Thursday, October 29, 2015



राजनीती का इतिहास से क्या होता है नाता ?
कैसे राजनीतिज्ञ काल कर्म लेखन बदलवाता?

अब मनमाना लिखने पर होने लगी निगरानी 
तो असहिष्णुता का नाम लेकर ये खींचा तानी 

बौद्धिक भ्रष्टाचार की ये कहानी है पुरानी 
सबने अपनी भड़ास निकालने की ठानी

अब होना ही है दूध का दूध पानी का पानी 
जन जन लिखेगा नए भारत की कहानी 

अशोक व्यास 
२९ अक्टूबर २०१५

Wednesday, October 28, 2015

पूर्वाग्रह




अब फिल्म वालों ने भी टिकट कटाया
सुर्ख़ियों में आने का नया पथ अपनाया

असहमति व्यक्त करने का उत्सव मनाने
सम्मान लौटाने का हवाई बिगुल बजाया

बुला कर पत्रकार सम्मलेन
सुना रहे हैं अपना विवेचन

देश का वो हाल आम लोगों को  दिखा रहे है
जो सामान्य लोग सड़कों पर देख नहीं पा रहे हैं

अपनी  कुंठाओं का खुले आम व्यापार
राष्ट्रीय सम्मान का करके तिरस्कार

पूर्वाग्रह से ग्रस्त तथाकथित बुद्धिजीवी
चाहे जो हों, हमारे नायक नहीं है
अच्छा है लौटा रहे सम्मान, ये लोग
यूं भी सम्मान के लायक नहीं हैं

अशोक व्यास

ब्योमकेश बख्शी जैसी फिल्म बनाने वाले दिबाकर समेत 10 फिल्मकारों ने लौटाए अवॉर्ड

ब्योमकेश बख्शी जैसी फिल्म बनाने वाले दिबाकर समेत 10 फिल्मकारों ने लौटाए अवॉर्ड

नई दिल्ली. एम.एम. कलबुर्गी और गोविंद पानसरे जैसे लेखकों की हत्या के विरोध और एफटीआईआई में आंदोलन चला रहे स्टूडेंट्स के समर्थन में 10 फिल्मकारों ने अपने नेशनल अवॉर्ड लौटाने का एलान किया है। इनमें ब्योमकेश बख्शी जैसी फिल्म बनाने वाले दिबाकर बनर्जी और आनंद पटवर्द्धन जैसे फिल्ममेकर शामिल हैं। बता दें कि लेखकों की हत्या और दादरी में पिछले महीने हुए बीफ कांड के विरोध में करीब 40 साहित्यकार साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा चुके हैं। 
 
किन फिल्ममेकर्स ने लौटाए अवॉर्ड 
बुधवार को दिबाकर बनर्जी, लिपिका सिंह, निष्ठा जैन, आनंद पटवर्द्धन, हरि नायर, कीर्ति नखवा, हर्ष कुलकर्णी समेत कुल दस फिल्ममेकर्स ने अवॉर्ड लौटाए।  
 
दिबाकर ने कहा-आप तय करें, जो हो रहा है वह सही है?
'खोसला का घोंखसा', 'लव सेक्स और धोखा', 'बॉम्बे टॉकीज' जैसी फिल्में बनाने वाले दिबाकर बनर्जी ने अवॉर्ड लौटाने को लेकर कहा, 'एफटीआईआई से जुड़ी खबरें पढ़कर आप खुद तय करें वहां जो हो रहा है वह सही है या गलत। जो एफटीआईआई में हो रहा है, वही देश के बाकी इंस्टीट्यूट्स में भी हो रहा है। इसी वजह से हम अवॉर्ड लौटा रहे हैं।' वहीं, आनंद पटवर्द्धन ने कहा, 'देश में आज जो कुछ हो रहा है वह काफी अजीब और डरा देने वाला है, उम्मीद है कि हमारे इस विरोध को और भी फिल्मकार समर्थन देंगे।'
 

