Monday, February 28, 2011

ओ विराट व्यापारी


मेरे पास इस पल
जितनी भी दौलत है
तुमसे ही आयी है

और  तुम्हारे नाम करते हुए
ये बरखा की बूंदे
ये निर्मल मौन भोर का
ये कृतज्ञतापूर्ण उल्लास 
और
आनंद का अमृतमय स्वाद

बढ़ रही है मेरी दौलत
कैसे व्यापारी  हो तुम
एक बीज लेते हो
पूरा वृक्ष देते हो

ओ विराट व्यापारी
मुझे भी सिखला दो
ये 'देते रहने की समझदारी'

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, २८ फरवरी २०११   
       

Sunday, February 27, 2011

मुक्ति का परिचय

 
लौट कर
अब शायद
नहीं पहुंचा जा सकता उस गाँव तक
 
वैसे वहां अब एक 'बड़ी' सड़क है
चुप्प से खेतों के बीच
अचानक बज उठता है
किसी का 'मोबाइल'

बच्चे सड़क पर कम
कंप्यूटर पर अधिक खेलने लगे हैं
 
वो सब तकनीकी रंग
जिन्हें हमने जरूरी माना था
संसार से जुड़ने के लिए 
 
इस सबके आ जाने के बाद
ना जाने क्यूं
जरूरी ना रहा 
गाँव की आत्मा से जुड़ना
 
हो गया है 
कुछ ऐसा
की अब किसी को
आस्मां की तरफ देखने की
फुरसत भी नहीं है
 
सुविधाओं के साथ
मुक्ति की सीढियां चढ़ने की आशा रखने वाले
हम
मुक्ति का परिचय भी भूलने लगे हैं
 
लौट कर
ढूंढना चाहता हूँ
अपने गाँव में
मंदिर के अहाते में
वो जगह
जहाँ हम बच्चे 'सूखे पत्ते और फूल छुपा कर रखते थे
शायद किसी दिन
'गाँव की आत्मा के स्पंदन' भी
रख दिए होंगे
वहीँ-कहीं
अनजाने में
जिनसे
मिल जायेंगे
उस गाँव के बीज
फिर से जिसका हिस्सा बन पाने की चाह
सारे जीवन की उपलब्धियों से
अधिक मूल्यवान लग रही है
इस क्षण
 
अशोक व्यास
अमेरिका
रविवार, २७ फरवरी 2011  
     
       

 
         

Saturday, February 26, 2011

एक सुन्दर संतुलन


सम्भावना
समन्वय के शिखर की
दिखा कर
करता है स्वागत वह
कर्मभूमि पर
सिखलाता है
संतुलन
स्वीकरण और प्रतिरोध के बीच

कलात्मक प्रतिक्रिया
हर स्थिति में
हो जाती है सहज
अपना कर उसे


यह एक अद्भुत
सघन शांत स्थल सा
सृजन  बिंदु
हो गया है प्रकट
भीतर मेरे

करता है प्रसार प्रेम का
हर दिशा में

इस बिंदु का
आधार है जो
सौंप कर उसे
अपना सर्वस्व 
अब मैं
कर्म के द्वारा
देखना चाहता हूँ
एक सुन्दर संतुलन
जिसे साँसों में बैठ कर
सिखला रहा है वह


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ फरवरी २०११
    

          

Friday, February 25, 2011

अस्तित्व दीवारों का


ये किसकी व्यवस्था  है
की
बाहर रहता है सूरज
और
सारे जगत में 
फैलते उजियारे से परे 
अपने बंद कमरे के अँधेरे में
रह सकते हैं हम

ये किसका निर्णय है
की बंद रहें खिड़कियाँ-दरवाजे
कट कर
बाहर की हवा से
अपने आप में सिमटे
दोहराते रहें हम
वो कुछ बातें
जिनके गंध
बैचैन करती है हमें

ये कौन है
जो उठा कर हमारे हाथ
खुलवा देता है
हमारे ही घर की खिड़कियाँ
और
बादलों के नयी कलाकृति
का पारदर्शी संगीत
अनायास
कुछ नया रच देता है
हमारे भीतर 
ऐसा
की मिटने लगता है
अस्तित्व दीवारों का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                  शुक्रवार, २५ फरवरी २011             

Thursday, February 24, 2011

जितना बहुमूल्य है जीवन





कविता को नहीं
स्वयं को पकड़ता हूँ
किसी नए कोण से
पहुँचता हूँ अपने तक
किसी नए द्वार से

विस्मय का 
एक रोशन सूराख
दिखलाता है
मेरे कुछ अनदेखे हिस्से मुझे

पहचान की एक नयी सीढ़ी पर
चढ़ कर पुलकित होता

और अपने किसी
मार्मिक हिस्से का स्पर्श कर
लौट आता
वहां
जहाँ से शुरू होती  है
एक नए दिन के साथ
खुद का नया रिश्ता पकड़ने की यात्रा

भीतर दिखती है जो
एक झलक
अपनी अनंतता की
सुबह सुबह
शाम तक 
विस्मृत हो जाती है अक्सर

यह एक चक्र सा
चलता है जो अनवरत
इसमें
विस्मृति का भी रचनात्मक योगदान है
तभी तो हर दिन
स्वयं को छू लेने के लिए
नए नए द्वार ढूंढता हूँ
और 
बार बार अपने विस्तार के प्रति
आश्वस्त होता हूँ

