Wednesday, April 1, 2015

दर्पण दिखा कर गुजर जाते हैं दिन




कभी दिन भागते हैं 
कभी हमें भगाते हैं दिन 
 
कभी कुछ न देकर
कभी अधिक दे सताते हैं दिन 

छुप कर देखा करते हैं आंसू 
जब हमें हँसाते हैं दिन 
 
हम रुक जाते हैं जब थक कर
चुप चाप सरक जाते हैं दिन 

वह सब जो छोड़ आये पीछे 
यादों में सजाते हैं दिन 
 
किससे करू शिकायत
जब यूँ ही रुलाते हैं दिन 

वो कोमल और नाजुक से लम्हे 
छू छू कर थरथर्राते हैं दिन 
 
कुछ कहने से डर लगता है 
मेरी वेदना से घबराते हैं दिन 

तुम समझ सको तो बतलाना 
किसका सन्देश लिए आते हैं दिन 
 
एक  बात बदलती जाती पल पल 
इसे देखते देखते बदल जाते हैं दिन

तुम्हारी आँखों का सन्नाटा है ऐसा 
चहकते चहकते संभल जाते हैं दिन 

मुझे कब फुर्सत खुदको देखूं 
दर्पण दिखा कर गुजर जाते हैं दिन 

तुमसे बिछुड़ने के लम्हे दिखा कर
 मुझे सारी रात जगाते हैं दिन

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ अप्रैल २०१५

Friday, February 6, 2015

जहाँ छम छम है प्रेम की


सुर समय के क्या सुनाते हैं 
हम भले समझ नहीं पाते हैं 

समन्वय की आस्था लेकर 
इतना तो जान पाते हैं 

जहाँ छम छम है प्रेम की 
बस वहां ठहर जाते हैं 

लोग वैलेंटाइन पर 'आई लव यू ' कहते हैं 
हम 'जय श्री कृष्ण' कह कर मुस्कुराते हैं 

-अशोक व्यास 


Sunday, January 25, 2015

जो नित्य है

१ 
अभय कहाँ हो तुम अब 
इस क्षण 
जब 
एक अनाम अनिश्चितता 
मुझे घेर कर 
सुना रही 
राग असमंजस 
२ 
इस क्षण 
जब मांग रहा 
साफ़ आसमान 

प्रकट हुए 
सूर्यदेव अंतस में 
उजियारी किरण अनंत की 
छिटकी 

३ 
छंटा संशय 
विश्वस्त मन में 
दीख पड़ा 
तुम्हारी उपस्थिति का संकेत 

तुम यहीं थे शायद 
देख नहीं पा रहा था 
पर तुमको मैं 
कुछ देर 
जो 
गम अपने कुहांसे में 

क्यों होता है ऐसा 
नहीं देखता वह 
जो है 
वह 
जो नित्य है 

अशोक व्यास 

Saturday, January 24, 2015

कविता क्या है


कविता क्या है 
लिख लिख कर पता लगाता हूँ 
फिर लिखता हूँ 
क्योंकि जाना हुआ भूल जाता हूँ 

कविता 
पता लगाने का पथ है 
की मन कहाँ है 
किस बात में रत है 

कविता 
मन के संसार का ताना-बाना है 
कुछ जानना है 
कुछ बताना है 

और कहने सुनने के क्रम को 
ऐसे अपनाना है  
की अपने साथ 
एक मेक हो जाना है 

तो क्या कविता 
एकत्व की अनुभूति जगाना है 
जो हर काल में रहता है 
उसके संग घुल मिल जाना है 

स्वयं से अलग होकर 
स्वयं को देखते जाना है 
सत्य है या श्रृंगार सत्य का 
कविता जीवन को थपथपाना है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२४ जनवरी २०१५ 

Friday, January 23, 2015

परिधि के पार



 अन्तर ये हो गया इस बार 
पग पग सुलभ, गंतव्य सार 
जिसके लिए, जाना उस पार 
 वह मिल गया है इस पार 

