Monday, January 11, 2010

नयापन


लिख कर डिलीट करने के बाद
स्क्रीन ऐसा दिखाती है
जैसे जानते ही ना हो
कुछ शब्द आये थे
एक भाव, एक विचार उतरा था
नयेपन की तलाश में
नाकाम होकर मिट गया



नयापन कभी कभी
ढलान पर अपने आप दौड़ लगाने में भी
मिल जाता है
अनायास
पर उसे देखने और महसूसने के लिए
रुकना होता है

ढलान पर बेतहाशा भागते हुए
ठहरने में जोर पड़ता है

संतुलन तक आते आते अंदेशा रहता है
कहीं गिर ना जाएँ



नयापन ढूँढने
कभी कभी हम ऊपर की ओर चढ़ते हैं
हाँफते हाँफते
साँसों को सहेजने के अलावा
और किसी अनुभूति को देखने की क्षमता भी नहीं होती

तब भी ठहर कर
साँसों के संतुलन तक
पहुंचे बिना
नहीं कर पाते
नयेपन का स्पर्श



नयापन
ना ढलान पर है
ना चढ़ाई पर है
ना गति में है
ना ठहराव में

नयापन
होता है
कहीं मध्य बिंदु पर
जहा बोध
ना ढलान का होता है
ना उंचाई का

बोध होता है
एक सक्रिय, सजग संतुलन का

और इस सतुलन में
झर-झर आता है
बोध अपने होने का




नयापन
नए नए तरीके से
अपने आप तक पहुँचने से
खिलता है

लगे भले ही बाहर से आता
हर बार हमें अपने भीतर से ही
मिलता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ जनवरी १०, ७ बज कर १९ मिनट
सोमवार

Sunday, January 10, 2010

देखना पहुंचना नहीं होता है


दूर तक देख कर भी
लौटना तो होता है
अपनी देहरी में

देखना पहुंचना नहीं होता है

पहुँचने के बाद
होता नहीं लौटना



अमृत घट खाली देख कर
उसे पुकारा
तो सन्देश मिला
'जितना तुम पी चुके हो
वो भी काफी है
मृत्यु के पार जाने के लिए

पिए हुए अमृत को
पचाने का अभ्यास तो करो'



अमृत पचाने के लिए
वितरित करना होता है
आनंद
शाश्वत श्रद्दा लेकर
घूमना होता है गली गली

कह कर मुस्कुराया वह
'हर दिन कविता ही नहीं
उन्डेलो उसमें
अपना आत्म सौंदर्य
अपनी तृप्ति का वैभव
अपनी शाश्वत रसमयता से
पोषित कर अपनी चिंतन धारा

बहो अभिव्यक्ति के शिखर से
पूर्ण निश्चिन्त
समर्पित हो
अनंत को
कण कण
दिशा
गति
और प्रवाह का प्रेरक वेग



मुक्ति मांगने से नहीं
अपने को जानने से मिलती है
जान लेना ही मुक्ति है

जानने के लिए
मुक्त करो अपने आप को

सीमा नहीं
कामना नहीं

आनंद, प्रेम और कृतज्ञता
जो हो
जैसे हो
जहाँ हो
हर अनुभूति
हर अनुभव के लिए
हर सांस के लिए
कृतज्ञता
कोई खिचाव नहीं
सत्य की निश्छल धारा में
करो स्नान
०००००००००




कई बार बात वो नहीं होती
जो दिखती है

बात ऊपर तक आकर टकराती है जब
अलग अलग रंगों के मेल जोल में

दिखाई पड़ता है

हम भीतर से कितने अलग अलग हैं

अपने अलग होने का अर्थ अलगाव नहीं है

यह तो रचनात्मकता है
सृष्टा की

कृपा के आलोक में
हम इस अनेकता का
उत्सव मनाते हैं

जीवन को नित्य रसमय पाते हैं

अपने आप में स्थित रह कर
साथ साथ बढ़ते जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी ११, १०, रविवार
सुबह ६ बज कर ४५ मिनट




Saturday, January 9, 2010

परिपूर्णता का उत्सव


एक दिन
हम अपना जीवन चलचित्र की तरह
चला कर
दिखाना चाहते हैं
अपनी संतति को

क्यों ऐसा होता है
की अपनी यात्रा के मोड़
बता कर
आने वाली पीढ़ी को
हमें लगता है
उन्हें दिखा दिया
वो जीवन भी
जो उनमें समझ आने से पहले
जिया था हमने



