Thursday, September 30, 2010

घर की सी अनुभूति

 
तो फिर
यूँ हुआ
धीरे धीरे 
फिसलने और चलने का अंतर
पोंछ दिया किसी ने
ब्लैक बोर्ड से,

सारे छात्र
 जीवन का जो अर्थ लेकर
आये
आसमान के नीचे
उसमें
बदल गया था 
मूल्यों का अर्थ


तो फिर
धीरे धीरे 
यूँ हुआ कि
सूरज की किरणों के श्रृंगार वाले संस्कार
सजे रह गए 
पारदर्शी शीशे की अलमारियों में

धूप का चश्मा लगा कर
अँधेरे कमरों की
थिरकती रोशनी में
नृत्य करने निकल पड़े सब 
 
तो फिर 
धीरे धीरे
यूँ हुआ है कि 
सन्दर्भों के लहराते आईने में
हिलते-डुलते 
सही-गलत के बोध को लेकर
हम
अब भी शाश्वत का संगीत लेकर
सूचना और तकनीक की आंधी में
 ढूंढ रहे हैं
अपने जैसे लोगों को
 
इस मेले में
साझी सोच वाले समूह के साथ
यह जो एक 
घर की सी अनुभूति है

इसके विस्तार में
क्या विस्तृत होते जाते हैं अनायास ही
हम भी


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ३० सितम्बर २०१०







Wednesday, September 29, 2010

आत्मीय-स्पर्श

 
अब जीने के साथ साथ
जरूरी है
जताना भी
कि तुम जिंदा हो

अपने होने का अहसास 
औरों तक
पहुँचाने की कला
मार्केटिंग कहलाती है
वो समझदार लोग भी 
मूर्ख मान लिए जाते हैं
जिन्हें ये कला
अब तक नहीं आती है

आत्मीय-स्पर्श, संवेदनशील लोगों को ही
छू पाता है
अधिकतर लोगों का काम ऊपरी चमक से
चल जाता है
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सितम्बर २९, 2010




Tuesday, September 28, 2010

मेला तुम्हारा तुमसे ही है

 
बात उठाओ
ऐसी
जो
तुम्हे उठाये

उठ कर चलना किसी तरंग में
चढ़ कर बहना किसी लहर के साथ
तोड़ देता है खुमार
थाम कर समय की नई पतवार
आ सकते हो 
जड़ता के पार

कर सकते हो
हर सपना साकार
पर पहले
वो
बात उठाओ
कि तुम अपने सपने के साथ
एक मेक हो जाओ

उसे गुनगुनाओ
उसमें रम जाओ

अपने ह्रदय में
अपने लिए
विजय पताका फहराओ
यूँ ही ना 
रह जाओ

मेला तुम्हारा
तुमसे ही है
इस बात को ना
बिसराओ
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ सितम्बर २०१०

 
 

Sunday, September 26, 2010

स्मृति की मधुशाला





उनींदी आँखों में
जाग धर कर
छुप जाने वाला,
कैसे लगा देता है
नींद पर ताला,

रात की चुप्पी में
सुने है क्या-क्या 
मन ये भोला भाला,
मुस्कुराती है
घूंघट हटा कर
स्मृति की मधुशाला,


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ सितम्बर 2010

बदलाव की आशा


नहीं चलेगा
बैठे बैठे
किसी बदलाव की आशा करने का शगल
पसीना बहाओ 
अगर
चाहते हो समस्याओं का हल


खाना-पूर्ति 
ले आये भले
नदी के पार,
कभी नहीं
जानोगे
क्या है रफ़्तार?

गति का स्वाद चखने
चप्पू को तेज़-तेज़ चलाओ
अपने भीतर श्रद्धा नदी को
तन्मय होकर जगाओ



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
27 सितम्बर २०१०, रविवार 



Saturday, September 25, 2010

सृजनात्मकता का मूल स्वर



 
कुछ भी लिखने से पहले
सलेट को पोंछते थे

चाक और सलेट के
घर्षण से उत्पन्न
खुरदुरेपन के स्वर में भी
एक रचनात्मक माधुर्य था 

 एक दूसरे की
चेतना पर
कुछ नई इबारत लिखने का
प्रयास करते हम
 आज भी
रच तो सकते हैं कुछ सुन्दर, 
कुछ नया सा रूप सम्बन्ध का
 
ये खुरदुरापन 
'मित्र' शब्द तक भी
ले जा सकता है
पर
'आत्मीयता' नहीं
'हिंसा' और 'वैर' ही
उभर रहे हैं
इस साझी सामाजिक चेतना की
सलेट पर

क्यूं हम
पूर्वाग्रहों की कटुता
पोंछ नहीं पाते?
शंका और भय की छाया में
जो लिखते हैं
उसमें
सृजनात्मकता का मूल स्वर
निखर ही नहीं पाता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ सितम्बर 2010

