Thursday, March 11, 2010

134 अब तक देखा ही नहीं

कैसे देखूं
वहां से 
अब तक देखा ही नहीं
जहाँ से

प्रश्न उसके चरणों पर रख कर
जब देखने लग उसका
मुस्कुराता चेहरा

सहसा
प्रश्न में से
निकल आया 
एक नया रूप मेरा


वो मुझे
प्रेम के शुद्ध उजियारे में
नहला कर नित्य नूतन 
कर देता है 
अपनी तरह 
और फिर 
निकल आता हूँ 
मैं 
जानी पहचानी पगडंडी पर
नए सिरे से
प्यार का उपहार लुटाने 
इस तरह
सुन्दर बन जाता है मेरा दिन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ५२ मिनट
गुरुवार, ११ मार्च २०१०

Wednesday, March 10, 2010

सारा आकाश द्वार है


१ 
सारा आकाश द्वार है
जहाँ भी हूँ
उसके दर के पास हूँ
सारी धरती एक सी है
बदलाव जिन स्तरों का है
उन से परे होकर
देखता हूँ जब,

बिना थपथपाए
खुल जाता है
आकाश का द्वार


लो फिर एक बार
दिखला कर 
प्यार का उजियारा
जताया उसने
सब कुछ अब भी
हो सकता है प्यारा

बंद करके नफरत का फव्वारा
जाग सकता है भाईचारा


लडाई
शांति और अशांति के बीच
प्यार और नफरत के बीच
होती है बार बार

बस जीतने के बाद भी
शांति और प्यार
नहीं जताते
जबरन अपना अधिकार

करते हैं प्रतीक्षा
मन की फसल में
धैर्य के साथ
इस बार, या इससे अगली बार
नयी कोपलों में
दिख ही जायेंगा
समन्वय का सार 


वह जो सर्वोत्तम है
उसके पास अनंत धैर्य है
शायद इसलिए भी 
क्योंकि वह जानता है
अपना अक्षय रूप

पर हम
उसके धैर्य को
उसके अस्तित्त्व पर 
प्रश्न चिन्ह की तरह देखते हैं

और अपने साथ साथ
उसकी चिंता में
दुबले हुए जाते हैं



तो चलो आज 
नए सिरे से
प्यार और शांति की सेना में शामिल हो जाएँ
नफ़रत सुन कर भी शाश्वत समन्वय पनपायें
भाव तो ये रहे कि दुश्मन को भी गले लगाएं
पर ऐसा करते हुए
अपने वास्तविक स्वरुप को भूल ना जाएँ

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१० मार्च २०१०, बुधवार
सुबह ४ बज कर २४ मिनट

Tuesday, March 9, 2010

132 मौन की अमृतमयी आभा


नियम सारे
शरीर को लेकर हैं
स्वस्थ हैं 
तो नियमों का पालन है

स्व में स्थित हुए बिना
गति नहीं
स्वस्थ होना, गंतव्य नहीं
प्रारंभिक चरण मात्र है


कविता ने 
उस दिन
नदी, पेड़, हवा और पर्वत को साथ लेकर
'भाषण' के विरुद्ध 
किया था प्रदर्शन,
संवेदनात्मक अभिव्यक्ति में
नहीं प्रवेश कर सकता भाषण


भाषण, में 'द्वैतपना' है
एक सही 
दूजा गलत
कविता में
'एकात्मकता का आलिंगन' है

कविता सबको एक सूत्र में पिरोने
की सहज भावना का
उतरना है
या शायद
सबके बीच 'एक सूत्र' को देखने
की सर्वकालिक दृष्टि है

कविता जीवन के
विविध रूपों को
देखती, अपनाती, दुलराती
धीरे धीरे
आलोक के सुन्दर पदचिन्हों तक
मन को ले जाती

उस क्षण तक
जहाँ 
मौन की अमृतमयी आभा में
घुल कर
हम उज्जीवित होते

अपनी क्षुद्रता को खोते

चेतना के उन्नत स्तर पर
सौंप कर अपना आप

बन जाते हैं
विराट का चिन्मय आलाप


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, मार्च ८, २०१०
सुबह ७ बज कर ४८ मिनट

Monday, March 8, 2010

131-हम इतने सारे खेल रचाते हैं


हाथ हिला कर 
एकाकी टापू से
गुहार रक्षा की
इस ओर से गुजरते जहाज से
जारी रहती है
कई बार हो चुकी
नाकाम कोशिशों के बावजूद


