Sunday, June 9, 2013

यह एकांत

(चित्र- डॉ विवेक भरद्वाज, जोधपुर )

यह एकांत 
अपना सा 
घेर कर मुझे 
चलता है साथ साथ 
सुनते हुए 
मेरी 
हर कही-अनकही बात 

इस एकांत में 
इतना प्यार 
कहाँ से आता है 
ये प्यार मुझे 
किसका पता 
बताता है 

इतनी भीड़ में 
कौन इस एकांत के
कोमल अस्त्तित्त्व को 
बचाता है 


इस नितांत अपने से वृत्त में 
धीरे धीरे 
सारा संसार उतर आता है 
कैसा है ये स्थल 
जहाँ 
न कोइ आता है, न कोइ जाता है 
पर 
संसार का व्यापार 
चलता चला जाता है 


इस एकांत में शरण लेकर 
इतना निश्चल , इतना शांत 
क्या मिल गया है मुझे
शाश्वत का प्रांत 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क अमेरिका 
9 जून  2013

Saturday, June 8, 2013

शुद्ध प्रेम की किरने


गुफा में जाना 
जाकर देर तक बैठना 
अँधेरे में 
अपने आप 
आलोक संचरण का अनुभव 

और 

फिर 
मौन में उभर आता 
सबसे मधुर संगीत 
समन्वित धडकनों के साथ 

असीम स्पर्श से झरती 
मुस्कराहट लिए 

जब 
वह 
उठता 
गुफा से बाहर आने 
कई बार 
यूं हुआ 
की मिट गया गुफा और बाहरी जगत के बीच का भेद 

चलना उड़ने जैसा 
और 
उसे केंद्र बना कर 
वह जो 
बिखरती थीं 
शुद्ध प्रेम की किरने चहुओर 
कौन बनाता और फैलाता था 

वह अद्वितीय आनंद 

मनन करते करते 
सहज ही 
लगता उसे 
जैसे 
वह फिर से 
जा बैठा है 
गुफा में 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २ ० १ ३

Friday, June 7, 2013

प्यार की यह लहर


यह जो है 
एक शून्य सा 
 
मंथर गति से
 चलती हुई 
जीवन की लकीर से झनझनाता

इस शून्य में ढूढता हूँ
 
 अपना वह चेहरा
 
 जो शेष रहता है 
पार हर परिवर्तन के 
 
और ढूंढते ढूंढते अनायास ही 
जब छूट जाती है 
ढूँढने की जरूरत 
 
मिल जाता है 
यह एक कुछ 
मिलने और न मिलने से परे का 

इसके साथ 
उतर  जाता हूँ 
ऐसी नींद में
 जिसके भीतर जाग्रति है 
 
और इस जाग्रति में 
ऐसा यह क्या कि 
भेद नहीं रहता 
मुझमें और सूरज में 
 
ऐसा यह क्या की 
मैं अपने आप से 
प्रकट होते 
अनाम उजियारे में 
भीगता 
पुष्ट होता हूँ 
 
भरा हुआ 
अपने अकाट्य होने के बोध से 
छलछलाता हूँ 
प्यार से 
 
और लगता है 
प्यार की यह लहर 
जगत के इस छोर से 
उस छोर तक जायेगी 
 
सबके पास 
अक्षय प्रसन्नता का उपहार पहुंचाएगी 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २ ० १ ३

खंडित होने का स्वांग रचाते


कितना विचित्र है 
इस तरह होना 
अपने आप में पूर्ण 
और 
अपूर्णता से व्यवहार करना 

वह स्थल 
जहाँ से जाग्रत है 
बोध पूर्णता का 
अदृश्य ही नहीं अमान्य भी है 
इस समाज में 
जिसकी मान्यताओं को ओढ़ कर 
अपने को कहीं न कहीं छुपाये हुए 
खंडित होने का स्वांग रचाते 

एक दिन 
लौट कर 
छोड़ देते है
उस विचित्रता को 
जिसमें प्रश्न चिन्ह थे अपनी पूर्णता पर 

और 
सहज ही 
अपनी पूर्णता में रमे 
हम औरों द्वारा हम पर लादी पहचान से मुक्त 
तन्मय हो रहते हैं 
अपनी उस पहचान में 
जो कभी बदलती नहीं है 
पर नित्य नई है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २० १ ३

