Saturday, April 28, 2012
Friday, April 27, 2012
अपने आप में लौटना
लौटते हुए
अपने आप में
देख रहा था
क्या क्या सहेजा गया
इस बार की यात्रा में
दिखाई दिया
स्निग्ध आशीष का कोष
उमंगों का नया गुलदस्ता
धूप के पदचिन्हों से जगमगाता मन
और
शाश्वत को थामे रखने की
नयी कटिबद्धता
इस बार
विराट के श्री चरणों में
अपने आपको
समग्रता से सौंप देने की निष्ठा का
अज्ञात गगन से उतरना
पुलकित कर रहा था
इतना
की
अपने आप में लौटना
और
अपने भीतर से लौटने का भेद
घुल गया था
क्षितिज में सहज ही
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ अप्रैल २०१२
Thursday, April 26, 2012
Wednesday, April 25, 2012
बात कभी पुल बनाती है
1
बात खींच खींच कर
कभी कभी
सम्बन्ध के होने की
अनुभूति का स्वाद
लेते हैं हम
और कभी कभी
बात ही बात में
खिंचाव का अनुभव कर
अपने आप में सिमट
अपने लिए
सुरक्षित कवच का निर्माण कर लिया
करते हैं हम
बात कभी पुल बनाती है
कभी पुल मिटाती है
कभी
'मैं' और 'तुम' को
'हमारा' बनाती है
कभी
'मैं' 'मैं' की तूती बन कर
रह जाती है
२
कविता से कर्म है
या कर्म से कविता
या शायद
कविता उस दृष्टि तक
पहुँचने की ललक
की हर कर्म कविता बन जाए
जिससे
प्रेम, सौंदर्य, आनंद और संतोष का झरना
सहज ही बह बह आये
2
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ अप्रैल २०१२
Tuesday, April 24, 2012
अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति
आश्चर्य है
देखते-देखते
किस तरह बनती हैं आदतें
दिन प्रतिदिन
हमारे द्वारा
एक ही तरह के आचरण का अभ्यास करते करते
और फिर
धीरे धीरे
यंत्रवत
हम वही दोहराने लगते हैं
जिसका बीज करते हैं आरोपित
जाने-अनजाने
उसी क्रिया को दोहरा-दोहरा कर
२
और
इससे बड़ा आश्चर्य ये
की
स्वतंत्रता पूर्वक
जिन आदतों को
जन्म दे सकते हैं हम
धीरे-धीरे
हम उन्ही आदतों के
आधीन
भुला बैठते हैं
अपना स्वतंत्र चिंतन
३
जाग्रत रहने के अर्थ में
निहित है
ये भाव की
होती रहे निरंतर
हमें
अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति
अशोक व्यास
२३ अप्रैल २०१२
न्यूयार्क, अमेरिका
Monday, April 23, 2012
आनंद की रसमय धारा
अब झगड़ता नहीं
स्वीकार लेता हूँ
तुम्हारा दिया
हर अनुभव
हर दिन
और
तत्काल छूट जाती है
छटपटाहट
दिख पड़ती है
कल्याणकारी आभा
हर स्पंदन में
छू पाता हूँ
आनंद की रसमय धारा
बह रही जो
मेरे जीवन में
तुम्हारी चरण रज छूकर
कभी इसे 'कृपा नदी' का संबोधन दे
नमन करता हूँ
कभी कृतज्ञता के वस्त्र पहन
डुबकी लगा इस मंगल धारा में
उज्जीवित हो
स्वागत करता हूँ
एक नए दिवस का
प्रेम, प्रज्ञा और परिपूर्णता के साथ
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ अप्रैल २०१२
Sunday, April 22, 2012
तुम्हारे नाम की पुकार
आज
बिना तुम्हें बुलाये
मैंने सोचा था
अपने आप
बगीचे में जाऊँगा
एक नया पुष्प लेकर आऊँगा
और
उस देहरी पर जाकर
चुपचाप रख आऊँगा
पर चक्कर काट-2 इस पार
बगीचे की दीवार में
जब दिखा नहीं कहीं भी द्वार
तब हार कर
लगाते ही तुम्हारे नाम की पुकार
सामने से हट गयी दीवार
और सुन्दर दृश्य श्रंखला
और पावन सौरभ ने
बदल दिया भाव संसार
स्मरण आया
उस देहरी पर
पुष्प रख कर नहीं आते हैं
वहां जाकर हम इन्हें चढाते हैं
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ अप्रैल २०१२
