तो फिर
यूँ हुआ
धीरे धीरे
फिसलने और चलने का अंतर
पोंछ दिया किसी ने
ब्लैक बोर्ड से,
सारे छात्र
जीवन का जो अर्थ लेकर
आये
आसमान के नीचे
उसमें
बदल गया था
मूल्यों का अर्थ
तो फिर
धीरे धीरे
यूँ हुआ कि
सूरज की किरणों के श्रृंगार वाले संस्कार
सजे रह गए
पारदर्शी शीशे की अलमारियों में
धूप का चश्मा लगा कर
अँधेरे कमरों की
थिरकती रोशनी में
नृत्य करने निकल पड़े सब
तो फिर
धीरे धीरे
यूँ हुआ है कि
सन्दर्भों के लहराते आईने में
हिलते-डुलते
सही-गलत के बोध को लेकर
हम
अब भी शाश्वत का संगीत लेकर
सूचना और तकनीक की आंधी में
ढूंढ रहे हैं
अपने जैसे लोगों को
इस मेले में
साझी सोच वाले समूह के साथ
यह जो एक
घर की सी अनुभूति है
इसके विस्तार में
क्या विस्तृत होते जाते हैं अनायास ही
हम भी
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ३० सितम्बर २०१०








