Monday, December 13, 2010

दिव्य शपथ है

 
अमृत पथ है 
दिव्य शपथ है
शांति प्रदायक
प्रेम का व्रत है


आनंद उत्सव
साथ सतत है
ज्योतिर्मय 
अपना भारत है

शीतल मन
उजियारा गाये
उसका सुमिरन 
नित्य सुहाए 
 
धरती आँगन 
अम्बर छत है
अमृत पथ है
दिव्य शपथ है
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१३ दिसंबर 2010

Saturday, December 11, 2010

तुम्हारी कृपा का आश्वासन









स्मृति में
यह जो
सुनहरा वलय है
निरंतर आश्वस्ति उंडेलता,
इसके केंद्र में ही नहीं
परिधि पर भी
तुम्हारी
स्नेहमयी, करूणावर्षक उपस्थिति
जाग्रत है
स्मृति में ही नहीं
चेतना की
संवाद सतह पर भी
घुला हुआ है
तुम्हारी कृपा का आश्वासन

तुम कैसे
इतना भरोसा देकर
उज्जीवित कर देते
मन प्राण सबके

सोच-सोच कर
लीन हो जाता
तुम्हारे बोध में

ओ शाश्वत!
निसंकोच माखन लुटाने
आ पहुँचते हो तुम तो
घर-द्वार तक
पर
हम ही तुम्हारी टोली में
ना मिल कर
खड़े रह जाते
दर्शक दीर्घा में

ये क्या है
जो रोकता है
तुम्हारे प्रवाह संग
एक मेक हो जाने से?

अशोक व्यास
शनिवार, ११ दिसंबर २०१०

Friday, December 10, 2010

चिरमुक्ति द्वार

 
वह सब
जिसे अपना मान कर
इठलाते, इतराते और 
प्रसन्नता में लहलहाते हो
वह सब
जिसको अपना परिचय मान कर
कभी खिल-खिल जाते
कभी कुढ़ते-कसमसाते हो
 
वह सब
यदि किसी एक अनाम क्षण में
छूट जाए अनायास,
क्या तब भी 
रहेगा अपने होने और खुदको 
बनाने वाले पर विश्वास,
 
वह जो सब कुछ देता है 
हम उससे मांगते हैं 
स्थाई रूप से बने रहने का अधिकार 
और अमर हो जाने की 
मांग पर
सदियों से चल रहा है विचार 
 
 
जो अपने किये या ना किये से
बंधे रह जाते
वे नहीं पहुँच पाते उस पार,
कर्मों के बंधन से मुक्त होने की कला
सीख लेते जो
उनके लिए खुल जाता चिरमुक्ति द्वार


अशोक व्यास
शुक्रवार, १० दिसंबर 2010

Wednesday, December 8, 2010

नींव प्यार के किस्सो की मजबूत रहे

जो भी हो
आनंद तुम्हारा अपना है
सच होकर भी
सपना जो है, सपना है
२ 
अनुभूति पथ फूलों के संग कांटे भी 
सुन्दरता है वहां, जहाँ सब अपना है

मन के जंगल में सावन के आने पर
यूँ लगता है, पग-पग पर एक सपना है

आस्तीन में पाल-पाल कर रखे थे
अब कहते हैं, इनसे हमको बचना है

आसां है विध्वंस जगा देना छुप कर
मुश्किल तो ये प्रेम-भाव की रचना है

सोने-जगने के तय वक्त का वक्त नहीं 
युद्ध काल में नित्य-निरंतर जगना है

हुआ बहुत विश्राम बैठ कर आँगन में 
अब होना है सजग, नहीं अब थकना है

बात वही है, रूप बदल कर आयी है
बोध सत्य का बाँध, कमर को कसना है

नींव प्यार के किस्सो की मजबूत रहे 
इसीलिए सीमा पर साहस रखना है



अशोक व्यास 
बुधवार, ८ दिसंबर २०१० 



Tuesday, December 7, 2010

खेल में खेल

 
जैसे खेल के मैदान में
घुस आये कोई बैल
तब
खेल रोक कर
जुट जाते हैं सब
उसे निकालने में
और फिर 
खेल बिगाड़ने वाला ही
बन जाता है एक खेल
कभी कभी
अवांछित विचार
बिन बुलाये मेहमान से 
घुसपैठ करते हैं
मन के 
शांत उपवन में
छिन्न-भिन्न कर
नीरवता,
भर देते हैं
आवेशित कोलाहल
 
ऐसे में
एकजुट होकर
अनिर्वचनीय शांति का साम्राज्य
स्थापित करने
उसकी ओर देखना,
जिसको देखने से
मधुर रस देती है
खेल में खेल की
यह
समझ को उन्नत करती सीढियां 
-
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ७ दिसंबर 2010

Monday, December 6, 2010

गीत कोई परंपरा का

 
दिन लिहाफ ओढ़े
उनींदा सा
सूरज का तेज़ छुपा कर
सुस्ता रहा है
यूँ तो
 
फिर भी
हवा में
गति की पुकार
बढ़ती जा रही है
 
धीरे धीरे हिलती पत्तियों में
गीत कोई परंपरा का
खोल रहा है
दिन के नाम लिखे
पुराने ख़त
 
और मैं
आसमान में
नन्हे- नन्हे बादलों के बीच
खोज रहा हूँ
वो किरण
जिसे लेकर
खुद तक पहुँचने की 
तैय्यारी करनी है
आज मुझे

