Monday, December 11, 2017
Thursday, November 2, 2017
Thursday, May 25, 2017
छोड़ कर स्वरुप अपना
१
उतरती है गंगा
भगीरथ के बुलावे पर
बहती छल छल
करूणा सुन कर तीव्र पुकार
उद्धार की
२
पीढ़ी दर पीढ़ी
अनुस्यूत
एक भाव
एक सात्विक सातत्य
सहेजता
सम्बन्ध समग्रता से
खिल जाता सौंदर्य शाश्वत का
३
नदी बह रही
अब
छोड़ मर्यादा
तट की
निश्चिंत है
छोड़ कर स्वरुप अपना
आ मिली
सागर में
कभी कभी खो देना ही
होता है
पा लेना सचमुच
४
बाहें फैला
पकड़ रहा
बादलों को
खिलखिला कर स्वीकारता
पराजय अपनी
हो गया
अंकित
भीगापन
अलौकिक हृदय पर
५
जुड़ता है
बिना जोड़े
मिले उसे
जो स्वयं को छोड़े
इसी की महिमा
गाये गगन
सुन कर मगन
झूमें पावन
सौंप इसे
तन - मन
पा लिया
अनंत आंगन
२५ मई २०१७
अशोक व्यास
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क
मधुर मधुर हो अपना जीवन
१
उतरती है गंगा
भगीरथ के बुलावे पर
बहती छल छल
करूणा सुन कर तीव्र पुकार
उद्धार की
२
पीढ़ी दर पीढ़ी
अनुस्यूत
एक भाव
एक सात्विक सातत्य
सहेजता
सम्बन्ध समग्रता से
खिल जाता सौंदर्य शाश्वत का
३
नदी बह रही
अब
छोड़ मर्यादा
तट की
निश्चिंत है
छोड़ कर स्वरुप अपना
आ मिली
सागर में
कभी कभी खो देना ही
होता है
पा लेना सचमुच
४
बाहें फैला
पकड़ रहा
बादलों को
खिलखिला कर स्वीकारता
पराजय अपनी
हो गया
अंकित
भीगापन
अलौकिक हृदय पर
५
जुड़ता है
बिना जोड़े
मिले उसे
जो स्वयं को छोड़े
इसी की महिमा
गाये गगन
सुन कर मगन
झूमें पावन
सौंप इसे
तन - मन
पा लिया
अनंत आंगन
२५ मई २०१७
अशोक व्यास
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क
Friday, March 31, 2017
मंज़िल से दूर
न जाने क्यूँ
हो रहा कुछ ऐसा बार बार
जा नहीं पाता
एक सीमित घेरे के पार
अवसरों से हाथ मिलाता हूँ
फसल नई उगाता हूँ
पर फिर एकाकीपन में
चुप चाप खड़ा हो जाता हूँ
अपेक्षाओं के नए नए तीर चलाता हूँ
निशाने पर खुदको ही खड़ा पाता हूँ
घायल होते जाने होने का दर्द जारी
आंसू छुपा कर फिर फिर मुस्कुराता हूँ
अब मंज़िल से दूर रह रह कर
इस तरह कसमसाता हूँ
घर से बाहर एक नया कदम
उठाने में घबराता हूँ
न जाने क्यों
हो रहा बार बार
फिसलता जाए है
मुझसे विस्तार
ये जड़ता की मार
ये मूढ़ता का वार
सब लगे निस्सार
कहो कैसे पाऊं सार
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
Friday, March 24, 2017
कविता की गोद में
एक दिन
जब बढ़ने लगता है
ये अहसास
की हर अनुभव पर
एक 'अंतिम तिथि' लिखी है
जैसे
बाजार से दूध लाओ
तो उसे एक निश्चित तिथि से पहले
प्रयुक्त करने का संकेत अंकित होता है
वैसे ही
हर ख्वाब, हर सपने, हर चिंतन के प्रयोग की
कोई न कोई अंतिम तिथि है
तब
एक बारगी
हड़बड़ी में सब कुछ
जल्दी जल्दी ख़त्म कर लेने की व्यग्रता
और फिर
अपनी अक्षमता
और फिर निष्क्रियता
और फिर नए सिरे से संतुलन की तलाश
चुकते चुकते
चूकने से बचने का
एक और प्रयास
कविता की गोद में
बैठ
अपने आप को लाड लड़ाता हूँ
क्षितिज को थपथपाता हूँ
असीम को साथ खेलने बुलाता हूँ
ये कैसा द्वार खोल देती कविता
जिसके उस पर
मैं पूरी तरह नया
निश्छल सौंदर्य को छूकर
हर 'अंतिम तिथि' से परे
क्या शाश्वत हो जाता हूँ?