वह जो लक्ष्य है
मिले ना मिले
छोड़ तो नहीं सकते कोशिशें 
पर कोशिश अपने आप में 
पर्याप्त नहीं
कुछ है 
जो किसी एक क्षण 
मिल जाता है
कोशिशों से जब
पूरा होता है
एक आकार
पूर्णता का एक हिस्सा 
हमारे भीतर है
या
सम्पूर्णता निहित है हममें?
सजग रह कर
जब जब
पुकारा है
समग्रता के बोध को
अक्सर लगा है
वह जो
बाहर से आकर बचाता लगता है
शायद 
वह भी
छुपा हुआ तो था भीतर ही हमारे
हम स्वयं ही 
एकाकी टापू बनाते हैं
पुकार लगाते हैं
और
स्वयं ही
खुद को बचा कर
एकाकीपन से पार लगाते हैं
हम इतने सारे खेल रचाते हैं
और 
इस तरह 
संसार रचते जाते हैं
रोते तब हैं
जब अपनी रचना में
स्वयं को कहीं खो आते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ मार्च २०१०, सोमवार, सुबह ८ बज कर ३० मिनट

Sunday, March 7, 2010

130 - नए स्मृति कक्ष


गाडी निकलने के बाद 
पहुँच कर प्लेटफोर्म पर
देखता रहा 
पटरियां देर तक,

सुनता रहा
चुप्पी में
उस रेल के गुजरने का स्वर
जो जा चुकी थी बहुत पहले 

वह सब जो छूट जाता है
उसे बुलाने के लिए
रचते हैं
हम कुछ नए स्मृति कक्ष
और 
फिर
जला कर सुगन्धित अगरबत्ती
करते हैं पूजा
उन पावन क्षणों की जो
हमारे ना होकर भी
बने रहते हैं हमारे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च ७, २०१०
दोपहर २ बज कर २ मिनट

Saturday, March 6, 2010

129 - जीना तुम्हारी 'हाँ' और 'ना' के बीच है

संवित सधानयन, आबू पर्वत                                         चित्र-अभय हर्ष



१ 
अब तो स्पष्ट हो गया ना
'garbage in garage out'
यह बात सिर्फ computer के लिए ही नहीं है
लागू होती है यह
तुम पर भी
जो भीतर जाएगा
किसी ना किसी रूप में
बाहर आएगा

बात सिर्फ तन की नहीं
मन की भी है
मन के रंगों से बनता है जीवन
कैसे रंग उतर रहे हैं मन पर
इसका नियंत्रण यदि नहीं कर रहे तुम
तो समझ लो
जीवन अपना तुम नहीं जी रहे
कोई और जी रहा है


क्यूं ऐसा है
कि हम अपना जीवन जीने के लिए
तैयार ही नहीं हैं

वो सब जो पहनाया ओढाया गया
उसी को अपना कर
खेलते हैं, नाचते हैं, गाते हैं
कभी हँसते हैं
कभी रो लेते हैं
और कभी कभी अपनी विवशता का दोष
किसी और को  देते हैं


अब ये बात भी interesting है
कि जीना कोई और नहीं सिखाएगा
जीना तो अपने भीतर से ही आएगा

पर भीतर खुद अपने
वही देख पायेगा 
जो मन को देख देख
बाहर जाती उर्जा को
थोडा बचाएगा
धैर्य से मन के रंगों को
संयोजित करने की कला
अपने लिए आप पनपायेगा


जीना 
तुम्हारी 'हाँ' और 'ना' के बीच है
यदि जीवन को 'हाँ' कहोगे तो जियोगे
और किसी क्षण जब
मृत्यु छल करते हुए
खुद को 'जीवन' बताते हुए आयेगी
और गलती से भी 'हाँ' कह जाओगे
तो मारे जाओगे


सुनो
जीने के लिए
'जीवन' की पहचान जरूरी है
तब ही तो 
सजग रह कर 'मन के द्वार'
 मृत्यु को रोक सकोगे उस पार 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च ६, २०१० शनिवार सुबह ७ बज कर ५१ मिनट

Friday, March 5, 2010

127- ये 'interactive' उपहार है


लो मैंने तो दे दिया तुम्हे
एक और नया दिन
जानता हूँ, बढ़ नहीं पाते
इस उपहार के बिन

पर मेरे प्यारे
मेरे दुलारे

अब देखना है
इस उपहार से तुम क्या बनाते हो
क्या क्या अनुभव लेकर
दिन के उस छोर तक आते हो

ये 'interactive' उपहार है
इसको तुम्हारी समझ की दरकार है
तुम सजग रह कर जाने 
तो हर क्षण में आनंद की रसधार है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, ५ मार्च २०१०
सुबह ७ बज कर ४५ मिनट

Thursday, March 4, 2010

जिसे हम लौटना मानते हैं


लौट कर आना 
सचमुच कभी होता नहीं
जिसे हम लौटना मानते हैं
वो दरअसल एक नयी जगह पर
पहुंचना होता है
जिसके साथ जुडी होती है
पहचान पुरानी


जगह बदलती है
हम भी बदलते हैं
सन्दर्भ भी बदल जाते हैं
इस तरह हम
जाने अनजाने 
लौटते नहीं
आगे निकल आते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ मार्च २०१० गुरुवार
सुबह ७ बज कर ५३

