Saturday, September 24, 2016

समय सीमा पार



लिखने वाले के 
असंतोष और त्रुटि का 
परिणाम 
पृष्ठ को भुगतना होता 
फट फट कर मिट जाने का 
अंजाम 

२ 
क्या इसी तरह जगत लिखने वाला 
हमारी अपूर्णता पर कसमसाता 

नए सिरे से 
हमे न रच देने साँसों की श्रृंखला पर 
विराम लगाता 

३ 
शब्द अब 
समय सापेक्ष 
होकर भी 
समय सीमा पार  है 
लिखना 
अपने से 
वहां जुड़ना है 
जहां सीमातीत विस्तार है 


अशोक व्यास 
१५ सितंबर २०१६ 
न्यूयार्क,

विस्तार से आलिंगनबद्ध



१ 
यह एक 
फ्रेम सा 
बना कर 
मुक्ति का 
प्रसन्न होता 
सज कर 
शौ केस में  वह 
नहीं देखता 
मूढ़ता अपनी 
आड मालाओं की 
ढक लेती है 
क्षुद्रता 

इस तरह 
झूठ मूठ 
विस्तार से आलिंगनबद्ध होने का संतोष 
जो है उसके पास 
वह भी छल ही हुआ न ?

२ 
टूटन 
दरार 
रिसता है जो 
समय है 
मैं हूँ 

या कुछ और 
जिससे अलग हुए बिना 
खिल नहीं सकता 
पूर्ण स्वरुप मेरा 

३ 

आज फिर 
उनकी आँखों से 
शाश्वत धवल करूणामय 
तरल सा 
छल छला कर 
मुझ तक आया 
एक महीन मधुर क्षण में 
मैं 
सहज ही 
कृपा लहर में नहाया 

ये कुछ न होते हुए 
सब कुछ होना 
सुन्दर कैसे इतना 
जैसे मैं ने 
नव जीवन सा पाया 

२२ अगस्त २०१६ 
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क 



पुष्प प्रार्थना के


शब्द 
माटी 
बीज 
जल 
हवा 
आकाश 
वृक्ष 
जीवन 
प्रश्न - प्रश्न 
टूट - टूट 
उतर -उत्तर 
अँधेरे-अँधेरे 
नम नम 
गर्भ गृह में 
प्यास लिए 
पुनः प्रस्फुटित 
पल्लवित हो 
छायादार बनने की 
अर्पित 
कर रहा 
विराट समंदर में 
पुष्प प्रार्थना के 


-
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, 
२१ सितंबर २०१६ 

Friday, September 9, 2016

हंस हंस कर निहाल हुआ


अंक - १

अपनापन लिखता हूँ 
सांसो में 
पढता हूँ प्रेम सब की 
आँखों में 
जीता हूँ कुछ ऐसे 
हंस हंस कर 
पाता सब बातों ही 
बातों में 

हंस हंस कर निहाल हुआ 
उससे मिलना कमाल हुआ 
एक पल उसने देखा ऐसे
बैठे बैठे मैं मालामाल हुआ 

अशोक व्यास 
सितंबर ९, २०१६

Wednesday, September 7, 2016

शब्द का मौन



अब भी 
अदृश्य भूमि में 
हर दिन 
शब्द कुदाल से 
खोदता हूँ 
पसीने से लथ पथ 
हांफता हांफता 
एक वह हीरा पहचान का 
जिसकी चमक से 
थम जाए 
मेरा मुरझाना 

२ 

नूतन रश्मियों से आल्हादित 
हर दिन 
छोड़ देता 
अपनी पहचान बीच राह में 
बैठ जाता 
सुस्ताने 
और फिर 
भूल ही जाता 
अपनी खोज 

३ 

एक नया दिन 
एक नई खोज 
नित्य नूतन शब्द 
मुस्कुरा कर 
बढ़ाते हैं हौसला 
देते हैं दिलासा 
होगा 
हो जाएगा 
मिलेगा 
मिल जाएगा 
करो प्रयत्न 
और प्रयत्न 
रुको मत 
मत रुको 
सीमित नहीं 
यह अदृश्य भूमि 
इसकी गहराई में 
छुपे हैं 
अगणित अक्षय चमक वाले हीरे -मोती 

४ 

सहसा 
रुक कर 
सुस्ताता नहीं 
पूरी तन्मयता से 
सुनता हूँ 
शब्द का मौन 
सुन सुन 
हो जाता तन्मय 
सरक आता 
होने और पाने की चाह से परे 
हँसते हँसते 
निशब्द बोलता हूँ 
नीले आकाश से 
अक्षय चमक वाला वो हीरा 
जिसे ढूंढता रहा हूँ 
कहीं 
मैं ही तो नहीं ?


