Monday, April 11, 2011

बाहरी दौलत के बदले


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दिन है, पर कोई लिहाफ सा ओढ़े है
किरणों का रथ जाने कैसे दौड़े है


बस जल्दी जल्दी
उसने निकाल कर रख दिए
काउंटर पर सारे
बेशकीमती आभूषण
और
मुक्ति की मांग के साथ
जब देखा दाता को

हंस कर कहा देने वाले ने
जब तक
सबसे अधिक मूल्यवान
स्वयं को 
नहीं सौपोगे यहाँ
मुक्ति नहीं
मुक्ति की परछाई ही
मिल सकेगी
सारी की सारी
बाहरी दौलत के बदले


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, ११ अप्रैल ११   

              

Sunday, April 10, 2011

जीवन-मृत्यु के पार


बस धीरे धीरे
पुकार की श्रंखला का
हो ही जाता है असर,
एक दिन माँ 
 अनछुए उजियारे से
 भर देती है घर

कण कण में जाग्रत हो जाते
मधुर आश्वस्ति के
दुर्लभ स्पंदन,
संशयों से छूट कर
शुद्धि में 
निखर जाता मन 

फिर 
एक हो जाते
प्यार, पुकार और
अनंत का सत्कार, 
ऐसे 
एक मंगलमय ज्योत्स्ना 
कर देती
जीवन-मृत्यु के पार 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० अप्रैल 2011 

  

Saturday, April 9, 2011

उदारता का अपार आकाश


और फिर 
यूँ लगा सब कुछ 
देख रहा हूँ नए सिरे से

हर बात के लिए
समझ का नया परिधान
भेजा है किसी ने
जैसे राज महल तक
हीरे मोती भरे थाल माथे पर धरे
आ गए हों
दूत किसी ऐश्वर्यवान के

समझ नए वस्त्र पहन कर
निखर गयी
अनुभूति तक पहुच गयी
अद्वितीय शांति

उदारता का अपार आकाश
हो गया जाग्रत

सहज हो गया
सबके लिए
क्षमाशीलता का परम सुखदाई भाव 

स्व-राजमहल के शिखर से
समझ के नूतन परिधान दाता को देखने के प्रयास में
दिखाई दे गया
सूर्यकिरण में झिलमिलाता
एक रूप
अनंत का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९ अप्रैल २०११    

Friday, April 8, 2011

कृतज्ञता से भर कर


यह जो
बंद घरों के बाहर
बिना किसी के देखे
धीरे धीरे
उतर आता है
फ़ैलता है बिना किसी को जताए
अपने आने के लिए
किसी विशेष स्वागत की अपेक्षा किये बिना
करता है स्वागत
खिड़की और द्वार खोल कर देखने वाले का
अपनी आश्वस्त करती 
अद्भुत उपस्थिति से

यह
यही उजियारा
दिनकर का विस्तृत उपहार

किसी निर्मल क्षण में
कृतज्ञता से भर कर
सृजनात्मकता, शक्ति, सौंदर्य और श्रद्धा के इस कोष को
रोम-रोम से करता हूँ नमन
सांस सांस से जुड़ जाता हूँ
इस विराट व्यवस्था के अपार सूत्र से
और
अपने सीमित संदर्भों के घेरे से
छूट जाता हूँ
अनायास

हर दिन
सुलभ करवाता है
मुक्ति की अनुभूति 
वाह! क्या बात है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ अप्रैल २०११  


         

Thursday, April 7, 2011

जिन्हें हम कभी नहीं जान पाते हैं



बात शुरू करने के पहले
कोइ एक सिरा
ढूंढता है 
हर कोई

कभी सजगता से
कभी बिना सोचे

कोई एक सूक्ष्म तरंग
साथ चलते हुए
देती है शब्द, भाव, विचार, सपने

बिरला ही करता है प्रयोग करता
चयन की शक्ति का 

और 
जो बहुत सतर्कता से
करने लगता है अभ्यास
चुन कर सर्वश्रेष्ठ को
अपनाने का
बस उसी को गाने का

अक्सर
वह मौन हो जाता है

फिर एक ऐसा क्षण आता है
जब चुनने का भाव भी छूट जाता है
वह क्षण
जब
चुनने वाला और चुना गया एक हो जाते हैं

तब
वे उन लहरों के
उद्गम हो जाते हैं
जिनसे जग में सुन्दरता और
सार के दरसन हो जाते हैं

अक्सर वे लोग
जिन्हें हम कभी नहीं जान पाते हैं
हमारे लिए सार के संकेत और गति सुलभ करवाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
            गुरुवार, ७ अप्रैल 2011           

Wednesday, April 6, 2011

कोई अदृश्य हाथ हर दीवार हटाये




एक क्षण
जब कोई खिड़की से परदा हटाये
कमरे में उजियारा लहलहाए
समय ही मधुर राग छेड़ कर
साँसों में मधुर संगीत सजाये

एक क्षण
तुम्हारे होने की आभा खिल जाए
खोया परिचय अमृत का मिल जाए
आनंद के झरने में भीग कर उड़ता
सनातन श्वेत पंछी आशीष लुटाये

