Wednesday, April 20, 2011

अनंत करता है प्रतीक्षा हमारे भीतर


1
तुम मेरे लिए
इतना कुछ कर गए हो
अपने भीतर प्रवेश का द्वार दिखा कर

और
अपने भीतर 
कहाँ, क्या, कैसे देखूं
सब कुछ संकेतों में
रख छोड़ा है
विरासत के रूप में 
मेरे लिए

बिना तुम्हारे
वंचित रहता 
इस विस्तार से
जो है सभी के लिए
सभी के भीतर
पर
समझ बढ़ने के साथ 
हम परे धकेलते जाते हैं
अपने भीतर प्रवेश द्वारा का परिचय

तुमने 
मुझसे मेरी दूरी मिटाने के लिए
कितना धैर्य रखा 
और मुझे मेरी गलतियों से सीखने के लिए
देते रही पूरी पूरी स्वतंत्रता

शायद ये जानते हो तुम
बहुत अच्छी तरह
की 
जो कल्याणकारी है
वह थोपता नहीं स्वयं को
किसी पर

आलिंगन मुक्ति का करें
या बंधन का स्वांग भरें
यह
स्वतंत्रता सौंप कर हमें
अनंत करता है प्रतीक्षा हमारे भीतर

 
और 
एक क्षण
कई कई सीढ़ियों की
रोमांचक, प्रफुल्लित चढ़ाई के बाद
जब आलिंगनबद्ध होने को हूँ
जब अनंत से
कृतज्ञता से याद किया है तुम्हें
और 
देखता हूँ
अनंत ही तुम्हारे रूप में 
दिखाता रहा मुझे यह अंतर यात्रा का पावन पथ 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
            बुधवार, २० अप्रैल २०११                  

प्रखर दीप ने पथ दर्शाया


 
प्रखर दीप ने पथ दर्शाया
गिर जाने से मुझे बचाया
कृतज्ञता से भर कर मैंने
नैनों से आभार जताया
लगा कोइ लौ में मुस्काया
मुझ पर अपना प्रेम दिखाया
कहा, धन्य हो तुम भी प्यारे
तेज़ हवा से मुझे बचाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० अप्रैल २०११  

 



 
झे      

Tuesday, April 19, 2011

एक निरंतर उपलब्धि




उसने सूरज से अनुमति लेकर
उँडेल दिया
सुनहरा उजियारा
मन की धरती पर

प्रकट हुआ
कालातीत का
अप्रतिम सौंदर्य

वह एक सूक्ष्म प्रदीप्त पुंज
करूणा का
फैलने लगा है
ऐसा बोध भी न हुआ
बस उसके विस्तार में 
मिटता गया भेद
खोने और पाने का
उपलब्ध हो गयी
एक निरंतर उपलब्धि

शेष हो गया 
रुकने और चलने का भेद
स्थिर गति के आल्हाद में
लीन होकर
जब लुप्त हुआ मैं
मेरा  मिटना पूर्ण हो जाना कहलाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १९ अप्रैल २०११   
            

Monday, April 18, 2011

गीत जो हरदम तेरा



एक लय के साथ बह ले बन के धारा
सांस की उद्गम स्थली ने है पुकारा
छोड़ कर देखो, सभी कुछ है हमारा
पकड़ने की जिद लिए, हर एक हारा

देख स्वागत में खड़ा शाश्वत बुलाये
छूट कर 'मैं' से ही उसको देख पाए
सिमटने का खेल तज, विस्तार पा ले
गीत जो हरदम तेरा, वो गीत गा ले

छल की गलियों में नहीं होगा गुजारा
झूठ के इस खेल में मत फंस दुबारा
खुद को बंदी मान कर मत बन बेचारा
सत्य के संग चल, उसी का है सहारा

देख अब अपना परम वैभव संभल कर
देख दुनिया आस्था के स्वर में ढल कर
 त्याग कर अब अपना खंडित वेश सारा
एक लय के साथ बह ले बन के धरा  


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ अप्रैल 2011 
     

Sunday, April 17, 2011

अमृत की बौछार


अब किरणों के नए गीत से
हर धडकना पर प्यार लिखूंगा
हर धड़कन में धड़क रहा जो
मैं उसका आभार लिखूंगा
मौन पिघल 
सुन्दर नदिया बन बहे आज तो
मिला संदेसा
नयन मिला कर,
अमृत की बौछार लिखूंगा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
  
   

Saturday, April 16, 2011

तुम कौन हो


ऐ जी
तुम कौन हो
उसी एक बात को नया नया कर देते हो
देखने मात्र से सारे संशय हर लेते हो
कैसे संभव हो जाता है तुम्हारे लिए 
हर बार मुझे शुद्ध प्रेम से भर देते हो

ओ मौन सखा
आज फिर तुमने मुझे उबारा
सुन्दर कर दिया संसार सारा
बिना जताए अपनी उपस्थिति
दे दिया मुझे फिर सहारा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ अप्रैल 2011 

Friday, April 15, 2011

परम विश्रांति का स्वाद



उसने कहा था
सांसों की लहर 
धो रही है
सारी उद्विग्नता

उंडेल रही है
अनिर्वचनीय आभा

उसने कहा था
तुम शांति हो
तुम आनंद का उच्छलन हो
उसकी आश्वस्ति के स्पर्श ने
मुझे आलोकित शून्य में
बिठाया 
और 
चिर नूतन की रसमयी संनिद्धि 
का मधुर साक्षी बनाया