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
बुधवार, ७ सितंबर २०१५ 

Tuesday, September 6, 2016

अब मेरा उद्धार



१ 
बंधन हैं या पर्दा पड़ा है आँखों पर 
देख नहीं पाता दूर तक 
अटका हूँ 
इस घेरे में 
तोड़ने इसे 
कहाँ से लाऊँ 
हथौड़ा, कुदाल 
और 
वह सशक्त इच्छा 
जो हिलाये, डुलाये 
चलाये 
इन जड़ हुए हाथों में 
नूतन नृत्य लय 
मचल आये 

२ 

मैं वहीं हूँ अब तक  
 था जहाँ
और रह गया वहीँ 
जहां से 
बढ़ती रही है 
आगे और आगे 
दुनियाँ 
और अब 
पिछड़ जाने की रुलाई भी 
ठिठकी है, ठहरी है 
भीतर ही 
न पिघलता झरना 
न उबलता लावा 

३ 

 जमे जमे
कैसे जानूं  जीवन 
कैसे जगाऊँ 
कुछ उत्तेजना 
कुछ गर्माहट 
कुछ ललक 
होने- करने - दिखाने की ,

सही -गलत 
सफलता-असफलता के प्रश्न से परे 

कैसे बढे कदम 
अपने आप में 
आत्मीयता से 
 अपनी पूर्णता में 


४ 

लौटना नहीं संभव 
बढ़ना आता नहीं 
इस मध्य स्थल पर 
त्रिशंकु सा अटका 
मैं 
कितनी सदियों से 
पर आज फिर 
हुई है हरारत 
कांपते होंठों पर 
उतरी है पुकार 
करो न 
अब मेरा उद्धार 

- अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
६ सितंबर २०१६ 

Tuesday, August 23, 2016

डिजिटल सत्य



 डिजिटल सत्य है, जो चर्चा में हो वो सुहाता है 
उसके समीप जाकर हर कोई फोटो खिंचाता है 
फोटो को तुरंत फेसबुक पर लगाने में मजा आता है 
 और फिर लाइक्स काउंट करना भी बहुत भाता है 

हम भी इसी ट्रैक पर जाने अनजाने चलते जाते हैं 
जब किसी के साथ होने पर ढेर सारे लाइक्स पाते हैं 
किसी अकेले क्षण में हम ये सोचने पर मजबूर हो जाते हैं 
 पहचान साथ वाले की, मान अपनी, क्यूँ कर छले जाते हैं ?
- अशोक व्यास

Thursday, August 4, 2016

आसमान ने कहा कविता का अर्थ है विस्तार




१ 
कविता क्या होती है 
उसने चलते चलते हवा से पूछा 
हवा ने उसका सवाल पेड़ों की शाखाओं को सौंप दिया 

हवा में झूलती शाखाओं को देखते देखते 
वो अपना सवाल ही भूल गया 

२ 

कविता क्या होती है 
इस बार उसने बहती नदी से पूछा 
नदी ने इतराते हुए कहा 
बल खाते हुए 
अपने प्रियतम की तरफ जाती 
 प्रेयसी की चाल को कविता कहते हैं 


३ 

वह नदी की चाल देखता रहा 
 नदी में झांकते आसमान से 
ना जाने क्यूँ 
उसने फिर पूछ लिया 
क्या नदी सही कह रही है 

क्या कविता का सम्बन्ध गति से है 

नहीं तो 
आसमान ने कहा 
कविता का अर्थ है विस्तार 
विस्तार को खोलने वाले हर बिम्ब को सहेजना ही कविता है 



४ 

तुम्हारे लिए कविता क्या है 
इस बार नदी के किनारे ने 
उससे ही 
उसका सवाल पूछ लिया 

वो चौंक गया 
पर 
तुरंत ही बोल पड़ा 

मेरे लिए कविता का अर्थ है जीवन 

मेरा जीवन 
एक कविता ही है 


अशोक व्यास 

न्यूयार्क, अमेरिका 
आग ४ २०१६

Monday, July 4, 2016

हाँ मैं पागल सरीखा हूँ




यही होता है
बरसों से
मैं सब कुछ भूल जाता हूँ
जो पाना है
जो खोया है
सभी के पार जाता हूँ

मेरे घर की ही देहरी पर
फिर से खुद को बुलाता हूँ

ये किस्सा है बड़ा ज़ालिम
इसे सबसे छुपाता हूँ

हुनर ये अपने होने का
न जाने क्यूँ गंवाता हूँ

यही होता है
देखा है
ख्वाहिशे छोड़ आता हूँ
पहाड़ी रास्तों पे फिर
मुक्ति के छन्द गाता हूँ

क्या पाया
और क्या खोया
बही- खाते भुलाता हूँ
परे खोने औ' पाने के
यूँ ही बस मुस्कुराता हूँ

