Saturday, May 1, 2010

होने ना होने से परे

(बाल्डविन, न्यूयार्क स्थित साईं मंदिर में लिया गया चित्र -      अशोक व्यास)

सबके साथ  
होकर भी 
 कई बार
 हमें घेर लेता है
अकेलापन,

और कभी
अनायास
मिल जाता 
अंतस में अपार 
अपनापन,

हम 
संबंधों के पुल बनाते हैं
या 
उन्हें उपहार में पाते हैं
बहुत कुछ 
ऐसा होता है जीवन में
जिसे
हम समझ नहीं पाते हैं

फिर भी एक जिद सी
कि हर बात को समझ के
दायरे में लाना है
और हम ही सर्वज्ञ हैं
ऐसा औरों को ना सही
खुद को जताना है

सीमाओं को स्वीकारे बिना
नहीं होता असीम का अनुभव
और फिर जब हर सीमा में
दिखता है अनंत का गौरव

महसूस होता है
होने ना होने से परे भी
है कोई एक स्थल,
जो स्थिर है
परे समय के
पर उसी से है हर पल,

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १५ मिनट
शनिवार, मई १, २०१०





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Friday, April 30, 2010

चिर समन्वय की झंकार

(संवित साधनायन, आबू पर्वत                          चित्र -अमित गांगुली)

जाने कब तक 
जारी
वही एक तलाश,
किस घाट पर
बुझेगी 
ये गहरी प्यास

क्यूं बना रहता है 
भीतर
एक जड़ता का वास
क्यूं अधूरा सा
रह जाता
हर एक प्रयास

क्यूं नहीं मिलते 
धरती और आकाश
क्यूं हो जाता है 
दिन हमसे निराश

कब शुरू होगी
स्वप्निल उड़ान
मुश्किलें कैसे 
होंगी आसान

कैसे सक्रिय होता है
समर्पण
कैसे हो सारयुक्त
हर एक क्षण

कविता के साथ
अपने भीतर 
कभी सफाई, कभी श्रृंगार
और इस तरह
मिल जाता
आत्मीयता का उपहार

शायद कभी 
इसी तरह छू जाए ऐसा तार 
कि बज उठे 
चिर समन्वय की झंकार 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १५ मिनट
शुक्रवार, ३० अप्रैल २०१०

Thursday, April 29, 2010

बचे जिसके सहारे

(बहाव ये मानव निर्मित सही, जल निर्माता तो है वही का वही-        चित्र-अशोक व्यास)

तब जब सब कुछ
अच्छा सा लगता हो
तब जब भीतर
आनंद सा बजता हो

तब भी प्रसन्नता के
मुग्ध स्वरों के पार
हम देख लेते हैं
संशय का आकार 

२ 
हम अपने आपको अपनाने से कतराते हैं
जब 'पूर्णता' मिल जाए तो घबराते हैं
अब तो होने लग गया है कुछ ऐसा कि 
पवित्रता से बचने, काला टीका लगाते हैं


जिसकी शरण लेते हैं
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं
हम है बड़े रचनात्मक
अपना चक्रव्यूह खुद बनाते हैं
और किसी शत्रु की
नहीं है आवश्यकता 
घेरा बना कर अपने लिए
हम खुद उसमें फंस जाते हैं


किरणों से उजाला लेकर
सूरज विरोधी दल बनाते हैं
 उत्सव मनाना भूल कर 
प्रदर्शनकारी बन जाते हैं


चलते चलते क्यूं हम
 उस भूल-भुलैय्या तक आते हैं 
जहाँ दोस्त और दुश्मन का 
भेद समझ नहीं पाते हैं 

छलिया अजगर के मुख से
बचे जिसके सहारे 
कब करवाएगा मुक्त वो
हमें छल से हमारे 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ८ मिनट
गुरुवार, अप्रैल २९, २०१०

Wednesday, April 28, 2010

स्वर्णिम आत्मीय किरण

(भागमभाग के बीच आन्तरिक आनंद वृत्त का संकेत -     चित्र- अशोक व्यास )


अब हो ही गया है ऐसा
एक क्षण में
पहुँच सकता है विचार
विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक

