Wednesday, February 26, 2014

वही मुक्तिदाता है


यह जो भाग दौड़ है 
हर दिन 
एक लक्ष्य के पीछे 
अपने आप को 
फिर फिर टटोलते हुए 
फिर फिर संवारते हुए 
रात दिन 
चिंतन नगरी में 
एक नया उत्सव सजाते हुए 
यह सब तैय्यारी 
जिसके लिए है 
उसे रिझाना क्या हो पाता  है 
और उसके लिए इस तरह नए नए रूपों में 
ढलते हुए 
क्या मैं मूल रूप में शेष रह जाता है 
२ 
तनाव रहित 
एकाकी क्षण में 
तटस्थ हुआ 
अपनी ही दौड़ के 
चल्यायमान स्मृति चित्र देखता 
यह 
मैं 
जो मुस्कुराता है 
इस मैं का 
उस भागते मैं से जो नाता है 
उस नाते को जो बनाता है 
हो न हो, वही मुक्तिदाता है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२६ फरवरी २०१४

Monday, February 24, 2014

मेरी दस्तक में अँधेरा क्यूँ था



मेरी दस्तक में अँधेरा क्यूँ था 
जो ना मेरा, वही मेरा क्यूँ था 

जहाँ पे भीड़ थी तन्हाई की 
वहीं पे मेरा बसेरा क्यूँ था 

वो तो नागिन सी नहीं थी लेकिन 
सांस में मेरी सपेरा क्यूँ था 

भला कहूँ की बुरा तू ही बता 
मेरे अंदर तेरा डेरा क्यूँ था 

---


अब तो है एक दास्ताँ अपनी 
पहले इतना तेरा- मेरा क्यूँ था 

अब उजाला ही है हमराह मेरा 
पहले ओझल ये सवेरा क्यों था 

अब तो देखे से 'हद' सिमट जाए    
पहले नज़रों में वो घेरा क्यूँ था


अशोक व्यास 
(पहले चार शेर बरसों  पुराने, अंतिम तीन आज आये 
(२४ फरवरी २०१४, सोमवार, न्यूयार्क) 





Monday, February 17, 2014

जीवन के हर रंग को नमन



जीवन के हर रंग को नमन 
संवित गुरु का नित आराधन 

पल पल पावन करने वाले 
संवित गुरु को पग पग वंदन 

जीवन के हर रंग को नमन 
संवित गुरु का नित आराधन 

उनकी दृष्टि ने दिखलाया 
परम सत्य का यह आमंत्रण 

जीवन के हर रंग को नमन 
संवित गुरु का नित आराधन 

उनके सुमिरन से आलोकित 
हर अनुभव उज्जवल आभूषण 


जीवन के हर रंग को नमन 
संवित गुरु का नित आराधन 

सतत प्रेम की निर्मल गंगा 
संवित गुरु की कृपा विलक्षण 

हर पथ शाश्वत सुमन सुझाते 
आत्म सखा श्री गुरु अभिनन्दन 

जीवन के हर रंग को नमन 
संवित गुरु का नित आराधन 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

२ 

गुरु चरणो का नित आभार 
गुरुकृपा से जीवन सार 
गुरु दृष्टि से प्रकट हो रहा 
सांस सांस में प्यार 

गुरु चरणो का नित आभार

मंगल पथ, आलोक प्रसार 
मधुर समन्वय की झंकार 
गुरुवाणी से पल पल सम्बल 
पग पग पर जाग्रत उजियार 


गुरु चरणो का नित आभार 

परम मित्र गुरु! जय जय कार 
सिद्ध गुरु का नित सत्कार 
ब्रह्म निष्ठ संवित गुरु वाणी  
ज्योतिर्मय जग का विस्तार 


गुरु चरणो का नित आभार 

संवित गुरु मेरे शांत स्वरूपा 
उनका हर संकेत अनूठा 
लक्ष्य साध की सतत प्रेरणा 
छुड़ा रही हर बंधन झूठा 

गुरु बिन सब निस्सार 
चुरू चरणो का नित आभार 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१७ फरवरी २०१४ 








