Saturday, August 20, 2011
Friday, August 19, 2011
खिलखिलाता उजियारे का टुकड़ा
कैसे शेष रह जाता है
खिलखिलाता उजियारे का टुकड़ा
उसके आस-पास
तब भी
जबकी
अँधेरे से घबरा कर
छोड़ चुके होते हैं लोग
अपनी बस्तियां
बस जाते हैं
जंगलों में जाकर
शहर से डर कर
जब सब लोग
तब भी
ना जाने कैसे
बचा रहता है
उसका साहस उसके पास
और उसे
देख कर
बची रहती है
सभ्यता की आस
वो जो
सबसे बड़ा खिलाडी है
ना जाने कैसे
मैदान में होकर भी
बना रहता है
मैदान से बाहर
खेलते हुए भी
असम्प्रक्त हार और जीत से
और
हारने की घबराहट से छूटने की
जरूरत के साथ
जब-जब देखा है उसकी ओर
खिलखिलाते उजियारे वाले
शाश्वत सखा ने दे दिया है
उपहार
नयी स्फूर्ति की जगमगाहट का
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ अगस्त २०११
Thursday, August 18, 2011
अर्थ की प्यासी अँगुलियों से
लिख कर
देखता है हर दिन
अपना चेहरा
जैसे कोई
हिलते हुए पानी में
देखना चाहे
अपनी छवि
२
शब्द नहीं
चेहरा बदलता है
हर दिन
नया आकार, नए रंग
नए सपने, नई उलझने
चेहरे को टटोलते हुए
अर्थ की प्यासी अँगुलियों से
बार बार
नए सिरे से
होता है प्रयास
किसी तरह हो जाए
स्पर्श अपरिवर्तनीय का
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ अगस्त २०११
Wednesday, August 17, 2011
सर्वकालिक होकर
सहसा
उसने फेंक दी
कई सारी पुरानी किताबें
शब्दों में छुप कर घात लगाते अतीत से मुक्त
इस बार
जब वो देखने लगा आस्मां
उड़ गए थे सपनो से
कुछ रंग
२
सहसा
भूत और भविष्य से मुक्त होकर
वर्तमान का आलिंगन करने
बढ़ाते हुए बाहें
सूरज से मिल गयी उसकी आँख
वर्तमान ने आत्मीयता से
अपनाते हुए उसे
कह दिया फुसफुसा कर
मुझ ही में समाया है
बीता हुआ
और आने वाला कल
पर दिखता सिर्फ मैं हूँ
क्योंकि
तात्कालिक बन कर मिलते हो मुझसे
मिलो कभी सर्वकालिक होकर
तो समझ पाओगे
तुमसे अलग नहीं हूँ
मैं कभी
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१७ अगस्त 2011
Tuesday, August 16, 2011
तलाश किसकी है
तेल की धारा जैसे
बहता ही नहीं
ध्यान उसका
टूटता है
जुड़ता है
फिर टूट जाता है
और इस युग्म के बीच
मुझसे मेरा परिचय
छूट जाता है
२
परिचय छूट जाने से
बदल जाती है भूमिका
बदलती गति की दिशा, गंतव्य का पता
अपरिचित स्वयं से
अपने ही नगर में
भटक जाता
ढूंढता रहता है कुछ
ये जाने बिना कि
तलाश किसकी है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ अगस्त २०११
Monday, August 15, 2011
प्राणदाता का अनुग्रह स्पर्श
धीरे धीरे लौट आया फिर
अपने आप में मैं
मिट गया खोखलापन
लुप्त हुआ अपरिचय का भाव
छूकर
मेरे सब इन्द्रियों को भीतर से
किसी ने
जगा दी आश्वस्त करती
नूतन जगमगाहट
धीरे धीरे
फिर मुखरित हुआ
जीने का आनंद
झंकृत हुए
उमंगों के स्वर
लहराई चाह
कुछ ऐसा करने की
कि अभिव्यक्त हो
मेरा सबसे जुड़ाव
लो पेड़, बादल, पंछियों की बोली के साथ
फिर करने लगी
मेरी धडकनें मौन संवाद
फिर से महसूस हो रहा है
मेरी शुभ कामनाओं में
तुम्हारी स्फूर्ति है
मेरे प्राणों को
पूर्णता की माधुरी से
भर रहा है
प्राणदाता का अनुग्रह स्पर्श
अशोक व्यास
१५ अगस्त २०११
न्यूयार्क, अमेरिका
Sunday, August 14, 2011
ओ स्वर्णिम विश्वास !