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, ६ दिसंबर २०१० 

Sunday, December 5, 2010

समझ के इस नए पड़ाव पर



अब
हम वहां तक
आ पहुंचे हैं
जहाँ
कोई भी
किसी को भी
कह सकता है कुछ भी

अब
हमारी अँगुलियों से
जुडी तकनीकी लहर
जगा सकती है
धरती के एक छोर से
दूसरे छोर तक
पहुँच सकने वाले स्पंदन

स्पंदन शब्द रूप लेकर
दे सकते हैं
दस्तक 
क्षण भर में
सात समंदर पार बसे
किसी घर के 
गोपनीय स्थल तक

स्पंदन पहुंचा सकते हैं
किसी अनजान व्यक्ति तक 
वो सब तस्वीरें
जो हम 
अपनों को दिखाने में
भी संकोच करते थे
अभी कुछ दिन पहले 

अब हम
पहले से बेहतर अवस्था में हैं
हमारी हथेली में
सिमटने को
तैयार है
सारा संसार

पर
अपनी हथेली देख पाने
का धैर्य छूट गया है कहीं 
 
समझ के इस नए पड़ाव पर
यह विचार करने का समय
सिमटता जा रहा है
कि किसको क्या कहना है और क्यूं

हम
पहुँच तो सकते हैं
किसी तक भी
पर पहुँचाने के लिए
हमारे पास
अब
जो कुछ है
क्या उसमें
हम हैं ?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ दिसंबर २०१०

Saturday, December 4, 2010

उसकी आहट


 
कुछ नहीं दिख रहा था
सब कुछ दीखते हुए
सारे शोर-गुल के बीच
गुम हो गयी थी
उसकी आह्ट
जाने पहचाने रास्ते पर
खोया खोया
मैं
विश्वास सूत्र के लिए
बोध की अँगुलियों से
टटोल रहा था
मन का आँगन

सहज होकर भी
सहजता से मिलता नहीं वह
कई बार
और इस तरह
सिखा देता है
पूरी तरह एकाग्र होने की कला

पूरी तरह
सजग होकर
धीरे धीरे
अब जब सुन पा रहा हूँ
उसकी आहट
खोली नहीं है
आँख अपनी

मैं भी
उसकी तरह खेल कर
जता रहा हूँ उसे
कि उसके आने का
मुझे कुछ पता नहीं है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ दिसंबर २०१०

Friday, December 3, 2010

शाश्वत मिलन का अद्वितीय उत्सव


 
अब जब
साफ़ दिख रहा है
सूरज की किरणों में
तुम्हारा चेहरा
और
ऊष्मा यह प्रेम की
सोंख रहा है
मेरा रोम- रोम
अधमुंदी आँखों से
देख कर 
पुष्टि करना चाहता हूँ
यह जो 
महसूस कर रहा हूँ
तुम्हारा होना
अपने आस पास
कहीं तुम भी
देख तो रहे होंगे मुझे
और
तुम्हारी दृष्टि से
पोषित है
यह जो उल्लास सा
मन में
इसे लेकर
नृत्य करने की यह स्निग्ध उमंग, 

लो
सहसा
निश्चल मौन में
सज गया है
शाश्वत मिलन का
अद्वितीय उत्सव

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ दिसंबर २०१०

Thursday, December 2, 2010

विराट गगन को छू लेने

इस समय
जब बैठे हो ध्यान के लिए
मन दौड़ कर
कई दिशाओं से
सन्दर्भों के नए-पुराने कंकर बटोर कर
उलझा देना चाहता है
तुम्हें किसी पछतावे या किसी शिकायत के खेल में

इस समय
ध्यान के लिए बैठ कर
जब देख रहे हो मन की हलचल
और
शांत कक्ष भी बन गया है
जैसे कोलाहल भरे बाज़ार सा
ऐसे में
उठ कर चले ना जाना
करना प्रतीक्षा
साँसों पर ही नहीं
शरीर की सूक्ष्म हरकत पर
एक उपराम दृष्टि डाल कर
धीरे धीरे
धीमी होती लहरों में
तरंगित होगा
एक गहरी आश्वस्ति का वास
इस क्षण की विश्रांति में
खुल जाएगा
वह सुख
जो दुर्लभ है
और तब
अपने मन के पंखों में
विराट गगन को छू लेने की
अकुलाहट का आगमन
प्रफुल्लित कर देगा तुम्हें

यह उल्लास लेकर
लुटा सकते हो
अपार प्यार
पग पग पर

ये विश्वास लेकर
ऐसे अपना सकते हो
नए दिन को
कि जैसे तुम्हारी गति से
हर पग पर
हर संपर्क में
प्रकट होता जाए 
सार पावन तीर्थ का



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ दिसंबर २०१०, गुरुवार

Wednesday, December 1, 2010

लुटेरा परिपूर्णता का


 
 
इतने दिनों के बाद
अब जब
जहाँ भी हूँ
पूरा हूँ अपने आप में
मिल कर औरों के साथ
हर क्रिया से
आरती करता हूँ तुम्हारी

तुम
 ना केवल सम्पूर्ण हो
वरन  निश्छल उदारता से लुटाते भी हो 
अपनी पूर्णता, 
और तुम्हारी कृपा से 
अब मैं भी 
बनने लगा हूँ 
लुटेरा परिपूर्णता का 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१ दिसम्बर २०१०

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...