Tuesday, February 16, 2016

कौन अपने कौन पराये



किस ने उन्हें दुश्मनो से सहानुभूति जताना सिखाया 
क्यूँ उन्हें हमारे घावों पर नमक छिड़कना सुहाया 

वो अपने देश के टुकड़े करने की नीयत जताते हैं 
जिस नाव में सवार, उसी में छेद करते जाते हैं 

नफरत की भाषा, बारूदी नारे, ये जो  
 जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में लगाते हैं 
अपनी कृतघ्नता का ढिंढोरा पीटते 
इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताते हैं 

वोटो की रोटी सेकने 
कुछ नेता आस्तीन में पलते सांपों को दूध पिलाते हैं 
 सरल, निश्छल भारतीय 
वोट बैंक की चक्की में पिसते चले जाते हैं 

अब ये होने लगा है की 
वे दुश्मन का सन्देश लिए 
हमारे घर आकर पीट रहे हैं ढोल 
सवाल है अस्त्तित्व का, सुरक्षा का, स्वाभिमान का,
 मेरे भोले भारतीय भैय्या,
 अब तू हल्ला बोल 

वे जो बौद्धिकता की आड़ में
 पल रहे देश के गद्दार हैं 
उनके पास बारूद से अधिक 
विस्फोटक विचार हैं 

क्यों उन सिरफिरों ने भारत माँ को लहूलुहान करने के वहशी नारे लगाए 
ऐसे पढ़े लिखों से अनपढ़ अच्छे, जो जानते तो हैं कौन अपने कौन पराये 

अशोक व्यास 
१६ फरवरी २०१६ 




Thursday, February 4, 2016

आलोक वृत्त


शिकायतों की श्रंखला 
धीरे धीरे मिटाता हूँ 
उपहार सुविधा वाले 
जब तब 
दे देकर स्वयं को 
तात्कालिकता से परे 
शाश्वत की सुध लेने का 
हौसला बढ़ाता हूँ 

२ 

थप थप बूंदों की 
सुनता हूँ 
चुप चाप रात में 
अकेला 
आलोक वृत्त के फैलाव का केंद्र 
मैं 
साँसों ही साँसों में 
तुझसे बतियाता हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
४ फरवरी २०१६ 

Tuesday, January 26, 2016

अब मुझे अंदेशा है


 
 १ 
मुझको अब अंदेशा है 
अपने होने का 
और ये बात 
किसी को बताने से डरता हूँ 
कहीं किसी की नज़र से 
यकीन में न बदल जाए 
यह अपने न होने का अंदेशा


 
अंदेशा अपनी जगह कायम 
और ये ख्वाहिश की 
मैं बना रहूँ 
बना रहने के लिए होना जरूरी हैं न 
इसलिए 
होने के अहसास को बनाये रखने 
तरह तरह के उपाय करता हूँ 
 
३ 

लिखना भी एक उपाय है 
उस जगह को टटोलने का 
जहाँ मेरे होने की चाबी छुपी है 
मैं बंद हूँ जिस ताले में 
इसे लगाने वाला शायद हूँ तो मैं ही 
पर अब जब 
न ताला याद, न चाबी याद 
याद है तो एक छटपटाहट 
जो मांगती है पंख 
जो चाहती है उड़ान 
और 
लिखते लिखते 
मैं उड़ान के करीब होते होते 
मुझे जकड लेता है 
अपने होने का अंदेशा 

४ 
 
जब मैं हूँ ही नहीं 
तो कौन उड़ेगा 
कैसे उड़ेगा 
क्यूँ उड़ेगा 

५ 
 
सवालो  के पंछी उड़ा कर 
अब 
चुपचाप देख रहा आकाश 
कौन पंछी 
कहाँ उतरे 
क्या पता 

मैं पंछियों को देखते देखते 
अपने घर से दूर चला आया हूँ 
फिर एक बार 
अब मुझे अंदेशा है 
कहीं ऐसा न हो 
मेरे घर वाले ये सोच लें 
की मैं निकल गया हूँ 
इतनी दूर की 
अब शायद लौट ही न पाऊँ घर तक कभी 

६ 
 
मैं हूँ 
इसका अहसास मुझे घर दिलाता है 
घर मुझसे नहीं चलता 
घर मुझे चलाता है 

चलना जरूरी है 

क्योंकि चल कर ही 
रुकने का मज़ा आता है 

७ 
 
घर मैं हूँ 
न जाने किसका 
पर अक्सर लगता है 
कोई मुझमें आता जाता है 
और उसके आने जाने से 
जिन्दा होने का अहसास 
जिन्दा होता जाता है 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
जान २६ २०१६
 
 

Saturday, January 9, 2016

और एक बार सही



याद को सहलायें 
दिल को बहलायें 

याद को छू लें ऐसे 
कि ये पल जगमगायें 

देख कर उनकी हंसी 
हम भी कुछ मुस्कराएँ 

और एक बार सही 
खुद को ऐसे समझायें 

 जो याद रहें हैं हमेशा 
 वो कभी मिटने न पायें 

पर जो नहीं है यहाँ 
उसे अब कहाँ से लायें 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
जनवरी ९,  २०१५ 



Thursday, December 31, 2015

नए बरस का सत्कार


अब विदा कहते हुए 
एक और बरस को 
मुड़ कर देखते देखते 
आगे भी देख रहा हूँ 
फैलाये हैं अपने दोनों हाथ 
धरा के सामानांतर 
छू रहा अतीत और भविष्य 
वर्तमान की गोद चढ़ कर 

