Saturday, November 28, 2009

कृतज्ञता पुष्प


इतना सारा आनंद
इतनी सारी प्रसन्नता
धूप की अनुपस्थिति में भी
आतंरिक उष्मा की गुनगुनाहट

खोल कर देह का द्वार
दूर तक
अपना विस्तार देखता, महसूसता
एक निर्बाध मुक्ति के स्वर में लीन
आज फिर
भेजता हूँ कृतज्ञता पुष्प
तुम्हारे नाम
ओ सृष्टा
मुझे बनाने, अपनाने
और अपने रूप का परिचय देकर
मेरी 'मैं' की कैद से मुझे छुड़ाने वाले

तुम्ही कहो
इस मुक्ति की अनुभूति के क्षण को
सहेजने की चाहत में
छुपा है जो
इसे खो देने का डर
इससे कैसे छुडाओगे मुझे?

Friday, November 27, 2009

ऊँचे शिखर से


आज सुबह कविता के औचित्य पर
प्रश्न लगा कर
बैठ गया में

निकलते रहे 'ट्रक'
उड़ते रहे 'हवाईजहाज'
छुपाते रहे स्वयं को सजे धजे लोग

पाने की आप धापी में
एक पल को
जब
खो बैठे सारे लोग अपना आप

ऊँचे शिखर से
सार का सुनहरा झंडा फहराती
कविता झिलमिलाई
दूर से ही ना जाने कैसे
मेरे कान में फुसफुसाई

"मैं सबको जोड़ने वाला
सृजनशील, समन्वित सूत्र हूँ
मैं अर्थपूर्ण रस की धारा
मेरे औचित्य पर प्रश्न लगा कर
तुम नहीं छू सकोगे


अशोक व्यास
सुबह ५ बज कर ४ मिनट
शुक्रवार, नवम्बर २७, ०९
न्यू योर्क, अमेरिका
गंगा की धारा."

Thursday, November 26, 2009

एक आकारहीन अस्तित्त्व


शब्द नहीं
गंगाजल में भीगा
रुमाल है माँ का
पोंछ कर अपना माथा
तरो ताज़ा कर रहा अपना चेहरा

हो रहा तैयार
नए दिन का स्वागत करने

शब्द नहीं
मुस्कान है आसमान की
मुझ पर अपनी छाप छोडती
गुदगुदा कर
मुक्त करती मुझे
मेरी क्षुद्र चिंताओं से

शब्द नहीं
साकार रूप है सपने का
आश्वस्ति गहरी
संबल शाश्वत

झरना उत्साह का
बहता है जो भीतर मेरे
शब्द स्पर्श से

कहाँ छुप कर
प्रतीक्षा करता था
मेरे भीतर ये
शब्द के आत्मीय स्पर्श की

शब्द मिलते हैं
रात्रि के उस छोर पर
भोर को खींच खींच कर
मेरे पास लाते

सुबह की अगवानी में
मुझे साथ रखते हैं शब्द

और इस तरह
खुल जाती है
एक पटरी
जिस पर चल पार करता हूँ
दिन सारा

पार दिन के रात ही होती अगर
तो क्यों करना था पार इसे

रात और दिन के बीच
अपने अनदेखे स्थलों तक
यात्रा करता हूँ में

कई संदर्भो के रंग
सजा देते हैं
हर दिन को

जिनमें उलझ कर
फिर अपना चिर मुक्त चेहरा ढूंढता
लौट आता शब्दों के पास

शब्द धरती हैं
शब्द आकाश हैं
शब्द क्षितिज भी हैं

शब्द अपने आकार में
सहेजे रखते हैं
एक आकारहीन अस्तित्त्व

जो देता है अवकाश मुझे
इस भरोसे के साथ
कि मेरी पहुँच में है 'विस्तार अपार'

एक के बाद एक
सीढ़ी पर चढ़ना नहीं

पहाड़ पर
हर कदम
अपने लिए नयी सीढ़ी बनाता है

अनिश्चय के बीच
ना जाने कैसे
शब्द अदृश्य रूप में
हाथ पकड़ कर मेरा
मुझे एक नयी सीढ़ी गढ़ना सिखाते हैं