एक क्षण
सम्पूर्णता का वैभव दिख जाए
कुछ 'न होने' की कसक बिसर जाए
तन्मयता की तान ऐसे ठहरे साथ में
कि प्रेम का अक्षय स्त्रोत मुस्काये

एक क्षण
कोई अदृश्य हाथ हर दीवार हटाये
वही विस्तार हम सबको अपनाए
शून्य ले जाए भेद मेरे-तेरे का
शुद्ध तृप्ति सहज ही  उमड़ आये
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ६ अप्रैल 2011  

  
 
    

Tuesday, April 5, 2011

सबके साथ, सहज अपनापन


भाव शुद्ध हो
कर्म हो उज्जवल
गहरे ठहरे
यह मन चंचल
ध्यान केंद्र पर
रहे निरंतर
प्रेम प्रकाश
बढ़ाये हर पल
 
 
अब उलझन के पार निकल ले
अपना जीवन, आप बदल  ले
रस्ते की फिसलन बोले है
निकल सकेगा, जरा संभल ले
 
 
माँ के आने की तैय्यारी
जिससे है ये सृष्टि सारी
वो सबकी, पर कोई-कोई ही
उसकी ममता का अधिकारी
 
 
फिर से करूँ पुकार प्यार से
मुझको फिर तू मिला सार से
बता शांत रह पाऊँ कैसे
मिलना हो जब अहंकार से

 
मगन प्रेम में तेरे साईं
सारा जग, तेरी परछाई
तुझको देखा, जादू जागा
अपनी बस्ती, बहुत सुहाई
 

उभर गया फिर गान सनातन
निखर गया शाश्वत से आँगन
  परम शांति का बोध उजागर 
सबके साथ, सहज अपनापन
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ५ अप्रैल 2011    
 

    
   
   

             

Monday, April 4, 2011

दूर कर नाराजगी सूरज की



कभी कभी कविता दर्द से आती है
पर अक्सर, कविता दर्द मिटाती है
परत दर परत जब हटती जाती है
एक शुद्ध कविता शेष रह जाती है 

 कहने वाले में
 अब तक
शेष है 'आस्था' शब्द के प्रति
मानवता के प्रति

इसीलिए मुझे
उसका कहना
अच्छा लगता है

लगता है उसके शब्द
दूर कर नाराजगी सूरज की
बुला ही लायेंगे उसे

ना जाने कबसे
उतरा ही नहीं है
बस्ती में उजाला    
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ अप्रैल २०११  


  

Sunday, April 3, 2011

उजियारे से आँख चुराना


 
उसने पाया, जिसने जाना
जीवन है अनमोल ख़ज़ाना
 
ठहर ठहर कर ही दिखता है
लगा हुआ है आना-जाना

नदी किनारे मिल जाता है
कुछ यादों का ताना-बाना
 
 पलट पलट कर देखें कब तक
अच्छा है, आगे बढ़ जाना
 
पूछ-ताछ के बिना खिले जो
होता है सुन्दर अफसाना  
 
मेरा काम,  आवाज़ लगाना
उस पर है, आना ना आना 
 
अब जाकर छूटा है मुझसे
उजियारे से आँख चुराना
 
द्वार खोल कर रख छोड़ा है
जब भी चाहो, तुम आ जाना
 
धारा का तो खेल यही है
पत्थर को यूँ गढ़ते जाना 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, ३ अप्रैल २०११   


 
 
 
 
 
 

 


 
 

 

Saturday, April 2, 2011

दर्द बाँटना सरल नहीं है


विस्मय भी होता है चंचल 
हमें छोड़ जाता है हर पल

तरह तरह से भरा है उसने
मैंने जब फैलाया आँचल

पानी और अधिक पावन था
जब जाना ये है गंगाजल

सन्दर्भों में शीतलता है
और कभी जागे दावानल

उसने नहीं कहा था कुछ भी
पर मैंने तो पाया संबल

पहले हम उससे डरते थे
अब हमसे डरता है जंगल

अब वो बात फूल लगती है
जिस पर हो जाता था दंगल

अपनेपन का किस्सा लेकर
आँगन आँगन बरसे  बादल

 दर्द बाँटना सरल नहीं है
एक नहीं, दोनों हैं घायल   


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ अप्रैल २०११  

  

Friday, April 1, 2011

विराट का सहज निवास


वह
जो 
कहता-सुनता है
उसे लेकर
उसके आगे 
एक विराम की विश्रांति 
पाकर
मौन की अनछुई मधुरता लेकर
लौटा
वह

    और उसकी लबालब करूणा ने
छू लिया मुझे

इस स्पर्श की कांति में दमकता
महसूस करता
अपनी मुस्कान में
विराट का सहज निवास


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ अप्रैल २०११

(यह कविता स्वामी श्री ईश्वारानंद गिरिजी महाराज की पुस्तक 
'आनंद मीमांसा' के पुनः पढ़ते हुए 
अनावृत होती स्पष्ट को पकड़ने के प्रयास की अभिव्यक्ति )       

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...