Sunday, October 20, 2013

अनंत का अभिनन्दन है


१ 
बस इतना ही हुआ उसे देख कर 
भूल गया और कुछ देखना 

२ 

उसने पूछा जब मेरा नाम 
तब 
याद ही न आया 
अपना नाम और पता 

पता नहीं 
क्या समझ होगा 
मेरे बारे में उसने 

३ 


एक एक पल 
स्वप्निल सा 
और चांदनी से नहाई 
पगडंडी पर 
जैसे 
इठला कर 
छेड़ दिया 
राग नव जीवन का 
उसके साथ ने 

४ 

इस बार 
बस ये सोच कर चला था 
उसके साथ 
की 
सोचना नहीं 
होना भर है 
सूक्ष्म सतह पर 
शुद्ध स्वरुप में 
बिछ जाना है ऐसे 
की 
मेरे होने के 
रेशे रेशे में 
सम्माहित हो जाए उसका होना 


५ 

इस बार 
पलट कर लौटना नहीं 
इस घर में 
जहाँ बंधन है 
जहाँ क्रंदन है 

इस बार 
उसके साथ चल कर 
बस जाना है वहां 
जहाँ नित्य 
अनंत का अभिनन्दन है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२० अक्टूबर २०१३ 

Sunday, October 13, 2013

पूर्णता से हाथ मिला कर


1
लिख लिख कर मिटाया
दिन खाली ही बिताया

पूर्णता से हाथ मिला कर
अपूर्णता से बच न पाया

जाने कहाँ खोया रास्ता
मैंने जब कदम बढ़ाया

लापता है कहीं मंजिल मेरी
बात कहते हुए मैं घबराया

     २

दिन कटोरे सा हाथ में मेरे
फिर से मैया के द्वार पर आया

तू अगर सत्य नहीं है माँ तो
मेरा होना भी है छल की छाया 

तेरी गोदी की ललक लेकर ही 
सांस में सार रस उतर पाया

मुझको नहला - धुला मेरी माता
खेल सब छोड़ के मैं घर आया

बड़ा मूर्ख हूँ, कुछ नहीं जानूं
इतना जानूं हूँ, तू ने अपनाया

     अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अक्टूबर २०१३

Saturday, October 12, 2013

मुक्ति के नए चरण




यह 
जो मुक्ति के नए चरण हैं
इतने शांत, इतने शुद्ध, सौम्य

यहाँ
न कोइ पुराना स्वर
न बीते दिनों के पदचाप

सब कुछ
असीम उजियारे में धुला हुआ

मौन में घुली हुई
तन्मयता की चांदनी

अब जब चल दिया हूँ
युधिष्ठिर की तरह
पिघल कर मिट जाने तो प्रस्तुत हूँ
इस पथ पर
जहां
मिट जाना
अमिट हो जाना है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
अक्टूबर ११, २०१३


Tuesday, September 17, 2013

उसकी खातिर ये सांस का मेला

 
लौटते हुए अपने घर से 
इस बार 
जब उसने देखा 
बाहें फैला कर बुलाता हुआ आसमान 
 
उसे लगा 
खुल गयी सब गांठें 
एक नन्हे से क्षण में 
सहसा, सब कुछ हो गया आसान 

२ 

दूर तक 
एक उसका साया है 
जिसने अपना 
हमें बनाया है 
उसकी खातिर ये 
सांस का मेला 
वो भी साँसों के 
साथ आया है 
 
३ 
तेरे नाम के गीतों से सब काम चलाया करता हूँ 
तेरे दर ले कर आते रास्तों पे जाया करता हूँ

मैं खोया खोया होता हूँ बहकी बहकी बातों में 
पर तेरी पहचान लिए मंजिल तक आया करता हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१७ सितम्बर २०१३



 
 

Friday, September 13, 2013

....पर प्यार है तुमसे

 
 
इस बार 
कोइ रचनात्मकता की बरखा नहीं 
न ही 
अपने सत्यान्वेषी होने का भ्रम 
इस बार 
उसे नहीं करना था 
किसी सुन्दर गलियारे में प्रवेश कर 
अनदेखे को देखने का श्रम 

इस बार 
उसने कविता को सिर्फ समय बिताने के लिए बुलाया 
और अपना मंतव्य भी 
कविता को साफ़ साफ़ शब्दों में बताया 

इस बार 
न वो मुस्कुराया, न उसने कोइ संकल्प गीत गाया 
और कुछ हो न हो 
पर प्यार  है तुमसे, कविता के साथ बैठ, ज़िन्दगी को ये बताया 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१३ सितम्बर २०१३

Saturday, August 24, 2013

वैभव शुद्ध आनंद का


अब यह जो
अदृश्य झरना सा 
बहता है 
शांत, स्निग्ध, सौन्दर्य का भाव सुनाता 
यह 
स्त्रोत आनंद का 
है तो गतिमान 
फिर भी 
इसके ठहर जाने की चाह को 
जब देखता हूँ 
लगता है
शरारती बच्ची सा 
चेहरा कामना का 
हंस कर 
मुट्ठी भर हवा से 
भर देता उसकी झोली 

२ 

यह जो है 
समागम सा 
पूर्णता का पूर्णता में 
यहाँ कौन गाने वाला 
कौन नर्तक 
किसके हाथ बजे है मृदंग 

अभेद में भेद का 
यह स्वांग 
आवश्यक है 
उत्सव उत्पन्न करने 

वह जिसने 
बनाया 
जीवन उत्सव 
क्या वह जानता था 
एक दिन 
गायक, नर्तक और वादक 
अलग अलग दिशाओं पर 
अपना आधिपत्य मान कर 
समन्वय को ही 
एक दुर्लभ समीकरण बना देंगे 
पृथ्वी पर 