तो अब तक जो कुछ हुआ
वह नहीं है पर्याप्त

होने को है बहुत कुछ शेष

जगा कर यह आस्था

शब्द करते हैं आव्हान

'देखो दूर तक
देखो ऊंचाई से
देखो उड़ान भरते पक्षी की तरह

देखो क्या कुछ अवांछित उठा लाये हो तुम
साथ अपने

देखो मुक्ति धरी है तुम्हारी हथेली पर
देखो कितनी नदियाँ हैं
तुम्हारे हाथ की रेखाओं में

नदियाँ जो बह रही हैं
हाथ की रेखाओं में

गंतव्य उनका
सागर है जो

उस असीम सागर का
क्या सम्बन्ध है शब्दों से


शब्द शायद सब कुछ जानते हैं
पर मुझे थोड़ा थोड़ा बताते हैं
इस तरह मेरे लिए हर दिन
नयेपन का नया स्वाद बचाते हैं

अशोक व्यास
गुरुवार, नवम्बर २६, ०९
न्यू योर्क, अमेरिका
सुबह बज कर ४५ मिनट

Wednesday, November 25, 2009

किरणों की छम छम


यह क्या है
नृत्य करता सा भीतर
जैसे जल की सतह पर तैरता हंस,

जैसे किरणों की छम छम से
स्वच्छा अंगड़ाई ले
खिल जाए धरती,

जैसे उमड़ आए अनायास
आनंद की बरसात,
जैसे आश्वस्ति धर दे
इस छोर से उस छोर तक कोई,

जैसे बह आए
रोम-रोम से निर्मल प्रेम
और जगमगाए श्रद्धा
कि
शाश्वत है प्रवाह इस प्रेम का


अशोक व्यास
ब्लॉग पर अपलोड करने का समय
न्यू योर्क में नोव २५ सुबह बज कर ३३ मिनट

(पंक्तियाँ उतारी गयीं, कल बैंक में काउंटर तक पहुँचने की
प्रतीक्षा पंक्ति में, जब मन मुझे छोड़ कर कहीं और विचरण करने लगा
अपने आप)

आश्वासन उसके साथ का


सुबह, ताजगी, शान्ति, प्रसन्नता
साँसें
माधुर्य
प्रेम
अपनापन
सम्भावना दबाव रहित

अंतस में
उठता है
कृतज्ञता का आलाप

संशय नहीं
अकुलाहट नहीं
तैय्यारी है
स्वागत करने की

स्वागत सबका

पर खास तौर पर उसका
जिसके आने से, जिसके होने से
मैं पूरी तरह 'मैं' हो पाता हूँ

आश्वासन उसके साथ का
घुला हुआ है
सुबह की हवा मे,
सुबह के साथ आए हर क्षण में
बज रहा है संगीत उसका


कविता नहीं
अपने होने की दशा और दिशा देखता
मगन हूँ मैं
अपने होने से परे होने में

अशोक व्यास
बुधवार, नवम्बर २५, ०९
न्यू योर्क, अमेरिका
सुबह बज कर २४ मिनट

Tuesday, November 24, 2009

कैसे सम्भव हो


यहाँ तक पहुँच कर
जब जब मुड कर देखा है
सुंदर लगा है रास्ता

जैसे किसी ने अपनी गोद में उठा कर
करवा
दी हों पार
सारी की सारी चढ़ाइयाँ

फिर हर कदम बनने लगता है प्रार्थना
हर साँस सुनाने लगती है
कृतज्ञता के गीत

तुम सर्वत्र हो अगर
सर्वकालिक हो अगर
सर्वशक्तिमान हो अगर
और मुझसे अटूट सम्बन्ध भी है तुम्हारा

तो फिर
कभी कभी ऐसा क्यों लगता है
कि हो गया हूँ मैं बेसहारा

किसी किसी क्षण एकाकी हो जाता इतना
कि उस क्षण छू नहीं पाती तुम्हारी अनुभूति की धारा

और इतना असहाय भी लगता है अपना आप
की बहुमूल्य जीवन लगने लगता जैसे कोई श्राप

कैसे सम्भव हो
तुम्हारा सतत जाग्रत साहचर्य

कैसे बने हर साँस
नित्य तुम्हारा गुणगान

कैसे दिखाई दे हर मानव मे
तुम्हारी छवि

कैसे हर घटना मे महसूस कर पाऊँ
कृपा तुम्हारी

एक बार यह बात बता देना
गिरिधारी
जय श्री कृष्ण

अशोक व्यास
नवम्बर २४, ०९
नुयोर्क, अमेरिका
सुबह बज कर ११ मिनट

Monday, November 23, 2009

ना जाने क्यों


अनिश्चय के बीच
समय को आकार दे
स्पष्टता की सीढियां बनाने
अब तक
तुम्हारी ओर देखता हूँ