वह लौट गया
मुझे मुझसे मिलवा कर

और मैं
लौटता हूँ उससे मिलने
उन क्षणों तक
जहाँ मेरे लिए
सुलभ होता है परम विश्रांति का स्वाद


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ अप्रैल २०११   


         
  

Thursday, April 14, 2011

उसी के होने की गाथा





एक पूरी कविता
लिख कर मिटा देने के पीछे
निर्णय करने वाला
जो एक सूक्ष्म तंतु है
उसके प्रति विद्रोह नहीं
सम्मान सा ही है
 
यह एक
अनदेखा, सूक्ष्म संकेत देने वाला
मुझमें रह कर
मुझे चलाता है
मेरा रूप
लेकर, जगत के रसमय
स्वरुप को
अपनाता है
 
 
यह एक
जिसके हाव-भाव 
बनाते हैं
जीवन की परिभाषा
इसी को लेकर
फिसलन में भी
बनी रहती है आशा 
 
एक यह
जो हर बार
गिरने से बचाता है
जिसको लेकर
साँसों में शाश्वत सूरज
उग आता है
इसे पहचानने के प्रयास में
जीवन
रसमय होता जाता है
अच्छा लगता है,
जब ये समझ आता है
की मेरा जीवन भी
उसी के होने की गाथा है
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ अप्रैल 2011  

   
 
   

Wednesday, April 13, 2011

आकार के वस्त्र



मन जागता है
कभी कभी इतना अधिक
की
चकमक चांदनी की चकाचौंध
ठहर जाती है
चेतना पर

विलुप्त हो जाती
परिचय को परिभाषित करती
परिधि

सन्दर्भ रहित उपस्थिति की
यह यात्रा
और अधिक सुरमय बना देती 
साँसों को

मन जागता है
कभी कभी इतना अधिक
की जैसे इन्द्रियों से परे
कर रहा हो प्रवेश
सीमातीत लोक में

देख कर मन को 
अंतरहित उपस्थिति में घुलते हुए
एक विस्तृत मौन में लीन
कहने-सुनने से परे
आत्मसात करते हुए बोध विराट का

एक कुछ 
जो रोक कर मुझे फिर से
आकार के वस्त्र पहना देता है
वह चाहता है मैं
अभी कुछ और वसंत देखूं 
और
नव कुसुमो से लदी डालियों को झूमता देख कर
उसकी आराधना के गीत का छंद बनता जाऊं 
   


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल २०११
        

दादी के चश्मे से







1
बुरी नज़र लगने की बात
मुझे कभी पचती नहीं है
नकारात्मक भी है कहीं कुछ
ये बात जचती नहीं है



       शायद मेरी समझ
उसी डगर पर
देखती है जीवन
जहाँ आनंद है
विस्तार है
प्यार है
सबके द्वारा
सबके लिए
हितमय व्यवहार है
 


शायद अब तक
दादी माँ की उस बात से मेरा निर्वाह होता है
कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है

'अच्छा' कई बार, हमारी समझ के घेरे में नहीं समाता
जब जो होता है, उसमें 'अच्छा' देखना, संभव नहीं हो पाता  

'अच्छे-बुरे' के प्रभाव में हमारी दृष्टि का भी योगदान है
दादी की सीख में, इस बात की पक्की पहचान है

दादी के चश्मे से मुझे दुनिया ऐसे दिखाई दे जाती है
कि सबके कल्याण की भावना सहज ही उभर आती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल 2011 

 

Tuesday, April 12, 2011

कोई एक भावसूत्र लेकर


इस बार
उसके आने की आहट सुन कर भी
मैंने खोली नहीं आँखें

शायद वो ही हो
शायद वो नहीं हो, सिर्फ भ्रम हो

पर कोई एक भावसूत्र लेकर
मैं
खेलने लगा उससे संबोधित होने का खेल
'इस बार नहीं देखना है तुम्हें'
'तुम आते हो
दिखते हो
सब कुछ दिखाते हो
और फिर खुद छुप कर
जो जो दिखाया 
वो सब सच
मेरे लिए झूठ कर जाते हो
अब इस तरह सताते हो
बैचेनी बढाते हो
कभी सहारा देते हो हर बात का
कभी बेसहारा कर जाते हो

कभी सार जगाते हो हर क्षण में
कभी सब कुछ अर्थहीन कर जाते हो'

कुछ देर चुप रहा
सुनता रहा उसकी संभावित प्रतिक्रिया

शब्द नहीं उसका मौन ही था

उसमें करूणा भी थी
और सत्य की वही तरंग थी
जिसे पकड़ न पाने की छटपटाहट से
व्यथित था

अगर वो बोलता तो शायद ये कहता
"क्या करूँ
नियम है
मुझे वही पकड कर रख सकता है
जो मेरे जैसा बन जाए
और फिर
प्रश्न 'पकड़ने या छोड़ने' का नहीं
'होने' का ही शेष रह जाता है

जब तक तुम
वह न हुए जो 'हो'
तब तक
मेरा-तुम्हारा साथ
ऐसा ही रहेगा
'होकर भी कभी कभी होगा नहीं
न होकर भी होगा ही  हमेशा"

मौन में 
उसकी हंसी सुनकर मुस्कुराया
आंख खोली तो 
खिड़की से निश्छल, कोमल 
उजियारा भीतर आया
 
         अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १२ अप्रैल 2011 

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...