ठहर कर देखता हूँ
कभी अब
वो रास्ता
जहाँ पर चल कर आया
काल की पगडंडी पर
सुनती है
अपनी चीख-पुकार
दीखते हैं कुछ ऐसे क्षण
जिनमें था हाहाकार
अनमने मन के चित्र
वो छटपटाहट का श्रृंगार
ठहर कर देखता हूँ
उसकी करूणा
कैसे मेरे
मूढ़ता के खेल से
लेकर आई मुझे इस पार
२
ठहर कर देखता हूँ
ठीक से देखता
तो तब भी
शायद देख पाता
फूलों की पगडंडी
संतोष का सार
अनंत की आराधना
से आलोकित
हर दिशा से व्यवहार
३
ठहर कर
अब
चलता हूँ
ऐसे
जैसे
परम तृप्ति का आल्हाद
नित्य है मेरे साथ
यह कैसी है बात
जिसको छूकर सुन्दर हो जाती हर बात
यह
कैसे आंनद का ज्वार
जिससे छलछलता प्यार
मुझे बंदी नहीं बनाती नासमझी की दीवार
अब दिखाई दे जाता सब कुछ आर -पार
४
अब
यह जो है
जिससे है
जिसके लिए है
स्मरण उससे अपने का सम्बन्ध का
बना देता है
उत्सवमय हर क्षण को
निर्विकार, निर्भय
चिर रसमय
मैं
न वह
जो था तब
न यह
जो दिख रहा अभी
मैं
वह
जो भोगते हुए सब कुछ
नित्यमुक्त
परे हर अनुभव के
रचता अनुभव
भांति भांति के
मैं रचना उसकी
रचयिता है जो
रचाव के पथ पर
फैलता उसके साथ
उसके लिए
और
सिमटते हुए
उसके अंक में
तृप्त निरंतर
हर स्वर में मेरा स्वर
नष्ट होता दिखूं भले
नहीं हूँ मैं नश्वर
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ नवम्बर २०१४
1 comment:
ठहर कर देखना जरुरी है जीवन में ..
बहुत सुंदर रचना
Post a Comment