हम बताना भी चाहते हैं
जानना भी चाहते हैं
सुन कह कर
हर बार
लगता ये है की
यह क्षण जो अभी है
सामने है
बीते सभी क्षणों
और
आने वाले सभी क्षणों से
अधिक जगमगाता है

इस क्षण को
सुनहरा बनाने
छलछलाते प्यार
की निष्कलंक दौलत
लेकर आती है
कविता



इस क्षण को
सार गर्भित बनाने के
कितने सारे तरीके हैं
निर्णय इस समय से अपने सम्बन्ध का
ना मैं करता हूँ
ना समय
करता वो है
जो मुझसे परे है
और
परे है
समय से भी



अपने रोम रोम से
अपनी ऊर्जा के प्रत्येक कण से
अपनी समग्र चेतना को लेकर
देखता हूँ अनंत की ओर
रास्ते खुल जाते हैं
गति मिल जाती है

उसने ठीक कहा था
तुम कुछ मत करो
बस मेरी ओर देखो
कई बरस संदेह रहा इस बात पर

पर अब
ज्यों ज्यों
देख रहा हूँ ऋतुओं का बदलना

हवाओं का चलना

साँसों को आधार देती
एक सूक्ष्म ताकत को

देह में दिव्य का निवास
जताता है लहू का बहना

शानदार पाचन तंत्र

अद्भुत क्षमता और सम्भावना वाला है
हर एक अंग,

धूप, बारिश और बर्फ
सब कुछ होते रहते हैं
मेरे कुछ किये बिना

बढती है आश्वस्ति
हर दिन
मेरा होना उससे है
उसे देखने के प्रयास में ही
मेरी गति है

देखना उसे
बाहर की नहीं
भीतर की आँखों से है

इसलिए अनिवार्य है
प्रवेश अपने भीतर

कविता द्वार है, पथ है
और आमंत्रण है
इस यात्रा का

जिससे मैं
समर्पित होता हूं
उसे देखने को
जिसे देखने से सब कुछ होता है




ना देखूं उसे
तब भी होगा तो सब कुछ
पर इस सब का सार, इसका सौंदर्य
प्रकट तो ना होगा मुझ पर

ना ही प्रकट कर पाऊँगा
उस पर
अपनी कृतज्ञता

कविता
शाश्वत से सम्बन्ध जोडती है

विराट का आलिंगन करने
जब फैलती हैं मेरी बाहें
प्रेम से सारे जगत को अपना कर
तृप्त होता हूँ
सम्रद्ध होता हूँ
आनंदित होता हूँ

सबके साथ मिल कर
अपनी परिपूर्णता का उत्सव मनाता हूँ


अशोक व्यास, न्यूयार्क
जनवरी ९, १०
शनिवार
सुबह ७ बज कर २८ मिनट

Friday, January 8, 2010

साहस खुद को देखने का


आज
अपने आप से
मांग रहा हूँ क्षमा
कविता की दिशा ही नहीं दिख रही

घिरा हूँ
जैसे किसी चक्रवात में
प्रश्न अपनी पहचान का
नए सिरे से
नई ऊर्जा लेकर
खड़ा है चारो और
चिढ़ा रहा है मुझे

जितने जितने परिचय पत्र
निकाल निकाल कर
दिखाता हूँ
ख़ारिज कर देता है सबको

अपने सघन एकांत में
हाथ को हाथ नहीं सूझता जब
पाँव उठा कर चलते समय
अनजाना भय लगता है

रुके रुके
कैसे दिखे कविता

कविता
साहस की संगिनी है
साहस खुद को देखने का
कैसे मिले आलोक बिना

आलोक के अक्षय स्त्रोत को
पुकार कर
पहचान के प्रश्न को
छोड़ना चाहता हूँ
उसके चरणों में

पर सा कुछ उस पर
छोड़ने से तो
बनती नहीं कविता

क्षमा के साथ
यह स्वीकरण
मैं नहीं जानता
कविता क्या है
लिखता हूँ
तो बस इसलिए
की मैं हो जाऊं

हाँ
मैं होना चाहता हूँ
और बस यही मेरी पहचान है
उत्तर सुन कर संतुष्ट हो गए
मुझे घेरे हुए प्रश्न

कविता लिखने के निमित्त
बैठते बैठते
कविता उपलब्ध हो ना हो
मैं स्वयं को उपलब्ध हो जाता हूँ

क्या मैं भी हूँ कविता
किसी की?
जो मुझे क्षण क्षण लिखता है
सांस सांस लिखता है
वो इन आँखों से
क्यों नहीं दिखता है?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, शाम ७ बज कर २ मिनट
जनवरी ८, 10