Wednesday, March 3, 2010

125-सीमित पाठशाला से बाहर

हर दिन की तरह
रचनात्मक पाठशाला
का द्वार खोल कर
करते हुए 
कविता की प्रतीक्षा
दिखाई दिया
सुनहरे अक्षरों से लिखा एक पत्र
लिखाई कविता की  ही थी
'देखना आज मैं
अदृश्य रूप में
बनी रहूँगी
आस पास तुम्हारे
पर पाठशाला से छुट्टी ले रही हूँ आज'


आज नियम में नहीं बंधना चाहती
निकलो
सीमित पाठशाला से बाहर
अगर चाहते हो साथ मेरा

आज विराट से मुलाक़ात के लिए
छोड़ कर हर परिधि
आ जाओ मेरे साथ
सारी अपेक्षाएं वहीं छोड़ कर


निकलने को था
अपने घेरे से
पर फिर कुछ सोच कर
लिख भेजा कविता को
'जब मिलो 'विराट' से
पूछना मेरी ओर से
क्या बात है
मैं अपेक्षा के बिना
कुछ भी क्यूं नहीं कर पाता?'
अगर ऐसा ना होता
तो तुम्हारे साथ
विराट से मिलने जरूर जाता'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ३ मार्च २०१० सुबह ५ बज कर ४६ मिनट

Tuesday, March 2, 2010

124 - अक्सर वो हमें दिख नहीं पाता है,

१ 
हर दिन सुबह
लिखता हूँ प्रेम पत्र 
अपने नाम,
प्रेम से सध
जाते हैं
सारे काम,
इस बात
को याद रखने
अविराम,
अब एक 
नयी चिट्ठी
अपने ही नाम


प्रेम समझदारी नहीं सिखाता
प्रेम तो अपना सब कुछ लुटाता
पर कभी खाली नहीं हो पाता
प्रेम का अनंत से नित्य नाता 

सन्दर्भों की चहल पहल से परे
शांत वन में
किसी घनी, छाया वाले वृक्ष का मौन
अब कहानियों में ही मिलता है

अब कुछ नया जानने 
कुछ नया बताने की दौड़ में
मौन का होकर रह जाना
हमें सुहाता नहीं, वरन खलता है


निश्चल मौन में
जो पूर्णता का बोध 
झिलमिलाता है,
अक्सर वो
हमें दिख
 नहीं पाता है,

और जो देख पाता है
वो इस दृष्टि को कैसे बचाता है
कैसे याद रख पाता है
कि साथ में कुछ हो ना हो
वो जहाँ भी जाता है
अपनी परिपूर्णता साथ लेकर जाता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ मार्च २०१० 
मंगलवार, सुबह ८ बज कर २५ मिनट

Monday, March 1, 2010

123 - कभी शीतलता, कभी आग


1
जब कभी 
किसी गढे गढ़ाए विचार ने
आकर लगा दिया मेरी कनपटी पर रिवोल्वर 
और 
कहने लगा
सत्य के इस चेहरे को
अब कविता के रूप में कर दे मुखर 

तब तब
कविता नहीं हो पाई
बात बनते बनते
नहीं बन पाई

कविता नूतनता की पक्षधर है
स्वतंत्रता की सृजनशील लहर है 
मेरी कविता सिर्फ मेरी नहीं है
इस पर अब शाश्वत का असर है


अब कविता के पास बैठ कर
बंद कर दिया है अपना राग 
बस सुनता हूँ कविता से
कभी शीतलता, कभी आग

और कभी एक तरह का  आक्रोश 
क्यूं खोता जा रहा है सबका होश

३ 
अब भी बारूद हैं, नफरत है, हिंसा है, मरने मारने का क्रम जारी है
खुद को उड़ा कर विध्वंस फैलाने वाले कर रहे किसकी तरफदारी हैं

 क्या इन लड़ने लड़ाने वालों का
हमसे भी कुछ नाता है
होगा तो सही, पर कई बार
समझ में नहीं आता है
जागते तब भी नहीं जब एक घर
पूरी तरह झुलस जाता है
हमें दूरियों के घूंघट में
खुद को छुपाना आता है 
पर काल कुछ ऐसा है
हर दूरी पार कर जाता है
एक दिन चिंगारी का वंशज
हमारे घर का द्वार खटखटाता है

एक क्षण ऐसा ना आये 
जब हम नहीं कर पायें प्रतिकार
नहीं बता पाएं
हमें शांति में दिखता है जीवन सार
नहीं जता पायें
सबको प्रेम दिए बिना नहीं होगा उद्धार
ऐसा ना हो क्रूरता के पीछे
 दिख ही ना पाए करुणा की रसधार



अपने छोटे छोटे सन्दर्भों के पार
विस्तृत फलक में करना है विचार 

और अपनी मानवीय आस्था के प्रति 
अपने समर्पण का करना है परिष्कार 
अब तो सोचना, सीखना और करना होगा 
वो सब, जिससे बढाया जा सके प्यार 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१ मार्च १० सोमवार
सुबह ८ बज कर ५० मिनट

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...