३ 

अभी कुछ और दूर 
चल सकता हूँ 
हवाओं के गीत सुनता 
अभी सुन सकता हूँ 
कुछ और कहानियां क्षितिज से 
अभी 
नहीं हुआ शेष 
यह 
निथर कर मक्खन का 
सतह पर आना 

वह 
जिसने मथनी चला कर 
उजागर किया है 
मक्खन मेरे भीतर 
उसे ही सौंपना है 
यह 
वैभव शुद्ध आनंद का 

अशोक व्यास 
२४ अगस्त २०१३

Thursday, August 22, 2013

असीम संवेदना का अनहत नाद


अचानक 
एक कुछ सरक जाता है 
छुप देता है 
कुछ करने, बनने, रचने, जताने की चाह 
 
एक शिथिलता 
एक ठहराव 
स्पंदन अनंत के 
यह धीमे धीमे 
उमगा देते हैं 
राग एक महीन, मंथर, अचीन्हा 
 
अपने आप में गुम 
कई शताब्दियों का गुलकंद चखता 
अधमुंदी आँखों से देखता 
बाल आदित्य की लालिमा 

तृप्त हूँ 
छूकर इस क्षण को 
जिसमें सम्माहित हैं तीनो काल 

यहाँ क्यूं कर पुकारूं 
उसे 
जो सरक गया है 
जिसके साथ चली गयी है 
कामनाओं की धमकती ताल 
 
मैं 
हंसता-खिलखिलाता 
पूर्ण निष्काम 
अनुपस्थित उपस्थित सर्वत्र 
 
विरोधाभासों का सरस सेतु 
सुनता-सुनाता 
असीम संवेदना का अनहत नाद 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२२ अगस्त २०१३
 
 
 

Monday, August 19, 2013

विस्तार की टोह लेता



१ 
एक ये पल 
जब फूटता है प्रकाश 
विस्तार की टोह लेता 
भागता हुआ 
छू छू कर 
सब कुछ स्वच्छ कर देने की आतुरता लिए 
यहाँ वहां 
कर देता हूँ उजियारा 
न जाने कैसे 
कर्म और गति के साथ भी 
शांति और समन्वय से 
मेल बनाए रखती 
अद्भुत 
सृजनात्मक धारा 
२ 
एक इस पल में 
बनने बनाने के सपने भी 
पोषित करते हैं 
मेरी पूर्णता 
हर आगत के स्वागत में 
तत्पर हूँ जैसे 
प्रसन्नता की किरणों से परिपूर्ण 
३ 
अभी इस पल में 
जब 
शब्दों के साथ 
ले रहा अपना मानस चित्र 
तुम भी आस पास हो मेरे 
यह कह देना 
हँसते हँसते 
कितना सहज हो गया है 
जैसे 
एक इस पल में 
पूरी सृष्टि के साथ 
 अपने सम्बन्ध का उत्सव 
मना रहा हूँ मैं 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१९ अगस्त २०१३

Thursday, August 15, 2013

अपनी दौलत आज लुटाऊँ


शब्द दीप से 
पथ उजियारा 
करती उसकी 
करूणा धारा 
उसके गोद 
बनी है संबल 
जब जब मैं 
जीवन से हारा 
२ 
कभी रहे जो 
आँख का तारा 
उससे भी 
ना मिले सहारा
काल प्रवाह 
बदल देता है 
संबंधों को 
कितना सारा 

३ 

बात बात में 
सच आ जाए 
रेत बना एक घर 
ढह जाए 
अपनेपन का खेल 
गज़ब है 
खेल खेल में 
खेल छुडाये 
४ 
अब कैसे पहचान बताऊँ 
मैं जिसका नित ध्यान लगाऊँ 
उसका कहना है, चुप होकर 
कहने सुनने से टर जाऊं 

५ 

अपनी दौलत आज लुटाऊँ 
सब तज कर खाली हो जाऊं 
स्नान करूँ गंगा मैय्या में 
अपने कालजयी घर जाऊं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
८ अगस्त २०१३ 

बस तुकबंदी का खेल


१ 
और कुछ नहीं, बस तुकबंदी का खेल 
शायद खेल खेल में हो ही जाए मेल 

इधर उधर भागते ख्यालों को आखिर 
पटरी पर ले आये शब्दों की रेल 


२ 

अदृश्य हो गयी सपनो की रेल 
चुकने लगा है दिए का तेल 
विलीन अज्ञात लोक में लौ 
करके तेज़ हवाओं से मेल 

३ 

अब ये कौन सा तल है 
जहाँ सब कुछ निर्मल है 
सबके पार देख लेता मन 
शुद्ध, सौम्य और शीतल है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१४ - १५ अगस्त २०१३
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जो बीत रहा है

 
 

एक दिन के बाद 
फिर एक और दिन 
दिन दिन 
यह कुछ, जो बीत रहा है 
यह मैं हूँ 
यह समय है 
या 
यही जीवन है ?

२ 

एक परत 
दूसरी परत 
दूसरी के बाद तीसरी परत 
परत दर परत 
अनावरण हो रहा है 
संबंधों के द्वारा 
जिस नूतनता का 
क्या ये तुम हो 
क्या ये मैं हूँ 
या 
ये लुप्त हो जाना है 
उस असत्य का 
जिसे हम 
अपने होने का सत्य मान कर 
खेलते रहे हैं 
खेल जीवन का 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१५ अगस्त २ ० १ ३

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...