Thursday, January 7, 2010

नए सूरज का उजाला


कभी कभी
यूँ होता है
की दिख रहा होता है
नए सूरज का उजाला
शब्दों से छन छन कर
आने लगता है
कोई रूप मतवाला

संगीत सा बजता है
सांसों में
उभरता है गीत
खुशियों वाला

आशाओं की किरणों
से सजा दिखता है
हर क्षण
जो है आने वाला



कभी कभी
यूँ भी होता है
खिलते खिलते
रुक सा जाता है
फूल का खिलना

छटपटाता है मन
जाने कब होगा
फिर अपनी ही
लय से मिलना

एक गुमसुम सा पंछी
बैठ कर कंधे पर
जगा देता है
जड़ता का बंधन

फूटती है रुलाई
छूटने लगता है
अपने आप से
किया हुआ वचन


दूसरी कविता
प्रार्थना
आज से नया हो
आत्म दर्शन
आज फिर सार्थक हो
सम्भावना का आलिंगन
आज अनुभव नदिया पा जाये
सागर का ख़त
आज अनुभूति में सुन जाए
सच की दस्तक

आज आगे बढ़ने की अकुलाहट
पा जाये दिशा, गति और संबल

आज जाग्रत हो ऐसी आश्वस्ति
जो सार्थक, सुन्दर करे हर पल

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार
जन ७ १०
सुबह ७ बज कर १० मिनट

Wednesday, January 6, 2010

होना ही जानना है


मेरे पास अब भी
किसी अनाम कोने से
निकल आता है वही सवाल
कौन हूँ मैं
कर क्या रहा हूँ
और क्यूं

सुबह सुबह
बैठ कविता की गोद में
जिद के साथ
मांगता हूँ
वो दर्पण
जिसमें दिख जाये चेहरा मेरा



मेरी पहचान क्या चेहरे पर चिपकी है

मेरी पहचान क्या
चेहरे तक आती है
किसी सूक्ष्म स्थल से कभी कभी

और तब क्या होता है
जब मैं सोचता हूँ
अपनी पहचान छुपा कर
करूं अभिनय
अपेक्षित भूमिका के अनुसार



मैं अब धीरे धीरे
अपने आप को सम्मोहित कर
जब उतरने को हूँ
सत्य के धरातल तक

हंस कर कहती है कविता
चढ़ना-उतरना भ्रम है
तुम जहाँ हो
परिपूर्ण हो



पूर्णता का परिचय ठहरता क्यों नहीं
क्या है जो
इसे चुरा ले जाता है मुझसे

सोच कर यह प्रश्न
देखने लग आकाश

हंस कर बोला आकाश
पूर्णता का परिचय मत पकड़ो
पूर्णता को जानो

जानने और मानने का मतलब
एक होने की अनुभूति में घुल जाना है

जब एक हो रहोगे तुम
पूर्णता के साथ

परिचय के चुराए जाने की चिंता ना रहेगी



आँख मूँद कर
करने लगा मनन
बात आकाश की
ठीक है क्या
क्या सचमुच मैं पूर्ण हूँ

पूर्ण होने का अर्थ क्या है

प्रश्न उठा तो
मन में से ही आवाज़ आई
पूर्ण होने का अर्थ
सुनने से नहीं जानने से पता चलेगा

जानना कोई क्रिया नहीं
होना ही जानना है



होना भी क्या होता है
मतलब 'मैं तो हूँ ही'
फिर कहाँ से आयी ना होने की बात

पूछा कविता से तो बोली

जब जब तुम अपने से अलग हो जाते हो
तब तब तुम होकर भी नहीं होते

सार है अपने से जुड़े रहने में

चाहे जितने बाहरी आकर्षण हो
बाहरी छल तुम्हे
चिंता या उद्विग्नता
उत्साह या प्रसन्नता का भाव दिखा कर पुकारें

उनसे जुड़ने की ललक में
अपने मूल से अलग ना हो जाना



मूल यानि 'आत्म सौंदर्य' की सौरभ
मूल यानि 'आत्म गौरव' का बोध
मूल यानि 'सतत प्रेम' का प्रवाह
मूल यानि 'उदारता अथाह'

मूल यानि 'असीम की नित्य शरण'

मूल यानि 'आडम्बर रहित जीवन'