अब ये सोच कर मुस्कुराता हूँ
की सब कुछ नाप लेने की ज़िद में
मैं स्वयं ही अपने लिए
एक 'अंतिम तिथि' निश्चित करता जाता हूँ
इस पार रहूँ
तो 'अमिट' हूँ
पर अनजाने में
कविता को झुठलाता हूँ
और
नुकीले प्रश्न उगा कर
उस पार जाता हूँ
लहूलुहान होता जाता हूँ
ये कौन झूला रहा है मुझे
विध्वंस और सृजन के बीच
देखता हूँ
तो देखते देखते
अनंत से आँख मिलाता हूँ
फिर मुस्कुराता हूँ
कविता को कृतज्ञता से देखता
अपने कवि होने पर धन्य हुआ
सबके लिए प्यार लुटाता हूँ
अशोक व्यास
न्यूयार्क अमेरिका
२४ मार्च २०१७
टालता हूँ जीना
दिन दिन
जाने अनजाने
देख कर
अनदेखा कर देता
जाने पहचाने रास्ते
किसी एक दिन की
प्रतीक्षा में
सुरक्षित रखे सपने
न जाने कब
धीरे धीरे
पीले होकर
झड़ने लगते हैं
टालता हूँ जीना
कभी प्रमाद में
कभी अवसाद में
कभी टूटे सपनो
की याद में
और धीरे धीरे
हो लेता हूँ वह मनुष्य
जो मुझे नहीं होना था
जो मैं नहीं हूँ सचमुच
धीरे धीरे
डर और असफलता के बीच
सहानुभूति का कटोरा लिए
निकलता हूँ
जब अपनों के बीच
अनायास
अपरिचित हो जाते हैं सब
क्योंकि वे मिलते हैं
उस मनुष्य से
जो मैं नहीं हूँ
टालता हूँ जीना
क्यों की भूल जाता हूँ
हूँ कौन मैं ?
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ मार्च २०१७
Saturday, February 18, 2017
अनमना कवि
१
कविता लिखते लिखते
जब उपादेयता का प्रश्न
मचल जाता है
कवि कविता लिखने
से कतराता है
और फूलों की घाटी की और उड़ता
एक काल्पनिक यान
बाज़ार की गलियों की और
मुड़ जाता है
जोड़ गणित के बीच
अनमना कवि
चुपचाप कसमसाता है
पर कवि का मिटना सिमटना
कौन जान पाता है
२
व्यावहारिक दृष्टि
काव्यदृष्टि से करती है तकरार
कौन लड़े मुक्क़द्दमा इसका
कवि में फकीरी है बेशुमार
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ फरवरी २०१७
Friday, February 17, 2017
Tuesday, January 3, 2017
सार सज्जित आव्हान
जीवन वह नहीं
जो मिला है
जीवन वह है
जो तुम बनाते हो
सच बात है
तुम पैदाइशी निर्माता हो
अपने भाग्य विधाता हो
तुम ही संकट कारक
तुम ही आनंद प्रदाता हो
२
तुम वह नहीं
जो दीखते हो
वो नाम नहीं
जो लिखते हो
सच बात है
तुम जन्म से ही विराट हो
काल से परे का ठाट हो
चाहो तो बनो बंदी भी
वैसे तो तुम सम्राट हो
तुम मंगल मुस्कान हो
सांस सूत्र की शान हो
अपने भीतर अनंत का
सार सज्जित आव्हान हो
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ जनवरी २०१७
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सुंदर मौन की गाथा
है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...
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एक मैं निश्चल मुझे अब भी तुम्हारी याद आये है मुसलसल नहीं सूखा मेरे दाता, मेरी आँखों का ये जल नहीं समझा जगत क...
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है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...