देख रहा अतीत को
आभार के साथ
जो दिखला रहा है 
स्वर्णिम चरण गति की 

उजाला मेरा नहीं 
पर प्रकट होता है मुझसे भी जो 
उसकी स्वच्छ उजली सूरत 
आने वाले बरस के 
 हर एक दिन 
हर एक पल से 
झांक कर 
सौम्यता से कर रही है 
मेरा स्वागत जैसे 

शुभ मंगल भावनायें 
हो रही प्रसारित मेरे रोम रोम से 
और 
कण कण पर 
लिख रहा 
निर्मल, निश्छल प्यार 
 खिलखिला कर करते हुए 
नए बरस का सत्कार 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३१ दिसंबर २०१५

Friday, December 25, 2015

समय का पहिया

 

यह क्या है
जाग्रत रहे जिससे
तुम्हारा एक अंश
चेतना में
तुम्हारे चिरनिद्रा में लीन
हो जाने पर भी ?
ना  जाने कैसे
इस अबूझ से
पा लेता है
 आश्वस्ति सी  जीवन 
 २ 
आंसूओं की धारा से
पलट नहीं पाता 
समय का पहिया

पर किसी तरह पलट आती है 
रस्मयता तुम्हारी उपस्थिति की 

अब छोड़ दिए हैं
धूप को थैले में भर कर
घर लाने के प्रयास 
पर बाँध लिया है
किसी अनाम स्थल पर
तुम्हारी याद को मजबूती से 
क्योंकि तुम्हारे होने से ही तो 
अपना होता रहा है
 संसार सारा 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२५  दिसंबर २०१५

Wednesday, December 2, 2015




देह वो छोड़ कर गया बाबा 
वक्त जैसे ठहर गया बाबा 

सबको सूना सा कर गया बाबा 
एक सन्नाटा भर गया बाबा 



इस खबर पर यकीन कैसे करें 
जिससे सब कुछ बिखर गया बाबा 

अब सुने कौन, कहूँ किससे मैं
अकेलेपन से डर गया बाबा 

कहना-सुन्ना था बहुत कुछ उससे 
किससे पूछूँ किधर गया बाबा 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, मई २०१५ 

Friday, November 27, 2015



वक्तव्यों का जंगल है 
छुपा हुआ एक दंगल है 
खबर सत्य को सारी है 
कब किसके मन में छल है 

भारत माँ का आँचल है 
नित्य हमारा सम्बल है 
भाव भूमि मन पावन है 
भाग्य हमारा उज्जवल है 

संयम करने में बल है 
क्षमा बिना कैसा हल है 
समझदार दिखने वाला 
शायद थोड़ा पागल है 

- अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
नवम्बर २७, २०१५ 

Thursday, November 26, 2015

जिसमें तेरा मेरा है




यह जो घेरा है 
जिसमें तेरा मेरा है 
हमारा अब भी 
इसी में बसेरा है 
पर जो अपना स्वरुप समेट 
चले गए एकाएक 
क्या सीखना चाहिए हमें
उनके प्रयाण को देख?
- अशोक व्यास 


Saturday, October 31, 2015

सम्मान से भी शस्त्र,,,,



न अच्छी पिक्चर न मसालेदार सुर्खियां बना पाये 
विकास की बात हाशिये में सिमट कर रह जाए 

चर्चा चाय की चुस्की पर लम्बी वह चल पाये
जो विरोध और असंतोष की आंच प्रकटाये 

विरोध उसका भी जो सांस्कृतिक वैभव बताये 
अपनी परम्पराओं पर तो हम हँसते चले आये 

हमने रीति-रिवाजों की खिल्लियाँ उड़ाते चुटकुले बनाये 
अविश्वास को बौद्धिक रंग लगा कर आधुनिक कहलाये 

और भारत की आत्मा को पिछड़ी बता कर खिलखिलाए 
संस्कृत और संस्कृति नहीं, तकनीकी गलियारे हमें लुभाये 

राजकीय संरक्षण में अपने ही विरुद्ध लिखते चले आये 
पर जब युग बदला, मान्यता के प्रतिमान खड़खड़ाए 

इस बदलाव में अपना अप्रासंगिक होना सह न पाये 
फिर ध्यान खींचने हमने नए नए उपकरण बनाये 

तिल का ताड़ बना कर आस्मां पर कालिख पोत आये 
 सम्मान से भी शस्त्र बनाने की विधि जान कर इठलाये

असहिष्णुता ही दिखलाते चश्मे अपनी बिरादरी में बंटवाए
हाय, इस नासमझी के दलदल से हमें भारत माँ बचाये 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
शनिवार, ३१ अक्टूबर २०१५ 

Friday, October 30, 2015

समय बदलता है या हम?



समय बदलता है या हम?
इस प्रश्न में है सरगम 
कहाँ तक भागते रहें 
किस जगह जाएँ थम 

कहने सुनने से परे है एक संसार 
जहां पर पकता है साँसों का सार 
उसकी सजगता बढाने वाले 
हर शब्द शिल्पी को नमस्कार 

उस सृजनात्मकता का सत्कार 
जिससे प्रकट होता है विस्तार 
प्रार्थना सर्वत्र सुख -शांति की 
बढे समन्वय, उजागर हो प्यार 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३० अक्टूबर २०१५
 

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...