मूल की सुनी सुनाई परिभाषाओं
से मुक्त होकर
करने लगा आंख मूँद कर मूल पर मनन

"विस्तृत होती चेतना का दरसन पाया
विराट की हथेली में बैठ कर मुस्कुराया

मूल मेरे आदि और अंत का स्थान ही नहीं
मूल मेरी नित्य स्थली है



मूल से जुडाव है
तो मौलिकता है
मौलिकता है तो सृजनशीलता है
सृजनशीलता है तो सौंदर्य है
सौंदर्यबोध है तो आनंद है
आनंद है तो अमृत का स्वाद है
अमृत का स्वाद है तो शांति है
शांति है तो प्रेम है
प्रेम है तो होना है

होना यानि प्रेम

प्रेमयुक्त हुए बिना
जो होना है
वो खंडित है
अधूरा है
अपूर्ण है

कविता की गोद से
प्रेम रूप होकर उठा
तो मेरी साँसों में
सूक्ष्मता से आ बैठी कविता
लेकर उपहार उस दृष्टि काजो सारे जग में
अपनेपन की आभा
छिटकाती है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, जन ६, १०
सुबह ५ बज कर ५८ मिनट

Tuesday, January 5, 2010

कोई अनजाना नहीं है


उत्साह का संचार करती बात का अभिनन्दन
प्रेम मय व्यवहार करते साथ का अभिनन्दन
जब समर्पित दृष्टि हो तो ऐसा हो जाता कभी
मन प्रफुल्लित हो करे हर बात का अभिनन्दन



जब कभी देखा ठहर कर
अपने से आगे निकल कर
पा लिया है उसके दर को
कामना का स्वर बदल कर



चल तुझे झूला झुलाऊँ
चांदनी का रथ सजाऊँ
उजलेपन के स्त्रोत से
आज मैं सबको मिलाऊँ



दूर तक जाना नहीं है
और कुछ पाना नहीं है
है सभी अपने से चेहरे
कोई अनजाना नहीं है



मन मे बस कर चल दिए जो
उनका क्यों कर शोक करना
जिनसे साँसों मे सजगता
उन स्वरों को रोक रखना



आज कुछ ऐसे पुकारो
एक एक क्षण को संवारो
ले के धीरज ढेर सारा
आज उसका पथ निहारो



अशोक व्यास
न्यू यार्क, अमेरिका
जन ५, 2010
मंगलवार, सुबह ६ बज कर ३३ मिनट


Monday, January 4, 2010

नित्य जागरूक


नयापन बचाने के लिए
पुराने तरीके काम नहीं आते जब
अपने आपको ही करना होता है नया

नया होने के लिए
छोड़ना होता है पुरानापन

समय पुराना छूट ही जाता है
शरीर पुराना छोट ही जाता है
पर
पुरानी सोच छोड़ कर
नयी तरह से सोचना मुश्किल है

हम अपनी सोच से चिपक कर सुरक्षित महसूस करते हैं
हम अपनी सोच की पद्धति से स्वयं को पहचानते हैं

सोच हमारी सही भी हो यदि
उसे नए सिरे से धारण किये बिना
उसकी प्रखरता की ऊष्मा होती नहीं प्रकट
अपने होने के प्रति
एक असम्प्रक्त्ता बन आती है
ढर्रे पर बहते जीवन में
हम यंत्रवत हों
जीने का स्वाद
भूल जाते हैं

जो हैं
जहाँ हैं
कैसे आये है यहाँ
स्मृति इसकी जाग्रत रखते हुए
पुनर्व्यस्थित कर अपनी सोच को
करनी है स्वीकार
चुनौती
नयेपन को अपनाने के लिए
नया नया
यानि
नित्य जागरूक होने की


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन ४, १०
सुबह ७ बज कर ११ मिनट पर

Sunday, January 3, 2010

निरंतर मुक्ति का स्वाद


शरीर का अर्थ ही चंचलता है

शरारत शरीर की संचालित है मन से

मन सेतु है
इन्द्रियों और इन्द्रियातीत के बीच

मन बावरा नहीं रहता जब
हर क्षण दिखाता है
कालातीत का साहचर्य

हर क्षण की पकड़ से छूटने का
अभ्यास जब दृढ हो जाता है

धीरे धीरे
निरंतर मुक्ति का स्वाद
सहज सा हो जाता है

हर क्षण में एक फंदा है
जो पैनी दृष्टि
काट देती है
सरलता से


दृष्टि का ये पैनापन
वहाँ से आता है
जहाँ हर मनुष्य आता है
और फिर एक दिन
देह छोड़ कर लौट जाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ जनवरी १०, रविवार
सुबह, ६ बज कर ३६ मिनट