माँ जब जब
बच्चे को आसमान में
उछालती है
सजग रहती है
अपनी बाँहों में
थाम लेने

ना जाने क्यों
लगता है
तुम हो सजग
मेरे पथ का मेरे पहुंचने से पहले
निर्माण करती हुई

अब धीरे धीरे
पहले से अधिक
दृढ़ हो रही है मान्यता कि

मैं नहीं, तुम ही तुम
करती हो सब कुछ
मेरे लिए, मेरे द्वारा भी

ओर इस बोध कि निश्चिंत छाया में
देख कर
कृतज्ञता से
तुम्हारे व्योम से रूप को

भेजता हूँ
सारे जगत को
प्रेम के साथ
कल्याण की प्रार्थना
ताज़ी ताज़ी इस क्षण


अशोक व्यास
सोमवार, नवम्बर २३, ०९ सुबह ६ बज कर ५८ मिनट
नुयोर्क, अमेरिका



Sunday, November 22, 2009

नित्य नूतनता क़ी प्यास




इस बार दूर से साथ चलती रही है कविता
ये जताते हुए
कि किसी के प्यार से बतियाने पर
बहुत ज्यादा न झुकना

किसी क़ी नाराज़गी पर बहुत ज्यादा
न अकड़ना

अगर बहुत अधिक झुके तो मिट जाओगे
अगर बहुत अधिक अकड़े तो टूट जाओगे

झुकने और अकड़ने में
संतुलन सिखाती कविता के चेहरे पर
सौंदर्य रस का आभाव देख कर
मेरी आँखों में उभरे सवाल पर
कविता ने कहा
"फ्रीज़ में रखे विचारों क़ी तरह
जब तुम मुझे रचने से पहले रचा चुके होते हो
मुझे अभाव लगता है
ताज़ा ताज़ा रचनात्मकता क़ी महक का

देखो
मैं चाहती हूँ उस सत्य क़ी तलाश पर निकलना
जो प्रकट नहीं हुआ अब तक
और अगर हो गया तो उस तरह नहीं
जैसे मेरे रूप में
अवतरित होने को सहमत हो जाता है वह

मुझमें नित्य नूतनता क़ी प्यास है
शायद इसीलिए विधाता मेरे इतने पास है
जब जब वो कुछ बताना चाहता है
मेरा रूप लेकर आता है
पर उसे अपना रूप देने के लिए
मुझे भी तो खुला होना चाहिए

सुनो, तुम मुझे अपने छोटे छोटे
सन्दर्भों में घसीट कर
अनंत के साहचर्य से वंचित कर देते हो ना कई बार
वह भी ठीक है
क्योंकि अपने संदर्भो से मुक्त होकर ही
तुम शुद्ध रूप में
कर सकते हो मेरी सहभागिता
उसका स्वागत करने में
जो शाश्वत सृष्टा है

भूल ना जाना
मैं और तुम
उस एक के संकेत बटोरने के लिए
साथ साथ आए थे
जो 'एक' है
और 'अनेक' होते हुए भी
'एक' रहता है
हम सुनना चाहते हैं
वो हमसे क्या कहता है

उसे सुनने
और सुने हुए को सहेजने के लिए ही
है यह मैत्री हमारी

चाहे झुको
चाहे अकड़ो
स्मरण रहे
दोनों अवस्थाओं मैं
शक्ति 'एक' उसी क़ी है
जो सम्भव करती है
दोनों क्रियाएं'


अशोक व्यास
रविवार, नवम्बर २२, ०९
सुबह ७ बज कर ९ मिनट
नुयोर्क, अमेरिका



Saturday, November 21, 2009

बोध अनंत का


अनुबंध जो होता है
अपने साथ
उसको लेकर
बन सकता है
पुल समुन्दर पर

उसके आधार पर
खड़ा हो सकता है महल जीवन का

आत्म-अनुबंध की जड़ों में
सींचा जाता है जब
समर्पण नदी का जल

उर्वरा भूमि मन की
करती है याद
सत्य समर्पित ऋषियों की साधना

घुल जाता है
बोध अनंत का पवन में

विराट की अंगड़ाई से
टूट जाता हर संशय

मौन
आनंद
आस्था
अतुलित प्रेम
मंगल कामनाएं

सम्भव हो जाता
दूर दूर तक देख पाना
वहाँ से परे भी
जहाँ
पहले यूँ लगता था
कि ख़त्म हो रहे हैं रास्ते