ये एक
स्वर्णिम सी अनुभूति
साथ ले बैठ जाता हूँ
ये चुप्पी
माँ के जैसी है
यहाँ में पनप जाता हूँ

और माँ के कहे चल कर
मैं अपनी मैं भुलाता हूँ
कभी ऐसा भी लगता है
मैं बन बन मिटता जाता हूँ
कभी ऐसा भी लगता है
अरे मैं ही विधाता हूँ

माँ मन के खेल देखे है
मैं जब ये जान जाता हूँ
फिर से चुप के अहाते मैं
मौन गंगा नहाता हूँ

हाँ मैं पागल सरीखा हूँ
मैं सब कुछ भूल जाता हूँ
किसी क्षण के झरोखे से
मैं खुद के पार जाता हूँ

सैर ये अनकही कह कर
याद जुगनू बुलाता हूँ
मैं सदियों से यही तो हूँ
न आता हूँ, न जाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ जुलाई २०१६


Sunday, July 3, 2016

तुम्हारे होने के अहसास से ..



दिन यूँ ही फिसलने लगा है फिर 
बैठे बैठे 
देख रहा 
वक्त का सरकना 

यह घना एकांत सा है जो 
इसे तोड़ने 
करता नहीं धमाका 
धीरे धीरे 
बुलाता हूँ 
तुम्हें फिर 


तुम आओ 
तो चिड़िया चहके 
हवाओं में महक तुम्हारी 
घुल जाए तो मस्ती छाए 

सपनो के रंग फिर से 
देने लगें आसमान पर दिखाई 
मुझसे बात करने लगे 
मेरी परछाई 

तुम आओ 
तो 
सावन के झूलें की पेंगे 
झिलमिल खिलखिलाहट सी रचाए 

तुम आओ न 
बस तुम्हारे होने के अहसास से ही 
बदल जाती है दुनिया 

मैं कुछ नहीं करता 
तब भी 
करता हूँ इतना तो 
की तुम्हारे होने का अहसास 
जगाता हूँ 

इस तरह बार बार 
जीवित रहने की 
आश्वस्ति छू पाता हूँ 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
जुलाई ३, २०१६

Friday, July 1, 2016

गोल गोल चिंतन



जैसा दिखता है 
वैसा नहीं 
जैसे दिखाया जा रहा है 
वैसे देखो 
और यदि न भी देख पाओ 
तो कम से कम 
कहो तो वही 
जो कहा जा रहा है 
सबके द्वारा 
पीढ़ी दर पीढ़ी 

जैसे दिखता है 
जैसे महसूस होता है 
वह तुम हो 
ऐसा मानना ठीक सही 
पर ऐसा कह कर 
चुनौतियाँ बुला लोगे अपनी ओर 

तुम्हारी सोच 
बेशकीमती सही तुम्हारे लिए
पर समझते हो न
इस सोच की कीमत 
खतरे से चुकानी पड़ सकती है
 

खतरे वे 
जो दीखते नहीं 
पर हैं 
डरना ठीक हो या न हो 
दस्तूर है 
इस दौर का 
डर डर कर जिओ 
और निडर होने का ढोंग रचाते रहो 

जैसे दीखता है 
वह 
शब्दों की बाँहों में 
कैसे समेटें 
देखे फैला फैला कर 
सोच अपनी 
वहां तक 
जहाँ 
संघर्ष होता है 
होने का स्वांग भरने और सचमुच होने में 

इस संघर्ष में 
कितनी बार हारे हो 
नहीं कहा न किसी से 

इस बार जीत भी हार जैसी ही है 

हमारे दौर में 
 मृत्यु से न डरने की फितरत 
स्याह रंग से प्रेम करने वालों के पास अधिक  है 
हम डरते हैं 
क्योंकि 
सभ्यता की चादर में 
सुरक्षा का जो घेरा है 
उसने हमारे खून में 
ज़िंदगी के प्रति 
इतना प्रेम भर दिया है 
की हम डरे डरे से ही रहते हैं 

पर डर डर कर जीना भी 
एक तरह से 
मृत्यु सरीखा ही हैं न 
बस
यह वहम सा बना है 
की हम ज़िंदा हैं 

जी लें 
जब तक जी सकें चुपचाप 
या फिर 
 बोल कर 
सुने सुनाएँ 
अपने होने की थाप 

निडर होने की भी एक मस्ती है 
एक आनंद है 
सत्य के साथ खेलने में 
अनुपम मकरंद है 

गोल गोल चिंतन 
इस धुरी के 
इर्द गिर्द आता जाता है
सत्य के बिना 
सांस भले आये-जाये 
 जिया कहाँ जाता है ?

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
जुलाई १, २०१६
 

 

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...