Thursday, June 6, 2013

मुक्ति रचने के लिए


क्यों 
किसके लिए 
कब तक 
सवाल इस तरह की रंगत वाले 
सारे के सारे 
छोड़ कर तो आया था 
उसकी देहरी पर 
पर मिल जाते हैं 
अब भी 
मेरी सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह बन कर 
उभर आते सवाल 
 
और फिर 
उन सबको 
स्मरण करवाता 
उनका सही स्थान 
 
वह मूल 
जहां से सुलभ है 
उनका अभीष्ठ 
 
इस तरह 
पग पग 
मुक्ति रचने के लिए भी 
करना तो होता है 
स्मरण तुम्हारा 
ओ अविनाशी 

तो क्या 
सत्यनिष्ठ जीवन का अर्थ बस 
सजग, सतत स्मरण है तुम्हारा 
जिसमें से झरती है 
गतिमान मुक्ति की सुन्दर धारा 
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
६ जून २ ० १ ३ 
गुरूवार 

Wednesday, June 5, 2013

बस देखना भर है


 १ 
अब यह भी नहीं 
की 
उसके चले जाने से पहले 
यह कह लूं 
वह कर दूं 
अब यह भी नहीं 
की 
सोच लूं, जाने को जा सकता हूँ 
मैं ही 
उसके जाने के पहले 

२ 

अब 
सोच कर करने की उमंग नहीं है 
अब 
बस देखना भर है 
वह 
जो 
हो जाता हैं मेरे द्वारा 
मेरे न होने की सूरत में 

३ 

इस तरह भी हुआ जाता है 
न होकर 
 
और यूं होना
 ना जाने कैसे 
ले आता है
 उस पूर्णता का रस 
जिसका 
पता भी न था 
हो- होकर होते जाने के अधीर प्रयासों में 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
५ जून २ ० १ ३

Monday, June 3, 2013

फूलों की नई नई घाटियाँ



शब्दों का हाथ थाम 
उतर कर  शिखर से 
आँख मूँद कर 
कुछ देर
अब 
 देखता हूँ 
फूलों की नई नई घाटियाँ 
जहाँ तक ले आये हैं शब्द 

२ 

आविष्कार अपने भीतर 
करना है जिसका 
वह मैं हूँ 
या तुम 
या वह एक 
जिसमें घुल मिलकर 
मैं और तुम 
जब 
अपना अपना परिचय छोड़ कर 
सम्माहित होते 
उस एक मैं 
उम्र आता है 
सारी सृष्टि का सौंदर्य 
और 
पसर जाता है 
 आदि-अंत रहित मौन सा 
 
३ 
 
इस बार भी 
छेड़ कर शाखा शाश्वत वृक्ष की 
भीग लिया हूँ 
करुनामय स्पर्श में 
 
अपने अंतस में 
यह नूतनता की नमी जो है 
इसमें 
खिल रहे  हैं
कृतज्ञता पुष्प 
 
इन्हें तुम्हारी चरणों तक पहुंचाने 
आव्हान कर रहा तुम्हारा 
यह जानते हुए भी की 
हर पुष्प के खिलने में भी 
अनुस्यूत है 
उपस्थिति तुम्हारी 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३ जून २० १ ३

Friday, May 31, 2013

यह क्षण इतना निश्छल

 
यह क्षण 
इतना निश्छल 
जैसे ओस की बूँद 
गुलाब के फूल की पत्ती पर 
तिरती हो जैसे 
सुन्दरता गीली 

इस क्षण 
खोलने अनंत का द्वार 
बढ़ा कर हाथ
 
विस्मित होता हूँ 
विलीन हो चला है 
भेद भीत और किवाड़ का 
 
इस क्षण 
लिखते हुए 
अपनी विरासत 
सत्य है 
यह अधिकार 
पूरी सृष्टि 
किसी के नाम लिख देने का जब 
 
इतना स्पष्ट है 
अपने अनवरत होने का बोध 
और यह भाव भी
की पूर्ण समृद्धि के भाव में 
न कोइ किसी को कुछ दे पाता है 
न कोइ किसी से कुछ ले पाता है

इस क्षण 
लेन- देन से परे 
मगन अपने आप में 
देख रहा हूँ 
मेरे रोम रोम से 
शांत रश्मियों का फूटना 