इस आश्वस्ति को
न ख़रीदा जा सकता है
न बेचा जा सकता है
पर ये बहुमूल्य है उतनी
जितना बहुमूल्य है जीवन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २४ फरवरी 2011          
               

Wednesday, February 23, 2011

सब कुछ हो जाता है आसान




जो भी है
अर्जित, संचित, सुरक्षित
सहेजा हुआ
अब तक

वो सब जो
नापा जा सकता है
किसी देश की मुद्रा में

और वह
जो देखा जा सकता है 
किसी की भाव-भंगिमा में

और वह भी
जिसे ना कोइ देख पाए
न पहचान पाए
पर जिससे संतोष झरता जाए

यह सब
आधार व्यवहार के
और स्वयं से प्यार के
टिके हुए हैं
एक सूक्ष्म दृष्टि पर

इसे बचाने की तरफ
जो दे पाता है ध्यान
उसके लिए 
सब कुछ हो जाता है आसान

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
               बुधवार, २३ फरवरी 2011        

Tuesday, February 22, 2011

कई जन्मों का सम्बन्ध





उसके द्वार पर
उजियारे का उत्सव
आनंद का उमडन
बिना जाने  ही
रूप बदल जाता मेरा
न जाने कैसे
अतिथि की भूमिका छूट जाती
रंग-बिरंगे उल्लास में भीगा
नृत्य करती धडकनों के साथ
अपार प्यार के ज्वार पर सवार
करने लगता अगवानी 
मिलता गले
आगंतुकों के
जैसे सबके साथ
कई कई जन्मों का सम्बन्ध है मेरा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, २२ फरवरी २०११            

Monday, February 21, 2011

इस तरह देखें स्वयं को








लो फिर गिर रही है बर्फ रूई के फाहों सी
उजली है, जब तक ऊपर-ऊपर है
गिरने के बाद होने लगेगी काली

तय है बर्फ का गिरना तो
पर हम बच सकते हैं गिरने से
रह सकते हैं उन्नत
उसका हाथ थाम कर
जो हमें बनाने और मिटाने का खेल बनाता है







फ्रीज़ खोल कर
बार बार देखना
शायद कुछ ऐसा पदार्थ
कर ले आकर्षित
जो पहले दिख ना पाया हो

रचनात्मक चिंतन
देखे हुए को फिर से
देखते हुए
देख लेता है
कुछ अनदेखा
और
देखने मात्र से
हो जाती है तृप्ति

सारा जीवन
देखना सीखने
और इस अभ्यास में लग जाता है
की इस तरह देखें स्वयं को
की कभी अधूरे न लगे खुदको


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, २१ फरवरी २०११
        

 

Sunday, February 20, 2011

बिना किसी पूर्वघोषणा के


(चित्रकार - प्रत्युष व्यास )
(1)
एक चेहरा
चलती गाडी में
खिड़की के शीशे पर
बनाया था
बेटे ने

बाहर की ठण्ड
और अन्दर की ऊष्मा ने
सुलभ करवा दिया था एक
कैनवास सा

और ये जानते हुए भी
की यात्रा पूरी होने से बहुत पहले ही
मिट जाना है ये चेहरा
हमें अच्छा लगा था
अँगुलियों की तूलिका से 
कुछ नया रचने की वृत्ति का
इस तरह प्रकट होना

   

(2)
अब मेरे पास
नहीं है शेष
कुछ भी नया
कहने को तुमसे
दोहरा भर रहा हूँ
पुनर्व्यस्थित कर
वह सब
जो कहा जा चुका है
पर जिसे कह कर भूल गया हूँ मैं
और जिस सुन कर भूल गए हो तुम

स्मृति
पुराने को नया 
और नए को पुराना करने का खेल भी
खेलती है
बिना किसी पूर्वघोषणा के
और हर बार
हमें लगता है 
की हम स्मृति से जीत जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                   रविवार, २० फरवरी २०११             

Saturday, February 19, 2011

सूर्य की उजियारी गोद




अभिव्यक्ति की छटपटाहट नहीं
उछलन है
आनंद की रसमय धारा का
शब्दों का हाथ पकड़ कर
धर रही है
उनकी हथेली पर
अपने कुछ चिन्ह
खेल खेल में


सूर्य की उजियारी गोद 
बैठ कर 
सुरक्षित मोद में       
अब बाँट लेना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ
यह
स्वर्णिम मौन



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, १९ फरवरी २०११      

Friday, February 18, 2011

जब मैं नहीं होता हूँ


पहेलियाँ 

मेरे किये से नहीं
मेरे होने से होता है
और
मैं तब होता हूँ
जब मैं नहीं होता हूँ


सुरक्षित रहने की चाहवाले
मिट जाते हैं
और
वो
जो
अपने से कुछ बड़ा, गरिमामय, विस्तृत विस्मय 
सुरक्षित रखने के लिए
अपनी सुरक्षा का विचार तक भूल जाते हैं  
वो हमेशा सुरक्षित रह जाते हैं

           


उसके साथ
सब कुछ स्पष्ट, सरल, सुन्दर, प्रेममय
आनंद से परिपूर्ण

उसका साथ
मुझे अनायास ही
रसमय, परिपूर्ण बना देता है

अगर जो कुछ है
बस उसके साथ के 'बोध का खेल' है
तो फिर 'मैं' क्या हूँ?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार,१८ फरवरी 2011  

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...