Saturday, April 21, 2012
दिखा कर सार अपना
व्यवस्था जो है
ये जीवन की
देह में छुपी संभावनाओं की
हर एक इन्द्रिय में निहित कौशल की
ये क्षमता की
स्वाद ले सकूं
छू सकूं
देख सकूं
सुन सकूं
इन्द्रिय संयोग का आनंद उठा सकूं
ये सब
विलक्षण है न
मन पर होता है असर
निर्मल होने का
निष्कासन उस सब का
जो अपच है
प्राकृतिक ढंग से
हो ही जाता है प्रतिदिन
दिन की
एक एक सीढ़ी पर
गूंजता है
उत्थान का गीत
स्वच्छता, उल्लास, विश्वास, प्रेम, समन्वय
तन और मन के सम्बन्ध को
बनाता हुआ
वह जो
एक सूक्ष्म है
दीखता नहीं है जिसका
अपने भीतर होना
वह कभी ऊबता नहीं हमसे
यानि
उसका रस
हमारे गतिविधियों पर निर्भर नहीं
कहीं ओर से पोषित है
उसकी शक्ति
उसका धैर्य
उसकी महिमा
वह होकर भी
नहीं होता हमारे भीतर
उस तरह की
छेड़-खानी करे हमारे
क्रिया कलापों में
इस सर्व साक्षी तक
अपनी बात पहुचाने
कभी शब्द-कभी मौन
देते हैं साथ मेरा
बात बस इतनी ही नहीं की
संप्रेषित कर दूं अपनी कृतज्ञता
वरन यह प्रार्थना भी
की मुझे क्षुद्रता से छुड़ा कर
एक मेक कर दो
विस्तार के साथ
जगा दो
सेवा का सौन्दर्य मेरे भीतर
दिखा कर सार अपना
अशोक व्यास
२१ अप्रैल २०१२
Friday, April 20, 2012
पूर्णता का प्रवाह
यह जो
अनायास प्रकटन है
उजियारे सौंदर्य का
धूप की तुलिका
रच देती है
कहीं पत्तियों, कहीं भवनों की आकृति पर
एक नूतन संयोजन
अव्यक्त आनंद का
इसे सहेजना है यदि
तो
जाग्रत होना है
इस क्षण
चित्र चेतना पटल पर
शाश्वत की
स्निग्ध, कोमल मुस्कान का
ठहरा है जो
इस क्षण,
इसी में पूर्णता है
कहते हैं
प्रसन्नता से खिल कर गुरु
'नित्य जाग्रत रह कर
तुम अपने जीवन को
पूर्णता का प्रवाह बनाओ ना!'
फिर अपने मौन में
सोच रहे हैं शायद
"पूर्णता नित्य-संगिनी है
पर जाग्रत रहे बिना
इसे न कोई जान पाए
न अपनाए'
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० अप्रैल २०१२
Wednesday, April 18, 2012
मेरी मूढ़ता या तुम्हारी शरारत
वहां से यहाँ तक की यात्रा में
सब कुछ किया तो तुमने ही
केशव
मेरे उत्थान-पतन की लहरों का
साक्षी भर रहा मैं
और
जब जब
स्वयं को देखते हुए
देख पाया तुम्हारे होने का
यह भाव
जिससे तुम्हारा होना
प्रकट होता रहा मुझ पर
कभी पत्तियों की ओट में छुप कर
मंद मंद मुस्कान के साथ
अधरों पर बंशी धर
एक मंगल-तान से
छिन्न-भिन्न कर दिया तुमने
मेरा
तनाव रचती प्रक्रिया को
कभी
यूँ ही
उँडेल कर मुझ पर
समग्रता का सौन्दर्य
हँसते हँसते
विलीन हो गए तुम नील गगन में
ओ विराट सखा
यह जान कर भी की
तुम्हारे समीप होने का भाव ही
पूंजी है मेरी
इस भाव की सुरक्षा के प्रति
इतना असावधान कैसे रह जाता हूँ मैं
ये मेरी मूढ़ता है
या तुम्हारी शरारत
अशोक व्यास
१८ अप्रैल २०१२
बुधवार
Tuesday, April 17, 2012
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सुंदर मौन की गाथा
है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...
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एक मैं निश्चल मुझे अब भी तुम्हारी याद आये है मुसलसल नहीं सूखा मेरे दाता, मेरी आँखों का ये जल नहीं समझा जगत क...
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है कुछ बात दिखती नहीं जो पर करती है असर ऐसी की जो दीखता है इसी से होता मुखर है कुछ बात जिसे बनाने बैठता दिन -...