यात्रा अब, अपना सहज विस्तार 
देखना है स्वयं को परिधि के पार 
खोने-पाने से परे का संसार 
पग पग  मुखरित,प्यार ही प्यार 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२३ जनवरी २०१५ 

Wednesday, January 14, 2015

स्मृति पतंग

 
टटोल टटोल कर 
यादों की पच्छीत पर 
बरामद करना 
वो दिन 
पतंगों के 
आकाश के 
उत्साह के 
पेच लड़ाने की प्रतिस्पर्धा वाले 
 
गज़क, रेवड़ी 
छत 
आसमान 
पतंगों के साथ उड़ती सी जान 
 
पेच लड़ गया है 
धागे से हाथों तक पहुँचती पहचान 
 
कभी ढील 
कभी खींच 
 
कभी कोई दूर उड़ती पतंग 
की खींच में 
अपनी पतंग गँवा कर खिसियाना 
 
कभी कोई पेच काट कर 
मन ही मन 
अवर्णनीय संतोष पाना 
 
और अपनी छत से उड़ती पतंग के साथ 
अपनेपन वाली वो अजीब सी बात 
 
अब 
'वो काटा है' का सामूहिक स्वर 
जगा कर यादों के ऑडिटोरियम में 
ठहाकों की जगह 
एक कसक सी भर जाती है 
 
एक कसमसाहट 
जैसे नौका जा चुकी है किनारे से 
लौटने वाली नहीं है 
 
अब धीरे धीरे 
सिमटता जा रहा है 
वो हिस्सा 

जिसे छूकर मुमकिन था 
यादों के उजाले में नहाना 

अब जैसे 
खो रहे हैं वो रास्ते 
जिन पर चल कर 
बचपन के पेड़ों पर 
कूदना- फाँदना संभव हो 
जाता था 

आज 
इतने दूर 
गुलाबी नगर के उन दिनों से 
जब छतों की रंगीनियों में 
बेहिसाब मजा आता था 

वो अनुभव, वो अनुभूतियाँ 
परे हैं अब पहुँच से 
फिर भी 
आँख की कोर से 
बहते ये आंसूं 
शायद एक छोटी सी कोशिश  हैं 
उन स्मृतियों को बचाने की 
जिनसे बना है 
मेरे बनने का रास्ता 
पर 
कितना कुछ छूट जाता है 
बनते बनते 
सहज ही 

और इस क्षण 
जब कट कर 
हिचकोले खा रही है 
स्मृति पतंग 

भाग भाग कर 
शब्दों के साथ 
निकल पड़ा हूँ 
इसे लूटने 
नंगे पाँव 
यादों के पेच लड़ाता 
अपने मन के आकाश में 
मैं ही उड़ाता हूँ जादू की पतंग 
और 
अपने बेमाने से लगते बीती पलों में 
सारे जीवन का मतलब देख आता हूँ 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
जनवरी १४, २०१५

Wednesday, January 7, 2015

आज तो खूनी खबर से लाल है अखबार



 अब भी यकीन है मुझे 
 कहीं से बहेगी 
ऐसी गंगा 
जो सब तक 
शांति का सन्देश पहुंचाएगी 

मुझे अब भी लगता है 
महसूस पाएंगे हम 
एक दूसरे के दर्द को 

बारूदी गंध भरी है हवा में 
पर मुझे लगता है 
चमन में 
फिर खिलेंगे पुष्प 
फिर से आएगी 
वो महक 
जिसमें मैं अपने 
मनुष्य होने की गरिमा सूंघ पाऊंगा 
तुम्हारे साथ 

२ 

मुझसे छूटता नहीं 
इस आशा का दामन 
जो अब भी देख रही है 
समन्वय का सपना 
जिसके साथ 
अपनेपन के किस्से 
दिन-रात एक करने के साथ साथ 
हमें भी एक कर देते हैं 

३ 

तमाम विसंगतियों के बावजूद 
मैं अब तक बचाये हूँ 
सबसे एकमेक होने का सपना 
जिसके साथ 
सहेजी हुई है 
मेरे पुरखों की 
बरसों की तपस्या 