इसलिए मेरे भाई
अब
पहले से भी ज्यादा जरूरी है
की हम अच्छा सोचें

सोच में सजा कर 
स्वर्णिम आत्मीय किरण 
जुडें सबसे 
जोड़ें सबको 

और उस 'एक' को 
जो हर कालिख के स्पर्श के बाद भी
उजला ही रहता है
बुला बुला कर
बिठाएं अपने शब्दों में

विचार हमसे नहीं हैं
हम विचारों से हैं
समझते हुए इस बात को
अब पहले से
ज्यादा जरूरी है
उन विचारों को सहेज कर
सुरक्षा के साथ
अपनी और अगली पीढी तक
पहुंचा पाना
जिन विचारों से
मनुष्य मनुष्य
बना रह सकता है

अब पहले से
ज्यादा जरूरी है
हम करें अभ्यास
करुणा का, प्रेम का, सहानुभूति का
और देख कर
त्याग का सौंदर्य
उसे भी देखें 
जिसकी कृपा महकती है
हमारी हर एक सांस में

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, अप्रैल २८, २०१०

Tuesday, April 27, 2010

एक सौम्य चौकन्नापन

(सुनते जब सूरज की बात, आ जाता दिन- जाती रात                चित्र - अशोक व्यास )

स्मृति चुराने वाला
बैठा होता है
भीतर ही
इस ताक में
कि 
ज़रा ध्यान चूके
और ले जाकर
छुपा दे 
हमारी हमें
पहचान पाने की ताकत


खेल स्मृति बचाने का
दरअसल खेल है
अपनी ही सुरक्षा का

सुरक्षित रहने की कोशिश
कभी कभी
छल लेती है हमें

हम अपने आपको नहीं
अपने 
एक 'आभास' को बचाने में
पूरा जोर लगा देते हैं


'आभास' से परे
खुद को देख पाने के लिए
चाहिए सतर्कता 

संतुलित सतर्कता के
अभ्यास से
जब
सहज हो जाए
एक सौम्य चौकन्नापन 

जाग्रत रह पाता है
एक बोध दीप
अंतस में

जो छिटकाता है
प्रेम और शांति
का उजियारा 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
मंगलवार, २७ अप्रैल २०१० 
सुबह ७ बज कर ११ मिनट 

Monday, April 26, 2010

अनदेखे प्रदेश का क्षण

(हर एक बूँद मैं सागर है जो, उसे देख विस्तृत होना है -          चित्र- अशोक व्यास)

मौन में गूंजती है 
एक लय
एक ताल
एक संगति बैठ रही है
व्यक्त की अव्यक्त के साथ

बरखा थमने के बाद
भीगे पत्तों पर
ठहरी हुयी बूंदों में
ये नयी नवेली दुल्हन 
की बेसुध तन्मयता सी
अब तक शेष है

पूर्णता का परिचय 
अपने ह्रदय में छुपाये
सरक कर पत्ते से
धरती में मिल
गुम जाने से पहले

एक महीन क्षण में
मुस्करा कर
जब विराट को विदा कहते हुए
आभार के साथ मुस्कुराई थी
वो बूँद

ना जाने कैसे
देख लिया मैंने
यह अनदेखे प्रदेश का क्षण

ऐसे जैसे कि
बूँद के लिए 
दर्पण था मैं
या शायद मेरा दर्पण होती है
विराट में घुल-मिल जाती 
हर बूँद


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ३० मिनट
सोमवार, २६ अप्रैल २०१०

Sunday, April 25, 2010

वो जो 'शिखर' है


लौटते हुए
फिर एक बार देखा पलट कर
शिखर की तरफ
और सहसा
छूट गया
विचार लौटने का
एकाकीपन में
कभी कभी
भीड़ से अधिक अपनापन 
मिल जाता है
जिसके कारण
ढूंढते हुए उसे 
पहुंचा था शिखर तक
लुढ़कते हुए
एक क्षण लगा यूँ 
कि शायद इस बार
गया हाथ से
ऊँचाई का साथ,

रुक जाने पर पाया 
ऊँचाई हो या ना हो
वो जो 'शिखर' है
हर स्तर पर
फिसलन की टूटन से
बचाता है
और 
जहाँ हों, जैसे हों
उन्नत कर जाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३० मिनट
रविवार, अप्रैल २५, २०१०

Saturday, April 24, 2010

आत्म-वैभव का सत्कार



अब भाव ये
कि अब तक जो हुआ
उसके लिए व्यक्त करें आभार
अब चाव ये
कि कृतज्ञता के साथ
दाता को भी दें कोई उपहार

