Friday, June 10, 2011

सम्भावना का खेल


होता है न
बच्चा कभी
ऐसी मनःस्थिति में
की फेंक देता है
हर खिलौना
न ये, न वो
सुहाता नहीं उसे
कोइ भी खेल
 
ऐसे अनमने बच्चे सा
गैस का गुब्बारा 
रुकती-  भागती हवा
ठुमकते - ठुमकते
लचकचाता धागा
 
दोस्त
आज फिर
सोच रहा हूँ
सीमा छोड़ देह की
अपना लूं विस्तार
मिल जाऊं कण कण में
 
नकारते हुए
हर सम्भावना का खेल
निर्वात के
आधे क्षण में
सोच रहा 
कैसे शांत हो
मन का कोलाहल
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
(आज नहीं न जाने कब लिखी थी ये कविता, आज आपके पास पहुँचने का अवसर पा रही है )              

Thursday, June 9, 2011

नित्य नूतन की लय


नया और कुछ हो न हो
मैं ही होता हूँ नया
क्षण क्षण
नित्य नूतन के साथ
नए नए ढंग से जुड़ते हुए
कभी उल्लसित
कभी चिंतित 
कभी शांत 
कभी व्यग्र
कभी अपने निरंतर विस्तार की अनुभूति से आल्हादित
कभी अपने क्षुद्रता के बोध से नियंत्रित 

नया और कुछ हो न हो
मैं तो होता ही हूँ नया
हर क्षण
और नूतनता को आत्मसात करने की
मेरी लय
जब
नित्य नूतन की लय से मेल खाती है
अपने संभावित विस्तार की पराकाष्ठा का दर्शन कर
एक क्षण
अहोभाव में तिरता
 अव्यक्त आनंद के ज्वार में लीन
गति और स्थिरता का भेद भूल कर
एकमेक सा हो जाता हूँ
उसके साथ
जो पूर्ण होकर भी निरंतर नित्य नूतन है    


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ९ जून २०११          

Wednesday, June 8, 2011

मौन में अनायास


धूप का हाथ पकड़ कर
बादलों से
बाय-बाय कहता
फूलों की घाटी में
उतरता हुआ
वह
एक क्षण
पर्वतों के विस्तार को 
देख कर
हो लिया मगन
धूप-छाँव से परे के
मौन में अनायास

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ जून २०११           

नित्य नूतन का पता




पंछियों की चहचहाहट,
ताजगी का स्पर्श लेकर बहती
मधुर पवन,
उजियारे के पुष्प का
धीमे धीमे खिलना,

अगणित रचनाएँ कण कण में
जगा कर

आदित्य प्रकट होते हैं

अपनी महिमा और गरिमा के साथ,

अलग अलग कोण से 
हमें देखते
स्वयं को दिखाते

पूर्व से पश्चिम की ओर चलते भास्कर
हमारे लिए
खोल देते हैं 
एक नया दिन,

हर सुबह 
एक नया रिश्ता बनाती है
हमारे साथ
हर दिन होती है 
कोई न कोई
नयी बात,

कितना अच्छा है
एक जैसे नहीं होते दिन
वर्ना हम देख ही ना पाते
अनंत रश्मियों का श्रृंगार करता
यह जीवन
जो 
पाने और खोने का खेल सजा कर
इससे परे के स्थल पर ले जा कर
हमारे लिए
आन्तरिक समृद्धि का सार
खोलता है

सुबह के साथ नया सम्बन्ध बनाते बनाते
हम पा लेते हैं
नित्य नूतन का पता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ जून २०११   
 



            

Tuesday, June 7, 2011

सारा संसार


सीढियां
अपने आप
आ जाती हैं
पांवों के नीचे,

चलना कर देता है 
उन्नत,

बढ़ते बढ़ते
गगन छूना 
सहज हो जाता है

मेरी मुस्कान के घेरे में
धीरे धीरे
सारा संसार
समा जाता है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, जून ७, 2011         

मिले है तेरा ही हंसता चेहरा


कुछ लिखने की चाह से भर जाता हूँ
खाली कागज़ देख के डर जाता हूँ

न जाने हो गया क्यूं कर ऐसा
शब्द के साथ ही घर जाता हूँ

तुम्हें मालूम हो ना पायेगा
हो के अदृश्य किधर जाता हूँ

उससे बनने का हुनर सीखा है
जिसकी बातों पे बिखर जाता हूँ

मिले है तेरा ही हंसता चेहरा
लहर के साथ जिधर जाता हूँ

अब तुझे ढूँढने को ऐसा है
अपने भीतर ही उतर जाता हूँ

वो ही छलता रहा है सदियों से
जिससे मैं सच की खबर पाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ अपिर्ल २०११ को लिखी 
७ जून २०११ को लोकार्पित
  

कृतज्ञता


कृतज्ञता
 सिर्फ चोटी पर ठहरे
पेड़ के पत्तों के लिए ही नहीं
धरती में प्रविष्ट जड़ के लिए भी

कृतज्ञता पूरे पेड़ के प्रति
और उसे धारण करने वाली
पूरी धरती के प्रति

कृतज्ञता हवा के प्रति
और हवा से प्राणों का अद्भुत सम्बन्ध बना कर
मुझे जीवित रखने वाले के प्रति भी