Saturday, January 2, 2010

मुझे ही बनना होगा दर्पण


कितनी जल्दी
नयापन होने लगता है पुराना

हम बनाते रह जाते हैं
समय का बहाना

सोचते रह जाते हैं
किसी को मिलना, किसी को बुलाना

फिसल जाता है
हाथों से, आनंद का खज़ाना



शब्द सतह पर
जम जाती है
सोचे हुए विचारों की पपड़ी सी

अपने एकांत तक जाने से
रोकता है
जमा किये हुए
विचारों का शोर गुल

जहाँ जहाँ से गुजरते हैं
वो बातें
वो जगहें
हिस्सा हो जाती हैं हमारा
जाने अनजाने

कई बार
हम अपने अनजान हिस्से से
टकराते हैं
कभी कोई कसक
कभी कोई चिंता
कभी कोई आक्रोश
यूँ हमारे साथ चले आते हैं
जैसे किसी के दुपट्टे में
किसी झाडी से लग कर
आ जाए
काँटा कोई

ऐसे ही
कभी किसी सपने की आहट
कहीं निश्छल आशा की किलकारी
किसी के प्रेम की फुहार
किसी आनंदित क्षण में उतारा
संपूर्ण प्यार

अच्छा बुरा
सच्चा झूठा

बहुत कुछ रहता है
शब्द सतह पर
पपड़ी की तरह जमा हुआ
जो हमें
सचमुच हमारे एकांत तक
यानि हमारी शुद्ध मुक्त उपस्थिति तक
पहुँच पाने से रोकता है



क्यों इस एकांत तक
इस निरे एकांत तक
इस मुक्त एकांत तक
इस शुद्ध एकांत तक
जाने का आग्रह

क्या गलत अगर
बीत जाए ऊपरी मेले में ही
जीवन सारा



ना जाने क्यों
यूँ लगता है
अपने को जानना है
तो खोये-पाए से परे होकर ही
जाना जा सकता है

अपने को देखना है
तो हर आडम्बर से परे
हर छल को अलग हटा कर ही देखना होगा

दर्पण की सीमा है
वो तो बाहर है

अपने आपको देखने
मुझे ही बनना होगा दर्पण



उस समग्र दर्शन वाले क्षण का
शब्द चित्र बने या ना बने

उसे अनिर्वचनीय मौन का स्वाद
किसी को पता चले या ना चले

उस क्षण में शेष होकर भी
अशेष रहूँगा

ऐसी आश्वस्ति जो है
उनके शब्दों से आये है
जो मेरे होने का ही नहीं
सृष्टि के होने का भी प्रमाण हैं
मेरे लिए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन २, ०९ शनिवार
सुबह ६ बज कर ३८ मिनट

Friday, January 1, 2010

मौज अनंत सत्ता के साथ वाली


बाहर बर्फ कि पतली चादर
सड़कों पर गीलापन
बीते हुए कि स्म्रृति
या आगंतुक का स्वागत



शब्द सहारे
बाँध कर स्वयं को
उतरता हूँ अपने ही भीतर

बुलावा बाहर की गतिविधियों का
रोकता है
ध्यान भी मचलता है
चारों दिशाओं से संवाद करने

दिखाता हूँ
चंचल मन को
विस्तार के प्रमाण
आनंद के अडिग स्वरुप

देता हूँ आश्वस्ति
तुम अपना सकते हो
अगाध शांति वाला आत्म वैभव

करों ना
मूल का आलिंगन
साथ चल शब्दों के

मन धीरे धीरे
होकर संतुलित
प्यारे कोमल सुन्दर बच्चे सा
ना जाने कब
मुस्कुरा कर
उतरता है
शब्द के साथ एक मेक
ऐसे की डूबना और उड़ना एक हो जाता है
विपरीत दिशायों को अपना कर भी
बना रहता है माधुर्य इसका

किसी एक क्षण यूँ भी लगता है
दिशाएं अपना अस्तित्व पाती हैं
उससे
जो छुपा है मन में

मौज अनंत सत्ता के साथ वाली
सहेज कर अंतस में

चलूँ यहाँ से
या
बुला लूं सभी को यहाँ
विराट के पास अतुलित ऐश्वर्य है
उदार भी है यह

इस अनिर्वचनीय उत्सव को
बाँट लूं साथ सबके

पर
बुलाना संभव नहीं लगता किसी को
नियम है कुछ ऐसा की
जो आएगा अपने आप आएगा

विराट के पास अन्य बातों के साथ
धैर्य भी है अपार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन १, २०१०
सुबह ७ बज कर ४४ मिनट पर

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...