अब
कामना की गलियों के पार
निश्चिन्तता के साथ व्यवहार

मुक्ति की हिलोर साँसों में 
पग पग पर प्रेम की बौछार

यहाँ कैसे पहुँच जाती है नाव
किसके हाथों होती है पतवार

उत्सव अनाम सौन्दर्य का 
छलछलाते आनंद की धार 

इस कृतकृत्यता को अपनाऊँ
या इस पर करूं संशय से प्रहार

एक मन कहता है, श्रद्धा से करूं
 इस आत्म-वैभव का सत्कार

मैं कब, किस मन की सुनता हूँ 
इस पर मेरा है या सृष्टा का अधिकार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १५ मिनट
शनिवार, अप्रैल २४, २०१०

Friday, April 23, 2010

'एक' जो 'बनने बनाने' वाला है

(उड़ता जाए है एक पंछी, धूप- छाँव से परे निरंतर                                       चित्र - अशोक व्यास )

१ 
किसी किसी दिन
यूँ होता है
की हम पूरे कर देना चाहते हैं
सोचे हुए सारे काम
लगता है
फूट रहा है शक्ति का झरना
भला लगता  है
उमंगों का छम छम उतरना


किसी किसी दिन यूँ होता है
हम बन जाते हैं
माध्यम
समन्वय करने वाली शक्ति का
जो सब कुछ
मधुर, सुन्दर और सार्थक करने की
आतुरता लिए
हमें दिखाती है
नए नए रास्ते
अवरोधों को पार करने के
अद्वितीय ढंग


किसी किसी दिन यूँ होता है
हम
अपने आपको नए सिरे से 
पहचानते हैं
अपनाते हैं
और जहाँ भी जाते हैं
शाश्वत उजियारा साथ ले जाते हैं


किसी किसी दिन यूँ होता है
कि हम ये समझ जाते हैं
ना जग हमें बनाता है
ना हम जग को बनाते हैं
'एक' जो 'बनने बनाने' वाला है
हम उसको देखते देखते
अपने को छोड़ कर
 पूरी तरह उसमें रम जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १६ मिनट
शुक्रवार, अप्रैल २३, 2010

Thursday, April 22, 2010

हर आरोपित सीमा के पार

(मेरा न्यूयार्क - जहाँ पेड़ और इमारतों के बीच होता है संवाद, चित्र -अशोक व्यास )

१ 
सुबह उठ कर
करना होता है चयन
फिर से सो जाऊं
या बिस्तर छोड़
अपनी जाग्रत
अवस्था अपनाऊँ


चुनना पग पग पर
हमारा जीवन बनाता है
पर सही चयन करना
हमें कोई नहीं सिखाता है


कई बार 
डर या चीख-पुकार
छीन लेते हैं
चुनने का अधिकार


चुनना स्वतंत्रता और आत्म निर्भरता का
विलक्षण उपहार है
पर मुश्किल है समझना, चयन के पीछे
 अहंकार है या प्यार है

हम सीमाओं में उलझ कर सोचते हैं
बस छोटा सा हमारा विस्तार है
उसे नहीं देखते जो हमेशा हमारा है
और हर आरोपित सीमा के पार है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ५८ मिनट
गुरुवार, अप्रैल २२, २०१०

Wednesday, April 21, 2010

सबसे बड़ा सौदा


कह तो रही है
कभी समुद्री तूफ़ान से
कभी ज्वालामुखी के उठान से

सत्ता वह
बात कुछ

२ 
ऐसे में
जब सब कुछ
छिन्न-भिन्न सा
देता हो दिखाई
क्या हमें
सचमुच विश्वास होता है
कि हो पायेगा
बदलाव
हमारे प्रार्थना कर लेने
मात्र से


प्रार्थना माँगना नहीं
दे देना है अपने आप को
एक उसको
जो उत्कृष्ट है, सर्वज्ञ है, सर्वत्र है


और हमने
देना नहीं
लेना ही लेना सीखा है
जीवन भर


सबसे बड़ा सौदा वो
है
जिसमें
दांव पर लगा कर
अपना अहंकार
पा जाते हैं
कभी ना छीजने 
वाला प्यार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४७ मिनट
बुधवार अप्रैल २१, 2010



सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...