Tuesday, February 11, 2014

जिससे होता है सृजन



सृजन उसका है 
मेरे लिए तो लक्ष्य है बस दरसन 
दरसन उसका 
जिससे होता है सृजन 

२ 

निःशब्द, निस्पंद 
पुलकित एकांत 
उसकी मुस्कान से छलकी पूर्णता का भाव 
अब तक 
ज्यों का त्यों धरा है 
मेरे चारों और 

मेरे हिलने से 
छिन्न-भिन्न हो सकता है 
यह मौन का समन्वित राग 

तो क्या 
पूरी तरह निश्चल हो रहूँ 
यह ऐसी गति अपनाऊं 
कि 
गत्यात्मकता और स्थिरता से परे 
कालमुक्त प्रवाह में 
तन्मय हो 
जाऊं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
११ फरवरी २०१३ 

Sunday, February 9, 2014

कालजयी अज्ञेय

कालजयी अज्ञेय जी को समर्पित 


तो अब 
नए सिरे से 
खुल रही है यह बात 
वो 
सौंप गया है 
परतों के पीछे एक सौगात 

उसने 
सूक्ष्म दृष्टि से दिखाई जो 
 सनातन संपर्क की बात 

वो 
आज भी आलोक - स्फूर्ति सहित 
धरी है, उसके शब्दो के साथ 

२ 

उसने जो देखा 
जो भोगा 
जैसे जैसे जाना 
भारत वैभव 

वो जिन जिन 
प्रश्नो से जूझा 
जिन जिन अवधारणाओं को 
परिभाषित कर 
जहां जहां 
प्रकाश स्तम्भ लगा कर 
स्पष्ट किया 
पथ पीढ़ी का 

वे आज 
उसके जाने  बाद भी 
प्रकाशित करते हैं 
हमारा पथ 

वह 
काल के प्रश्नों को समझते हुए 
संस्कृति के महत्त्व हेतु  
जिस 
मूल्य बोध 
नियति बोध 
क्रीड़ा के भाव  
गति बोध और 
स्वाधीनता के बोध की 
चर्चा कर रहा था 

उसकी सार्थकता 
दिनों दिन बढ़ती जा रही है 
पर 
हम उसे व्यक्तित्व और कृतित्व को 
दिनों-दिन 
सजावट की वस्तु बनाते 
उसकी तस्वीर पर हार चढ़ाते 
उसके चिंतन की नदी से बचते-बचाते 
कहीं न कहीं 
जाने-अनजाने नकार रहे हैं  
अपनी आत्म-सम्पदा 
और 
अदृश्य कटोरा लिए 
सजे - धजे वस्त्रों में 
अपना दारिद्र्य छुपाते 
जीवित होने का नाटक करते हुए 
इसी नाटक को सत्य कह कर 
पहुंचा रहे हैं 
आने वाली पीढ़ी तक 

३ 

वह नहीं है 
पर 
विदेशी प्रभाव में 
अपनी भाषा और संस्कृति को 
आस्था से देखने-अपनाने वाली 
उसकी दृष्टि 
अब भी 
बचा सकती हैं हमें 

बचने वाली सिर्फ देह नहीं होती 
वह होता है 
जो हम हैं 
और जिसके होने को 
 पहचानना और मानना
यानि 
अज्ञेय प्रदत्त 
सृजन सीढ़ियों पर चढ़ते जाना  


अशोक व्यास 

न्यूयार्क, अमेरिका 
९ फरवरी २०१४ 





Sunday, February 2, 2014

हास्य का झरना

प्यास परिवर्तन की 
जगा कर भगाती है 
पर परछाई मेरी 
मेरा पीछा करती जाती है 


२ 

तुम्हारे साथ 
उस ठहाके की उजली धार का फूटना 
कैसे 
एक कर गया हमें 
एक सुन्दर साझी अनुभूति में 

अचरज इस बात पर 
अब भी है 
कि कैसे 
तुमने चट्टान के बीच 
देख कर 
हास्य का झरना 
एक निर्मल मुक्ति में 
करवा दिया स्नान 
इतने सारे लोगों को 

यूँ 
अब भी चट्टान तो सूखी है 
पर लोग जो भीगे हैं 
और जो भीगने वाले हैं 
इस झरने में 

उद्गम इस झरने का 
पहले तो वहाँ होता है 
जहाँ तुम्हारी दृष्टि से 
उभर आती 
जगमग मोतियों सी 
हास्य की सुन्दर लड़ियाँ 

