आस्था 
उमड़ आती है 
सहसा 

कहते हुए भी 
बना रहता है मौन 

और 
बोध मौन के इस साक्षी का 
सुन्दर कर देता है 
मेरा हर क्षण 

मैं 
एक बिंदु से दुसरे बिंदु तक 
दृश्यमान जीवन के पार तक 
अपने होने की 
गहन आश्वस्ति लिए 

इस असीम सेतु की गोपनीयता का 
सम्मान करता हूँ 

मेरे होने की एक परम्परा है 
यह पहचान देने वाली श्रद्धा 
अपने से पूर्व और पश्चात देख कर 
बढ़ती जाती है 
इस तरह देखने वाली दृष्टि 
जिन चरणो से आती है 
उन चरणो में श्रद्धा ही 
मेरा निर्माण करवाती है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२० सितम्बर २०१४ 

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...