Friday, May 29, 2015

तेरी हर बात याद आये है

सबके प्यारे मेरे परम आदरणीय चाचा डॉ भीम राज व्यास के साथ
(२८ दिसंबर १९४४ - २७ मई २०१५ )

तेरी हँसती हुई तस्वीर भी रुलाये है

तेरी हर बात याद आये है
सिसकियाँ, कराह और कसक
दुनियाँ बदली सी नज़र आये है


कैसे तू सबके लिये था सब कुछ
बात ये समझ नहीं आये है

एक तड़प सी कौंध जाये है
एक बदली सी बरस जाये है
तू वही तो न था, जो दिखता था
तेरी हर याद कुछ सिखाये है

तेरी रुखसत की ख़बर झूठी है
तेरा वजूद ये बताये है

जिससे रिश्ते निखर गये सारे
 मौत उसको कहाँ छू पाये है
एक ये अहसास तेरा होने का क़दम क़दम पे मेरा हौसला बढ़ाये है
(भीम चाचाजी का खास भतीजा
अशोक व्यास - बब्लू

वैसे वो ऐसे थे, की सबके लिए खास थे 
और सब उनके लिए खास रहे )

Monday, May 25, 2015

फूलों की नई नई घाटियाँ






शब्दों का हाथ थाम 

उतर कर  शिखर से 

आँख मूँद कर 

कुछ देर

अब 
 
देखता हूँ 

फूलों की नई नई घाटियाँ 

जहाँ तक ले आये हैं शब्द 

 
        - अशोक व्यास 

Friday, May 22, 2015

हकीकत से वास्ता रखता नहीं हूँ



बुजुर्गों की इनायत है 
उन्ही से ये रिवायत है 
दुआओं का असर देखो  
मेरा जीवन मोहब्बत है 

२ 
बुजुर्गों के सभी किस्से 
मेरी साँसों के हैं हिस्से 
सहेजूँ उसको कैसे मैं 
सहेजा जा रहा जिससे  

३ 

फिसल कर गिरने से बचाये है
माँ तेरी याद बहुत आये है
तेरी नज़रें इलाज़ करती हैं
चोट जब भी कोई लग जाए है 

४ 

अपने होने का हुनर सिखला रहे अब भी 
अपनी आँखों से, जहाँ दिखला रहे अब भी 
मुझमें ये जो रहता है कायम तमाम उम्र 
उसकी सूरत रात-दिन दिखला रहे अब भी 

 ५ 

अब किसी लफ्ज़ से पत्थर न बना
जलते शोले से अपना घर न बना 
सीख कुछ साथ रहने का सलीका 
शहर को खौफ का मंजर न बना 

६ 

सीख कर कोई नया गुर, क्या करें 
रात दिन उसका तस्सव्वुर, क्या करें 
बात जब रुक जाए तब रुक जाए है 
ऐसे में कोई नया सुर, क्या करें 

७ 

हकीकत से वास्ता रखता नहीं हूँ 
अपने घर में रास्ता रखता नहीं हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
शुक्रवार, मई २२, २०१५ 





Tuesday, May 12, 2015

पिंजरे वाले शेर की तरह



१ 
मेरा किस्सा भी आम कर डाला 
मुझको मेले के नाम कर डाला 
२ 

प्रतीक्षा  सी है अंतस में 
कब होगा सब मेरे बस में 
पिंजरे वाले शेर की तरह 
कब तक रहना है सर्कस में 

अशोक व्यास 
(पुराने पन्ने )

प्रभु रमन तेरे दरबार


प्रभु रमन तेरे दरबार 
मिले शांति और प्यार 
सांस संतुलन सहज सुलभ 
जाग्रत आनंद अपार 

प्रभु रमन तेरे दरबार 
मधुर मौन उपहार
 करूणामय रसधार 
अपनेपन का ज्वार 

ऐसे तुमने अपनाया 
अब मुझको सब स्वीकार
एक अनाम लय होता जिससे 
मुखरित स्व का सार 

अशोक व्यास 
(रचना स्थल - अरूणाचल आश्रम, न्यूयार्क )

कविता

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