मैं उस परंपरा की पैदावार हूँ 
जो बिच्छू को बचाने के लिए 
डंक सह लेने से नहीं कतराते थे 

मैं उन सबकी शाश्वत आँखों से 
देख रहा हूँ 
काल को आच्छादित करते कुहासे से पर 
एक सौम्य, निर्मल, स्निग्ध सुबह 
धरी है 
हमारे लिए 
इसी धरा पर 

जहाँ 
इन दिनों सांस लेते हुए भी 
अपने सुरक्षित होने पर यकीन करना भी मुश्किल है 

फिर भी 
ना जाने क्यूँ 
मुझे यकीन है 
भगीरथ के बुलाने पर 
आखिर कहीं से बहेगी 
ऐसी गंगा 
जो सब तक 
शांति और समन्वय का रसमय स्पर्श पहुंचाएगी 


आज तो खूनी खबर से लाल है अखबार 
शायद कल हिंसा को धो देने वाली 
इस नदी के उत्तर आने की 
खबर आएगी 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जनवरी २०१५ 

Wednesday, December 17, 2014

लहू में भीगा अखबार

(नई दुनिया - १६ दिसंबर २०१४ )


सुबह -  सुबह
लहू में भीगा अखबार 
शब्दों में कैद आर्तनाद 
चीख-पुकार 
सिसकियों के साथ 
मानवता का हाहाकार 
बढ़ रही 
दिन प्रति दिन क्रूरता 
निर्दोषों के प्रति अत्याचार 

हर दिन नए सिरे से 
नृशंशता, बर्बरता, अमानवीय व्यवहार 
हम जहाँ भी हों 
हो रहे हैं, एक व्यापक त्रासदी के शिकार 

कब तक चलेगा ये आत्मघाती तांडव ?
क्यूँ है ये विध्वंस बढ़ाता विप्लव ?

क्या सुरक्षा होगी 
जब एक हाथ से दूसरा हाथ काटा जाए ?
कैसे बचेगा कोई 
जब अमृत के नाम जहर बांटा जाए ?

हम क्या पहुँच रहे हैं अंतिम छोर पर ?
कितना भरोसा रहे सुरक्षा की डोर पर ?


कैसे सुरक्षित होकर रहे धरती माँ का हर लाल 

कैसे बदले मासूमों को भूनती यह जघन्य ताल ?

------------------

दर्द, प्रार्थना, सहानुभूति, संवेदना के साथ
अशोक व्यास
१६ दिसम्बर २०१४

पेशावर: आर्मी स्कूल पर आतंकी हमला, 84 बच्चों समेत 104 लोग मरे

Tue, 16 Dec 2014 16:14:27 | World Hindi News
- See more at: http://rajasthanpatrika.patrika.com/news/taliban-gunmen-attack-military-run-school-in-peshawar/1209272.html#sthash.I1zcK2hf.dpuf

Sunday, December 7, 2014

आत्मतुष्टि


"किसी मान्यता को हम देवता नहीं बनाते हैं,
आत्मा को देवता बनाते हैं,
(कर्म ) आत्मार्थ होना चाहिए,
आत्मतुष्टि आ रही है क्या?"

स्वामी श्री ईश्वरानन्द गिरी जी महाराज 

(प्रवचन '"अवतरण", अहमदाबाद, जुलाई १०. २०१४ से लिया गया वाक्य )

Saturday, December 6, 2014


जीवन के इस जादू में 
इच्छाओं का जंगल है 

आँख -२ में अंतर है 
जो सच है, वो ही छल है 

वो दिखता ही नहीं कहीं 
जिससे सारी हलचल है 

बैठ सका जो निश्चल है 
उसे दिखा चिर चंचल है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

मुक्त जो है


लो छलकाऊँ 
नई उमंगो का  स्वर्णिम जल 
मुक्त जो है 
हो ही जाता है वो निश्छल 
अपने से 
अपनों को यूँ भी मिलता बल 
सत्य के आधार से 
संकल्प हो जाता है उज्जवल 


अशोक व्यास 
 न्यूयार्क,अमेरिका २१ जनवरी २०१४ 

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...