Wednesday, July 8, 2015

एकमेक सकल व्योम के साथ















उसके पास न उदासी थी न ख़ुशी
एक उदासीनता थी
एक चुप्पी सी
जैसे सब कुछ हो चूका हो
वह सब जो छुपा है
भविष्य की कोख में
देख लिया गया हो
एक ऐसी आँख से
जो काल के पार देख सकती थी सब कुछ



उसके पास न उत्सुकता थी, न निराशा
एक अपनापन था सारे घेरे से परे
हर परिधि के पार
सहज विस्तार का आलिंगन करती धड़कनों में
वह सुन रहा था
अपने होने का संगीत
कण कण में

उम्र बढ़ रही थी
हर क्षण 
पर उसे आधार दे रहा था
एक समयातीत सत्य



वह मगन था
क्षितिज का स्पर्श करती ललाई में
मौन उसका
निराकार की धुन सुनता
सुना रहा था
निश्छलता के सौंदर्य में भीगा
नित्य नया होता गीत

वह रच रहा था
अपना अक्षय रूप
अक्षर अक्षर
तिरोहित क्षरित भाव

वह था
पर नहीं था
था तो बस एक वह
जो होता है
नित्य 
होने और न होने से परे

कृतकृत्य
पूर्ण
तृप्त
एकमेक सकल व्योम के साथ


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जुलाई ८ २०१५

Sunday, June 14, 2015

चाहे वैसा न सही



उसके मुस्कुराते साये में थी शीतलता
 वो जैसे एक चलता - फिरता पीपल था
 आज भी बना तो है साथ उसका
 चाहे वैसा न सही, जैसा कल था 

२ 

वो सक्रिय रहा करता था निरंतर 
नित्य मुखरित, करूणा का स्वर 
कहाँ से पाता था वो स्नेह इतना 
जिसे लुटाया करता था सब पर 


- अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

नित्य नूतन


अपने आपको दोहरा कर जब थक जाओ 
बैठ पेड़ की गोद में, थोड़ा सुस्ताओ 

जड़ता मुक्त, ऊर्जा संचरण 
धूप सिखलाये है हर क्षण 

करो मौलिकता का आलिंगन 
गाये सदा तुममें नित्य नूतन 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 


Friday, May 29, 2015

तेरी हर बात याद आये है

सबके प्यारे मेरे परम आदरणीय चाचा डॉ भीम राज व्यास के साथ
(२८ दिसंबर १९४४ - २७ मई २०१५ )

तेरी हँसती हुई तस्वीर भी रुलाये है

तेरी हर बात याद आये है
सिसकियाँ, कराह और कसक
दुनियाँ बदली सी नज़र आये है


कैसे तू सबके लिये था सब कुछ
बात ये समझ नहीं आये है

एक तड़प सी कौंध जाये है
एक बदली सी बरस जाये है
तू वही तो न था, जो दिखता था
तेरी हर याद कुछ सिखाये है

तेरी रुखसत की ख़बर झूठी है
तेरा वजूद ये बताये है

जिससे रिश्ते निखर गये सारे
 मौत उसको कहाँ छू पाये है
एक ये अहसास तेरा होने का क़दम क़दम पे मेरा हौसला बढ़ाये है
(भीम चाचाजी का खास भतीजा
अशोक व्यास - बब्लू

वैसे वो ऐसे थे, की सबके लिए खास थे 
और सब उनके लिए खास रहे )

Monday, May 25, 2015

फूलों की नई नई घाटियाँ






शब्दों का हाथ थाम 

उतर कर  शिखर से 

आँख मूँद कर 

कुछ देर

अब 
 
देखता हूँ 

फूलों की नई नई घाटियाँ 

जहाँ तक ले आये हैं शब्द 

 
        - अशोक व्यास 

Friday, May 22, 2015

हकीकत से वास्ता रखता नहीं हूँ



बुजुर्गों की इनायत है 
उन्ही से ये रिवायत है 
दुआओं का असर देखो  
मेरा जीवन मोहब्बत है 