और फिर तब जब 
 इस रसमय अनुसंधान से 
मिल जाती है 
एक और दृष्टि 

तो क्या सचमुच जादू सारा 
दृष्टि का है 
सन्दर्भ सारे तो निमित्त मात्र हैं 

जादू क्या सब 
 हमारे ही भीतर है 
जो सजीव करता 
 अनदेखे स्थल से 
तारो ताज़ा करते 
हास्य का झरना 
सन्दर्भों की पहाड़ी पगडंडी पर 

लो अब चलते चलते 
एक और बात 
जो प्रतिक्रिया को विस्तार देती है 
उस बात का हाथ थाम कर 
तुम बंधन में भी जा सकते हो 
और मुक्ति में भी 

दृष्टि मुक्ति वाली भी 
हास्यानुसन्धान करवाती दृष्टि की तरह 
जोड़-गणित से परे 
तुम्हारे निर्मल सत्य की 
आग्रह मुक्त अभिव्यक्ति की तरह है 


और एक दृष्टिकोण यह भी है 
जब छूट जाता पाने का आग्रह 
स्वतः सब कुछ पा जाते हम 


अशोक व्यास 
२ फरवरी २०१४ 


Monday, January 20, 2014

अब वह भी हंस पड़ा


बड़ी चुपचाप सी महफ़िल थी 
लोग आस्मां की तरफ नज़रें जमाये थे 
कोई भी न हिल रहा था 
न बोल रहा था 
पर ये सब जीते जागते लोग थे 
ऐसी बात हवा से मालूम हो रही थी 
मूर्तियां होतीं तो उनमें 
इस तरह की आश्वस्ति या अहंकार न दमकता 

मूर्तियां होती तो 
उनके आस पास उपलब्धि की सम्भावना से 
इस तरह का उत्साह न जगमगाता 
मूर्तियां होती तो 
उनके आस पास 
तलाश की थकान वाली 
मिटटी की गंध न होती 

२ 
उसे मालूम था 
वो सब अपनी अपनी 
कविताओं की अगवानी करने 
इस शिखर पर बैठ कर 
अनुभूति और अभिव्यक्ति के सम्बन्ध का 
अनूठा स्वाद ले रहे थे 

उसे लगा 
शायद वे सब 
उसकी उपस्थिति से अनजान होते हुए भी 
उसके वहाँ होने पर आपत्ति उठा रहे थे 

उसे अदब की निगरानी करने वाली 
एक नज़र ने 
मुस्कुरा कर कह भी दिया 
तुम्हारे नाम तो आज 
कोइ कविता आस्मां से उतरने वाली नहीं है 

३ 

वो उठ कर चलने को हुआ 
दो कदम चला होगा 
कि एक नन्ही सी कविता भागती हुई आई 
उसकी अंगुली पकड़ कर साथ साथ चलने लगी 
उससे कहा 
मुझे पहचाना, मैं तुम्हारी माँ हूँ 

माँ वो ही तो नहीं 
जो तुम्हें जन्म देती है 
माँ वो भी तो है न 
जो तुम्हें बनाती है 


४ 

तुम मुझे बना कहाँ रही हो 
बनने की चाह लेकर ही तो 
बार बार रोया हूँ 

इसिलए तो मैं आई हूँ बेटा 
रोते रोते तुम कहीं 
अपने आपको 
बनाने की जगह बिगाड़ न लो 

५ 
अब वह भी हंस पड़ा 

हँसते हँसते 
नन्ही कविता ने कहा 
'सुनो 
याद रखना 
जब दिखाई न दूं तब भी 
मैं होती हूँ साथ तुम्हारे 
और मुझे बुलाने के लिए 
तुम्हें आसमान की तरफ नहीं 
अपने भीतर देखना है '

तुम्हारे अंदर 
इस क्षितिज से उस क्षितिज जितना विस्तार है 

कहते कहते 
कविता ने अपने संकेत से 
उसकी दृष्टि को दूर तक पहुंचाया 
और 
स्वयं अदृश्य रूप में विलीन हो गयी 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२० जनवरी २०१४ 

