Saturday, January 9, 2016
Thursday, December 31, 2015
नए बरस का सत्कार
अब विदा कहते हुए
एक और बरस को
मुड़ कर देखते देखते
आगे भी देख रहा हूँ
फैलाये हैं अपने दोनों हाथ
धरा के सामानांतर
छू रहा अतीत और भविष्य
वर्तमान की गोद चढ़ कर
देख रहा अतीत को
आभार के साथ
आभार के साथ
जो दिखला रहा है
स्वर्णिम चरण गति की
उजाला मेरा नहीं
पर प्रकट होता है मुझसे भी जो
उसकी स्वच्छ उजली सूरत
आने वाले बरस के
हर एक दिन
हर एक पल से
झांक कर
सौम्यता से कर रही है
मेरा स्वागत जैसे
शुभ मंगल भावनायें
हो रही प्रसारित मेरे रोम रोम से
और
कण कण पर
लिख रहा
निर्मल, निश्छल प्यार
खिलखिला कर करते हुए
नए बरस का सत्कार
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३१ दिसंबर २०१५
Friday, December 25, 2015
समय का पहिया
१
यह क्या है
जाग्रत रहे जिससे
तुम्हारा एक अंश
चेतना में
तुम्हारे चिरनिद्रा में लीन
हो जाने पर भी ?
ना जाने कैसे
इस अबूझ से
पा लेता है
आश्वस्ति सी जीवन
यह क्या है
जाग्रत रहे जिससे
तुम्हारा एक अंश
चेतना में
तुम्हारे चिरनिद्रा में लीन
हो जाने पर भी ?
ना जाने कैसे
इस अबूझ से
पा लेता है
आश्वस्ति सी जीवन
२
आंसूओं की धारा से
पलट नहीं पाता
समय का पहिया
पर किसी तरह पलट आती है
रस्मयता तुम्हारी उपस्थिति की
३
अब छोड़ दिए हैं
धूप को थैले में भर कर
घर लाने के प्रयास
अब छोड़ दिए हैं
धूप को थैले में भर कर
घर लाने के प्रयास
पर बाँध लिया है
किसी अनाम स्थल पर
किसी अनाम स्थल पर
तुम्हारी याद को मजबूती से
क्योंकि तुम्हारे होने से ही तो
अपना होता रहा है
संसार सारा
संसार सारा
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ दिसंबर २०१५
Thursday, November 26, 2015
Saturday, October 31, 2015
सम्मान से भी शस्त्र,,,,
न अच्छी पिक्चर न मसालेदार सुर्खियां बना पाये
विकास की बात हाशिये में सिमट कर रह जाए
चर्चा चाय की चुस्की पर लम्बी वह चल पाये
जो विरोध और असंतोष की आंच प्रकटाये
विरोध उसका भी जो सांस्कृतिक वैभव बताये
अपनी परम्पराओं पर तो हम हँसते चले आये
हमने रीति-रिवाजों की खिल्लियाँ उड़ाते चुटकुले बनाये
अविश्वास को बौद्धिक रंग लगा कर आधुनिक कहलाये
और भारत की आत्मा को पिछड़ी बता कर खिलखिलाए
संस्कृत और संस्कृति नहीं, तकनीकी गलियारे हमें लुभाये
राजकीय संरक्षण में अपने ही विरुद्ध लिखते चले आये
पर जब युग बदला, मान्यता के प्रतिमान खड़खड़ाए
इस बदलाव में अपना अप्रासंगिक होना सह न पाये
फिर ध्यान खींचने हमने नए नए उपकरण बनाये
तिल का ताड़ बना कर आस्मां पर कालिख पोत आये
सम्मान से भी शस्त्र बनाने की विधि जान कर इठलाये
असहिष्णुता ही दिखलाते चश्मे अपनी बिरादरी में बंटवाए
हाय, इस नासमझी के दलदल से हमें भारत माँ बचाये
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ३१ अक्टूबर २०१५
Friday, October 30, 2015
समय बदलता है या हम?
समय बदलता है या हम?
इस प्रश्न में है सरगम
कहाँ तक भागते रहें
किस जगह जाएँ थम
कहने सुनने से परे है एक संसार
जहां पर पकता है साँसों का सार
उसकी सजगता बढाने वाले
हर शब्द शिल्पी को नमस्कार
उस सृजनात्मकता का सत्कार
जिससे प्रकट होता है विस्तार
प्रार्थना सर्वत्र सुख -शांति की
बढे समन्वय, उजागर हो प्यार
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० अक्टूबर २०१५
Thursday, October 29, 2015
राजनीती का इतिहास से क्या होता है नाता ?
कैसे राजनीतिज्ञ काल कर्म लेखन बदलवाता?