Friday, September 24, 2010

आशा का स्वादिष्ट मुरब्बा





 
लौट कर कहाँ चली जाती हैं
वो सब 
अच्छी-अच्छी  बातें
जिनमें प्यार छलकता है
जिनसे मिलती है
सबको स्वीकारने की दृष्टि,
जिनमें होती है
आश्वस्ति कि
हर बात से
कुछ अच्छा अर्थ निकाल सकते हैं हम

वो बातें
जो आशा का स्वादिष्ट मुरब्बा खिलाती हैं
हमारी चेतना को
और
हम वैसी ही उमंगों से
भर जाते हैं
जैसी महसूस की थीं
कभी बचपन की दीवाली में

वो बातें
शायद हैं तो हमारे आस-पास ही
पर वो मनुष्य
जिनकी साँसों से
सच का प्रवेश हो पाता है
इन बातों में

हैं नहीं शायद आस-पास 
और अब
इस बात पर कौन दिलाये विश्वास 
कि उन्होंने तो ये कहा था
एक दिन
'वो मनुष्य'
जिसकी साँसे इन सब बातों को
सच बनाती हैं
मिलेगा हमें
हमारे ही भीतर


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ सितम्बर २०१०

Thursday, September 23, 2010

सवालों के पुष्प

 
सवाल एक तो ये है
कि
जो है, जैसा है
वह ऐसा ही बना रह पाये
और ये भी
कि जो है
उससे बेहतर हो सब कुछ


सवाल ये है कि
आज
नई किरण
प्रसन्नता कि
कैसे पहुँचाऊँ तुम तक
और ये भी
कि मुझ तक 
आने वाली हर रश्मि में
संतोष की चमक कैसे देख पाये
मेरी संवेदना
 
३ 
सवाल ये है कि
अमूर्त की मूर्ति बना कर
उसे कण कण में जाग्रत करने का अनुष्ठान
जो चलता है
मेरी साँसों में निरंतर
इसकी पावनता 
बनी रही कैसे

सुबह सुबह 
सवालों के पुष्प बना कर
द्वारकानाथ की देहरी पर रख
कृतकृत्य हुआ 
मैं
छोड़ कर अपने को 
बन रहा प्रवाह
शुद्ध आभा का
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ सितम्बर २०१०



Wednesday, September 22, 2010

अमिट आश्वस्ति

 
शुद्ध भाव के बिना
कैसे मिले
शुद्ध प्रसन्नता

शुद्ध प्रसन्नता के बिना
कैसे जगमगाए
सतत आनंद

सतत आनंद के बिना
कैसे स्थिर हो
अमिट आश्वस्ति

अमिट आश्वस्ति
अर्जित करने और सहेजने
क्या करूँ
कैसे करूँ

प्रश्न लेकर
पहुंचता हूँ जब 
परम पिता के द्वार पर
मांगता है
वो
मुझसे शुद्ध भाव


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ सितम्बर २०१०

Tuesday, September 21, 2010

कविता के इस छोर पर से





उस दिन
फिर एक बार
छिड़ गयी बहस
मैंने किया था प्रस्ताव
अब दे रहा हूँ 'त्याग पत्र'
हो चुकी कविता
बस
और नहीं अब
 
उस दिन
ना जाने क्यूं
फिर सोचा मैंने
बंधन है 
कविता के इस छोर पर से
इसे उगते हुए देखना
और
साथ में थी
छटपटाहट
कविता नहीं
जीवन चाहिए
संवेदना का दर्पण चाहिए


सहसा
ना जाने कहाँ से
चला आया था
'सत्य का प्रश्न'
सत्य के साथ
स्वयं को अपनाने की चुनौती
और
तब कहीं कुछ पिघला
किसी किरण ने बताया
'छल को जीने
और
किसी एक फ्रेम में
बंध जाने की चाहत लेकर
कविता के अहाते तक
नहीं पहुंचा जा सकता'


कविता के लिए
निरावरण होना होता है
और
भय स्वयं को 
पूरी तरह अनावृत करने का
कविता की सतह को
छूकर
लौट जाने को उकसाता है
 
कविता पूर्णता की तलाश है
जो अनवरत है
ना जीवन से 'त्याग पत्र' दिया जा सकता है
ना 'कविता' से
क्योंकि
कविता को नकारना 
अपने आप को नकारना है
 
तो क्या मैं ही कविता हूँ
जिसे 
लिख रहा है कोई
मुझमें बैठ कर
हर दिन
हर पल
 
तो क्या
अनंत की लिखाई
पढने, समझने और गुनगुनाने का नाम ही
कविता है?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ सितम्बर २०१०

Monday, September 20, 2010

आस-पास


चेहरा पोत कर
खाली रंगमंच में
अकेले
बीती हुई कामनाओं का
अभिनय करते हुए
गहराता है अहसास
कि
जो कुछ पुराना था
वो अब 
नया होकर
बना हुआ है आस-पास
 
 
हम जिस जिस तरह से
संदर्भो को अपनाते हैं
उसी के अनुसार
नए, पुराने
और पुराने, नए हो जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० सितम्बर २०१०

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...