Saturday, January 18, 2014

देवदारू का सामिप्य


१ 
मैं उसे देखता हूँ 
जो लहर की तरह उठता है 
मेरे भीतर 
और मेरे देखने से 
सकुचा कर 
छुप जाता है 
मुझ में ही 

२ 

बाहें फैला कर 
प्रेम भरी मुस्कान में भीगा 
भेजता बुलावा 
स्वर्णिम मौन को 
आओ 
मैं अपनाऊं तुम्हें 
तुम मुझे अपनाओ 

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कलम मेरे हाथ में है 
अंगूठे और दो अंगलियों के बीच 
इस तरह धरी की 
सधी हुई गति कर पाये 

सुबह का झकाझक उजाला 
प्रसन्नता से भर रहा 
मौन को 

--------------
(२-९-१००९)

यह नूतनता का आव्हान 
तुम्हारी महिमा का गान 
ओ अनंत करूणामय 
तुम सर्वत्र विद्यमान 

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दिखता है 
लौट कर 
जकड सकते हैं 
वही बंधन 
हो सकता है प्रारम्भ 
वही क्रंदन 
यदि देवदारू का 
सामिप्य भुला कर
फिर नीम-बबूल संग 
रगड़ खाने लगे मन 
(जून १, २०१३)

अशोक व्यास 
(संकलन ब्लॉग हेतु जनवरी १८, २०१४)

Tuesday, January 14, 2014

सब के सब हैं ख़ास





यदि आत्मीय दृष्टि से देखने का निरंतर हो अभ्यास
 तो नहीं दिखे आम आदमी कोई, सब के सब हैं ख़ास 

और अपने नाम से यदि कुछ सीखते प्रशांत भूषण 
तो कभी न फैलाते खंडित विचारों का अशांत प्रदूषण 

कथनी-करनी में साम्यता नहीं जिनके आस-पास 
कैसे विश्वसनीय हो सकते हैं वो कुमार विश्वास 

बिखर जाएँ तिनके झाड़ू के, तो बिखराव दिखाते हैं 
गन्दगी दूर करने की बजाय, और गन्दगी बढ़ाते हैं 

साफ़ हो या बदली छाया हो आसमान 
अर्जुन की आँख से ही मिलेगा समाधान 

तन्मयता से करना है लक्ष्य का अनुसंधान 
सत्य का सम्मान से ही भारत रहे महान 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
लिखा १३ जनवरी २०१४ 



आकर्षण पतंग का


"उत्तरायण में अहमदाबाद खींच लाया आकर्षण पतंग का 
"जय हो" कहने आ  गया 'नमो"' के साथ नायक दबंग का 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१४ जनवरी २०१४ 

Saturday, January 11, 2014

कोई स्थल विश्राम का

 
लिख लिख कर बार बार 
पता अपना पूछता हूँ अज्ञात से 
हर बार एक सिरा 
मिल ही जाता है उसकी बात से 

सिरा थाम कर अदृश्य पगडंडी पर 
धीमे धीमे बढ़ जाता हूँ 
इस अनुसंधान में अनजाने 
कुछ नया सा गढ़ जाता हूँ 
 
भूल भुलैया के बीच 
स्पष्टता की एक झलक पढ़ जाता हूँ 
सत्य है बस तुम्हारा साथ 
इस सम्बल से कई पर्वत चढ़ पाता हूँ

२ 

लिख लिख कर कई बार 
कुछ नए रास्तों पर भटक जाता हूँ 
वही वही शब्द वही वही बात 
उसी उसी चौराहे पर अटक जाता हूँ 

फिर थक हार कर 
ढूढता हूँ कोई स्थल विश्राम का
और कर लेता 
उपयोग तुम्हारे नाम का 

३ 

तुम्हारा नाम 
यहाँ से वहाँ 
सब जगह असर करता है 
फिर क्यूँ 
एक कोई मेरे भीतर 
हर स्थिति में डरता है

४ 

लिख लिख कर 
इस तरह जब मैं अपने आप को दोहराता हूँ 
देख देख कर 
मुझे ढकने वाली परछाईयाँ हटाता हूँ

न जाने कैसे, इस दोहराव के द्वारा 
मैं एक नूतन आलोक अपनाता हूँ 
 
और सहज ही हो जाता कुछ ऐसा 
हर भटकाव से परे हो जाताहूँ 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
११ जनवरी २०१४

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...