अब मनमाना लिखने पर होने लगी निगरानी
तो असहिष्णुता का नाम लेकर ये खींचा तानी
बौद्धिक भ्रष्टाचार की ये कहानी है पुरानी
सबने अपनी भड़ास निकालने की ठानी
अब होना ही है दूध का दूध पानी का पानी
जन जन लिखेगा नए भारत की कहानी
अशोक व्यास
२९ अक्टूबर २०१५
Wednesday, October 28, 2015
पूर्वाग्रह
अब फिल्म वालों ने भी टिकट कटाया
सुर्ख़ियों में आने का नया पथ अपनाया
असहमति व्यक्त करने का उत्सव मनाने
सम्मान लौटाने का हवाई बिगुल बजाया
बुला कर पत्रकार सम्मलेन
सुना रहे हैं अपना विवेचन
देश का वो हाल आम लोगों को दिखा रहे है
जो सामान्य लोग सड़कों पर देख नहीं पा रहे हैं
अपनी कुंठाओं का खुले आम व्यापार
राष्ट्रीय सम्मान का करके तिरस्कार
पूर्वाग्रह से ग्रस्त तथाकथित बुद्धिजीवी
चाहे जो हों, हमारे नायक नहीं है
अच्छा है लौटा रहे सम्मान, ये लोग
यूं भी सम्मान के लायक नहीं हैं
अशोक व्यास
न
dainikbhaskar.com | Oct 28, 2015, 19:18PM IST
ब्योमकेश बख्शी जैसी फिल्म बनाने वाले दिबाकर समेत 10 फिल्मकारों ने लौटाए अवॉर्ड
नई दिल्ली. एम.एम. कलबुर्गी और गोविंद पानसरे जैसे लेखकों की हत्या के विरोध और एफटीआईआई में आंदोलन चला रहे स्टूडेंट्स के समर्थन में 10 फिल्मकारों ने अपने नेशनल अवॉर्ड लौटाने का एलान किया है। इनमें ब्योमकेश बख्शी जैसी फिल्म बनाने वाले दिबाकर बनर्जी और आनंद पटवर्द्धन जैसे फिल्ममेकर शामिल हैं। बता दें कि लेखकों की हत्या और दादरी में पिछले महीने हुए बीफ कांड के विरोध में करीब 40 साहित्यकार साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा चुके हैं।
किन फिल्ममेकर्स ने लौटाए अवॉर्ड
बुधवार को दिबाकर बनर्जी, लिपिका सिंह, निष्ठा जैन, आनंद पटवर्द्धन, हरि नायर, कीर्ति नखवा, हर्ष कुलकर्णी समेत कुल दस फिल्ममेकर्स ने अवॉर्ड लौटाए।
दिबाकर ने कहा-आप तय करें, जो हो रहा है वह सही है?
'खोसला का घोंखसा', 'लव सेक्स और धोखा', 'बॉम्बे टॉकीज' जैसी फिल्में बनाने वाले दिबाकर बनर्जी ने अवॉर्ड लौटाने को लेकर कहा, 'एफटीआईआई से जुड़ी खबरें पढ़कर आप खुद तय करें वहां जो हो रहा है वह सही है या गलत। जो एफटीआईआई में हो रहा है, वही देश के बाकी इंस्टीट्यूट्स में भी हो रहा है। इसी वजह से हम अवॉर्ड लौटा रहे हैं।' वहीं, आनंद पटवर्द्धन ने कहा, 'देश में आज जो कुछ हो रहा है वह काफी अजीब और डरा देने वाला है, उम्मीद है कि हमारे इस विरोध को और भी फिल्मकार समर्थन देंगे।'
'खोसला का घोंखसा', 'लव सेक्स और धोखा', 'बॉम्बे टॉकीज' जैसी फिल्में बनाने वाले दिबाकर बनर्जी ने अवॉर्ड लौटाने को लेकर कहा, 'एफटीआईआई से जुड़ी खबरें पढ़कर आप खुद तय करें वहां जो हो रहा है वह सही है या गलत। जो एफटीआईआई में हो रहा है, वही देश के बाकी इंस्टीट्यूट्स में भी हो रहा है। इसी वजह से हम अवॉर्ड लौटा रहे हैं।' वहीं, आनंद पटवर्द्धन ने कहा, 'देश में आज जो कुछ हो रहा है वह काफी अजीब और डरा देने वाला है, उम्मीद है कि हमारे इस विरोध को और भी फिल्मकार समर्थन देंगे।'
Wednesday, July 8, 2015
एकमेक सकल व्योम के साथ
उसके पास न उदासी थी न ख़ुशी
एक उदासीनता थी
एक चुप्पी सी
जैसे सब कुछ हो चूका हो
वह सब जो छुपा है
भविष्य की कोख में
देख लिया गया हो
एक ऐसी आँख से
जो काल के पार देख सकती थी सब कुछ
२
उसके पास न उत्सुकता थी, न निराशा
एक अपनापन था सारे घेरे से परे
हर परिधि के पार
सहज विस्तार का आलिंगन करती धड़कनों में
वह सुन रहा था
अपने होने का संगीत
कण कण में
उम्र बढ़ रही थी
हर क्षण
पर उसे आधार दे रहा था
एक समयातीत सत्य
३
वह मगन था
क्षितिज का स्पर्श करती ललाई में
मौन उसका
निराकार की धुन सुनता
सुना रहा था
निश्छलता के सौंदर्य में भीगा
नित्य नया होता गीत
वह रच रहा था
अपना अक्षय रूप
अक्षर अक्षर
तिरोहित क्षरित भाव
वह था
पर नहीं था
था तो बस एक वह
जो होता है
नित्य
होने और न होने से परे
कृतकृत्य
पूर्ण
तृप्त
एकमेक सकल व्योम के साथ
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जुलाई ८ २०१५
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सुंदर मौन की गाथा
है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...
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है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...
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1 एक बूँद अमृत मेरी हथेली पर रख कर देखा उसने मुझे उसके देखे से अमृतमय हो गई साँसे २ तुम मुझे पकड़ना चाहते हो खिलखिलाया वह फिर तो मेरा...