२ 
बुजुर्गों के सभी किस्से 
मेरी साँसों के हैं हिस्से 
सहेजूँ उसको कैसे मैं 
सहेजा जा रहा जिससे  

३ 

फिसल कर गिरने से बचाये है
माँ तेरी याद बहुत आये है
तेरी नज़रें इलाज़ करती हैं
चोट जब भी कोई लग जाए है 

४ 

अपने होने का हुनर सिखला रहे अब भी 
अपनी आँखों से, जहाँ दिखला रहे अब भी 
मुझमें ये जो रहता है कायम तमाम उम्र 
उसकी सूरत रात-दिन दिखला रहे अब भी 

 ५ 

अब किसी लफ्ज़ से पत्थर न बना
जलते शोले से अपना घर न बना 
सीख कुछ साथ रहने का सलीका 
शहर को खौफ का मंजर न बना 

६ 

सीख कर कोई नया गुर, क्या करें 
रात दिन उसका तस्सव्वुर, क्या करें 
बात जब रुक जाए तब रुक जाए है 
ऐसे में कोई नया सुर, क्या करें 

७ 

हकीकत से वास्ता रखता नहीं हूँ 
अपने घर में रास्ता रखता नहीं हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
शुक्रवार, मई २२, २०१५ 





Tuesday, May 12, 2015

पिंजरे वाले शेर की तरह



१ 
मेरा किस्सा भी आम कर डाला 
मुझको मेले के नाम कर डाला 
२ 

प्रतीक्षा  सी है अंतस में 
कब होगा सब मेरे बस में 
पिंजरे वाले शेर की तरह 
कब तक रहना है सर्कस में 

अशोक व्यास 
(पुराने पन्ने )

प्रभु रमन तेरे दरबार


प्रभु रमन तेरे दरबार 
मिले शांति और प्यार 
सांस संतुलन सहज सुलभ 
जाग्रत आनंद अपार 

प्रभु रमन तेरे दरबार 
मधुर मौन उपहार
 करूणामय रसधार 
अपनेपन का ज्वार 

ऐसे तुमने अपनाया 
अब मुझको सब स्वीकार
एक अनाम लय होता जिससे 
मुखरित स्व का सार 

अशोक व्यास 
(रचना स्थल - अरूणाचल आश्रम, न्यूयार्क )

Wednesday, April 1, 2015

दर्पण दिखा कर गुजर जाते हैं दिन




कभी दिन भागते हैं 
कभी हमें भगाते हैं दिन 
 
कभी कुछ न देकर
कभी अधिक दे सताते हैं दिन 

छुप कर देखा करते हैं आंसू 
जब हमें हँसाते हैं दिन 
 
हम रुक जाते हैं जब थक कर
चुप चाप सरक जाते हैं दिन 

वह सब जो छोड़ आये पीछे 
यादों में सजाते हैं दिन 
 
किससे करू शिकायत
जब यूँ ही रुलाते हैं दिन 

वो कोमल और नाजुक से लम्हे 
छू छू कर थरथर्राते हैं दिन 
 
कुछ कहने से डर लगता है 
मेरी वेदना से घबराते हैं दिन 

तुम समझ सको तो बतलाना 
किसका सन्देश लिए आते हैं दिन 
 
एक  बात बदलती जाती पल पल 
इसे देखते देखते बदल जाते हैं दिन

तुम्हारी आँखों का सन्नाटा है ऐसा 
चहकते चहकते संभल जाते हैं दिन 

मुझे कब फुर्सत खुदको देखूं 
दर्पण दिखा कर गुजर जाते हैं दिन 

तुमसे बिछुड़ने के लम्हे दिखा कर
 मुझे सारी रात जगाते हैं दिन

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ अप्रैल २०१५

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...