उतर कर
अपनी आश्वस्ति के सिंहासन से
तुम्हें देख कर
अनदेखा करता
छोटे छोटे खेल में गुम होता हुआ
मैं अब
तुम्हें पुकारने की जरूरत नकारता
देख रहा हूँ
बीतते समय के साथ
जो बीत रहा है
वो तुम नहीं हो यदि
तो
मैं भी क्यूं होऊँ?
२
अब
अपने आप पर
इतना अविश्वास हो चला है मुझे
की
छू भी नहीं पा रहा
स्वयं को
और
छल को छूने से ऊब कर
किसी एक क्षण में
अपने पर अविश्वास के बावजूद
छू लेता हूँ
सीधे सीधे तुम्हें
ओ स्वर्णिम विश्वास !
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ अगस्त २०११ Saturday, August 13, 2011
विस्तृत चेतना का आलिंगन
१
आज
देख रहा हूँ
कितनी दुरूह है
तुम्हारी कविता
ये मेरा जीवन
इतनी सारी परतें
इतने सारे आयाम
इतना विस्तार देकर भी
नहीं बताया तुमने
कैसे करूँ
इस विस्तृत चेतना का आलिंगन
२
आज लग रहा हूँ
जो कुछ छुपाया है तुमने
वो शायद इसलिए की
हर दिन करता रहूँ
मैं अपना आविष्कार
और इस तरह
हर दिन मिलता रहे
नया नया उपहार
३
तुम से ही है
प्यार, सार
रसधार,
अपने
जन्मदिन पर
तुम्हें प्रणाम, तुम्हारा आभार
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अगस्त २०११
Friday, August 12, 2011
न पीड़ा सत्य है न प्यार
![]() |
| (चित्र - विशाल व्यास, जोधपुर में एक पोल, --- तब जब बड़े बड़े थे द्वार, कितना था दिलों का विस्तार) |
पीड़ा का पनघट था
जहाँ
कल तक
आज उग आई हैं
प्यार की कोपलें वहां
शायद
न पीड़ा सत्य है न प्यार
शायद
झूठ है
यह बंधन भी
जो कभी हमें पीड़ा से
कभी प्यार से एकमेक करता है
शायद सत्य तो हमारा नित्यमुक्त होना है
जिसे झुठलाने
किसी न किसी पीड़ा
या किसी प्यार के सन्दर्भ से
बंधे होने का खेल
करते रहते हैं हम
ताकि बनी रहे
हमारे लिए हमारी परिचित सी
सीमित पहचान
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ अगस्त २०११
Thursday, August 11, 2011
अपेक्षित बदलाव की धारा
![]() |
| (चित्र - विशाल व्यास, स्थल- मेहरानगढ़ दुर्ग से मेरा जोधपुर) |
बदलाव उतना दूर नहीं होता
जितना हम सोच लेते हैं
अपने जड़ता में जकड़े-जकड़े
नहीं करते विचार
बस उठ कर खिड़की से पर्दा हटाने
या कमरे में कांच की दिशा बदल देने मात्र से
बह सकती है
अपेक्षित बदलाव की धारा,
हम कितनी उर्जा लगा लगा कर
अपनी निष्क्रियता के समर्थन में
नए नए तर्क बनाते हैं
और अपने ही विरुद्ध
एक लड़ाई सी लड़ते जाते हैं
फिर होता ये है
की एक दिन जीत कर भी
हारे हुए नज़र आते हैं
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ अगस्त २०११
Wednesday, August 10, 2011
अभी दूर सही शिखर
अभी दूर है
शिखर
हाँफते हाँफते
और न जाने कितनी
चढ़ाई चढ़नी है
रुकते-सुस्ताते
कभी छटपटाते, कभी मुस्कुराते
देखने हैं
ये सभी पत्थर
जो पथ बन कर पहुंचा रहे हैं
गंतव्य तक मुझे
अभी दूर सही शिखर
चुका नहीं मेरा हौसला
शेष है धैर्य और
ये आस्था भी
की तुम ही खेल रहे हो
छुप्पा-छुप्पी मुझसे
ना जाने क्यूं
मैं अब भी
मानता हूँ
की तुम्हारी जीत मैं भी
मेरी हार नहीं है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० अगस्त 2011
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