अशोक व्यास
शुक्रवार, नवम्बर २०, ०९
न्यू योर्क, सुबह ३:५८ पर
अमेरिका

Friday, November 20, 2009

इस भँवर के पार




तत्पर हूँ
दिन का स्वागत करने मन से
पर तन में अब भी
भरा है प्रमाद



टप-टप, टप-टप
गूँज रहा है
बूंदों का संगीत

बरसती रही है बरखा
देर रात से



हथेली में
संभावनाओं का सूरज है
या बुलबुला कोई

पता लगाने
समय की देहरी पर
लेकर जाना है
अपने आप को


वह जिसे पूर्णता मानते हैं हम
क्या वह भी एक छलावा है?

यदि सत्य है तो
क्यों फिसल जाता है
परिपूर्ण होने का बोध

जीवन क्या सहेजने का नाम है
सत्य को सहेजो
पूर्णता को सहेजो
प्यार को सहेजो
सपनो को सहेजो

सारे अनुभवों में सार को सहेजने के लिए
रात दिन चिंतन करने वाला
क्या सहेज कर रख पाता है
अपनी सहजता?


क्या मैं
पूर्ण नहीं हूँ
अपनी सहज अवस्था में

या धीरे धीरे
कुछ न कुछ यत्न- प्रयत्न करते करते
मैं भूल ही गया हूँ
सहज होने का अर्थ



सहज सामिप्य
धीरे धीरे
छूट जाता है कहीं

किसी के भी समीप रहने के लिए
हमें
वह होना होता है
जो हम नहीं हैं

सामिप्य यानि
अपेक्षाओं के तंतु
अपेक्षा यानि कुछ बुनावट, कुछ बनावट

अपेक्षाओं की ताल से
अपने होने की ताल मिलाते मिलाते
हम जो होते हैं
क्या वह सत्य है?


कहीं ऐसा तो नहीं कि
होने की उधेड़बुन में
हम परे चले आते हैं
सत्य से

और फिर ढूंढते हैं
कैसे फिर से वह हो जाएँ
जो तब थे
जब कुछ भी ना हुए थे



लगता है मेरी उलझन पर
हँसता है
कोई एक चिर मुक्त,
उसकी हँसी में अपनी हँसी मिला कर
सहज ही
निकल आता हूँ
इस भँवर के पार
जिसमें नदी नहीं
गोल गोल चक्कर ही
साथी होते हूँ
मेरी अनुभव यात्रा के


अशोक व्यास
शुक्रवार, नवम्बर १९, ०९
नुयोर्क, अमेरिका
सुबह पाँच बज कर ३० मिनट

Thursday, November 19, 2009

कहा सब कुछ अपने आप से




झुंझला कर कह देना था
सूरज को
ये क्या अभी तो चढ़े हुए थे
अब ढलने लगे
इतनी प्रखर थी धूप जो
कहाँ भेज दिया उसे
और क्यों दे दी अनुमति बादलों को
की ढक लें तुम्हें

उकता कर कह देना था
हवा को
अभी कुछ देर पहले तो
साथ लाई थीं
महक मनमोहन वाली
और अब उठा लाई हो
दम तोड़ती कामनाओं का विलाप

आँख मिला कर कह देना था
समय को
देखो ऐसे नहीं चलेगा
की जब चाहो बहलाओ
जब चाहो नचाओ
जब चाहो बिठा कर
शिखर पर गुदगुदाओ
और फिर पलटो इस तरह
की अपरिचित बन जाओ

पर ना समय को, ना हवा को, ना सूरज को
किसी से कुछ नहीं कहा

कहा सब कुछ अपने आप से

और अपनी कहा-सुनी लेकर
प्रविष्ट जब परम मौन में हुआ

सब कुछ मधुर, समन्वित और सुंदर हुआ

ना झुंझलाहट, ना उकताहट, ना शिकायत
बस एक निश्छल प्रेम नदी की कलकल का स्वर रहा

कान्ति करुणा की घोल कर मेरे अस्तित्त्व में
मुस्कुराता रहा विराट


अशोक व्यास
नवम्बर १८, ०९
न्यू योर्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ४० मिनट

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...