इस एक क्षण में 
सम्माहित 
चिर काल का जीवन 
जैसे 
यशोदा मैय्या को 
दिखाई दे गया 
ब्रह्माण्ड 
नन्हे कन्हैय्या के मुख में 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३१   मई २ ० १ ३
 
 

Thursday, May 30, 2013

यूं तो आसान है जीवन


१ 

यूं तो आसान है जीवन 
बस इतना ही तो है 
एक सांस के बाद दूसरी 
दूसरी के बाद तीसरी 
और 
कोइ पाबंदी नहीं की 
हर बार गिनते रहें की 
कितनी साँसे ले चुके हैं अब तक 

सांस लो 
और भूल जाओ 
की सांस ली थी 

और 
नहीं है यह बाध्यता भी की 
रहे याद 
अब लेनी है सांस 

व्यवस्था है जीवन की 
अपने आप आती है 
जाती है सांस 

२ 

यूं तो आसान है जीवन 
पर वैसे 
सांसों का आना जाना ही नहीं है जीवन 

जीवन वह है 
जो 
इस आने जाने के बीच 
बचाता है 
हमारा होना 
अर्थवान करता है हमें 
इस गति पर संतुलित होते 
अनुभवों का इन्द्रधनुष 
३ 
कभी किसी से जुड़ कर 
कभी कहीं से मुड कर 
अर्थपूर्ण होता है जीवन 
ऐसे 
की 
अदृश्य हो जाती रिक्तता ,
पूर्णता का 
नित्य नूतन आलोक
 छू कर साँसों को 
तन्मय कर देता 
अनंत वैभव में 
और 
तब 
जब न कुछ मुश्किल 
न कुछ आसान 
खोने पाने से परे का यह स्थान 
इसकी पहचान 
न शब्दों में 
न चित्र में 

इसका होना 
बस धडकनों में ही 
प्रमाणित हो पाता है 
पर अपनी धडकनें सुनने जितना मौन 
जब हमें मिल नहीं पाता है 
ये इतना आसान सा जीवन 
कितना मुश्किल हो जाता है 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३० मई २ ० १ ३

Wednesday, May 29, 2013

विराट का उल्लास


अपने हाथ बाँध कर 
देखता हूँ 
बंधता नहीं 
मेरा खुलापन 

मुक्त पवन 
सांसों में 
गाती है 
विराट का उल्लास 

बंधन वहां है 
जहां अपूर्णता है 

सुन कर तुमसे 
अपनी पूर्णता का गान 
अब 
रमा हुआ आपने आप में 

देखता हूँ 
है इतना अवकाश मुझमें 
की सहेज लूं 
एक दो नहीं 
अनंत सम्बन्ध सेतु 
 
यह अक्षय प्रीत का गौरव 
खिला है 
मेरे भीतर 
तुम्हारे अनुगृह से 
इस  तरह की 
अनायास ही
समझ में आने लगा है 
अर्थ वसुधैव कुटुम्बकम का 
 
 
अशोक  व्यास 
न्यूयार्क अमेरिका 
२९ मई २० १ ३
 
 

Friday, May 3, 2013

सत्य तो तुम ही हो




१ 
अब कविताओं का मौसम बीत गया 
हँसते हँसते कह गया वह 
पेड़ पर नंगी शाखाओं की तरफ देखता 
सूखे पत्तों के ढेर पर उचटती नज़र डालता 
अपनी स्मृतियों में 
ठहरे हुए सुख-संतोष की चमक को सहलाता 
इस पल 
उतरते 
स्वर्णिम मौन में 
भीग कर 
विराट से 
कह उठा 
मन ही मन 
इतने सारे खेल दिखा कर 
जताया तो यही 
की सत्य तो तुम ही हो 
फिर ओ केशव 
क्या आवश्यकता थी 
इस सारे ताम-झाम की 

२ 

चलते चलते 
सोचता रहा 
वह 
उसकी सिखाने की सूक्ष्म कला के बारे में 
जितना जितना बुद्धू बना 
पिछड़ता रहा 
सीख अपनाने में 
उतने धैर्य से 
नए नए रूपक दिखला कर 
सिखलाने का रसमय प्रयास करता रहा है वह 
और अब 
हंस पडा इस बात पर 
की 
सीखे हुए को 
ठहराए रखने की कला 
अब तक सीख कहाँ पाया है वह 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
३ मई २ ० १ ३  

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...