कृतज्ञता का भाव भी
प्रार्थना की तरह धो  देता है 
मन का कलुष
मिटा देता सब शिकायतें

अभिषेक के बाद
पुरोहित द्वारा
चन्दन कुमकुम लगाने के बाद
जैसे विघ्नविनाशक की हो रही हो आरती
कुछ कुछ ऐसा ही
हो जाता है मन

सुन्दर, सौम्य, शीतल
मेरे लिए मेरा विस्तार खोल कर
अपार प्यार सुलभ करवाने की कृपा करता
मेरा मन
शायद कृतज्ञता के भाव में तन्मय होकर
किसी एक क्षण
जिसकी उपस्थिति को मुखरित करने
स्वयं पूरी तरह अनुपस्थित हो जाता है

उस सर्वाधार के प्रति
कृतज्ञता सहज ही मेरे प्रति खोल देती है
मेरी पूर्णता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ७ जून २०११     

     

     

Monday, June 6, 2011

मंगल मौन में


यह जो
स्वर्ण कलश लेकर
सौभाग्य और समृद्धि उंडेलने वाली
लक्ष्मी जी हैं
इनका निवास स्थल
हमारे भीतर
उजागर करने
मौन की ताल पर
उन्नत ध्वनि की मंगल धारा
बह रही है जो सदियों से
इसके अनुनाद 
सुन नहीं पाते कोलाहल में

लो अनंत की रश्मियों से
शांत कर मन
बैठे अपने भीतर
स्वयं को पुकारें ऐसे
की स्वर लक्ष्मीजी तक भी
पहुँच जाए

स्वर्ण कलश लेकर
अमृतमय सौभाग्य और समृद्धि
उन्ड़ेलती मैय्या की छवि में
आस्था, आश्वस्ति और अक्षय आशा की
जो प्रेरक तान है
मंगल मौन में सुन कर इसे
क्यूं न धन्य हो जाएँ
अभी इस क्षण

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ जून २०११    
       

Sunday, June 5, 2011

आश्वस्त आनंद में


यह जो
उमड़ता है  भीतर
अनुनादित तुम्हारे स्वर से
झरना आनंद का
उल्लास के मेघ बरसते
पुलकित मन की धरा पर
सजता है उत्सव
कितने रूप लेकर
खेलते खिलते भी
तुम एक अकम्पित
समन्वित 
शक्ति पुंज
मंगलकारी
इस तरह अपने स्वर मात्र से
खिल सकते हो मुझमें
यानि
हर मनुज में

प्रश्न सारे लुप्त हो गए हैं जो
तुम्हारे आने पर
अब उनके फिर लौटने के बारे में
क्यूं सोचूँ

सोच से परे का
मद्धम उजाला फ़ैल रहा है
मेरे अस्तित्तव  में

साँसों में
इस तरह शाश्वत का सहज गान

 और तन्मय हुआ मैं
लीन हूँ उस स्वर में
जो उस पार से आता है
पर लगता है
इस पार भी स्वर वही है
जिससे अनुनादित हुआ
मैं झूम रहा हूँ
शुद्ध सरस आश्वस्त आनंद में

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
५ जून २०११                   

Saturday, June 4, 2011

जो है



एक स्थल ऐसा
जहाँ
पकड़ना नहीं कुछ भी
छोड़ देना
छोड़ देना, छोड़ने का भाव भी
बस हो रहना
उसका
ऐसे जैसे सागर की हो जाती है
नमक की डली
और अगर
डली हो शक्कर की
तो भी
उसे नहीं चिंता
अपने प्रभाव की
अपनी पहचान की
घुलना आता है उसे
जैसे
अपने से विस्तृत एक में
घुलना टूटना नहीं
विस्तृत हो जाना है
और
विस्तार के लिए
करना कुछ नहीं
बस छोड़ भर देना है
ऐसे
की
छूट जाए
छोड़ने का भाव भी

महत्त्व नहीं इसका
की क्या साथ लिया
क्या साथ ली था
जो है
जैसा है
सब छूट जाना है
जाने अनजाने
सोच कर जब हम
सोच से परे पहुँचते हैं
तो एक आलोकित शून्य
करता है स्वागत
और सौंप दे सकता है
उस अक्षय पूर्णता का स्वाद
जो सिर्फ वही दे सकता है
जो है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ जून २०११  
                 

Friday, June 3, 2011

आत्माभिव्यक्ति के लिए


करना प्रारंभ करने पर
हो जाता है कितना कुछ
वर्ना
बैठे बैठे
घेर लेते हैं
संभावित असफलता के कई कारण
या फिर
करने के औचित्य पर प्रश्न लगा कर
हम बैठे बैठे
निष्क्रियता का हाथ थामें
देखते रहते हैं
लहरें कर्मशील सागर की

अनसुना करते
कई लहरों का बुलावा
और
उनके साथ साथ
लौट जाते हैं
हमारे हिस्से के हीरे-मोती

सब कुछ वैसा ही हो
जैसा हम चाहते हैं
संभव ही नहीं

पर कुछ गढ़ने के प्रयास में
स्वयं को गढ़ने के लिए
सृष्टा को आमंत्रित कर
उसके सान्निध्य की सौरभ का आनंद
संभव तभी है
जब हम
आत्माभिव्यक्ति के लिए
कुछ करने का श्रीगणेश करें


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ जून २०११               

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...